पानी की बचत तथा फसली विभिन्नता की आवश्यकता

भूमि की उपजाऊ शक्ति को बरकरार रखने और कृषि को दरपेश समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए पानी की बचत पर ज़ोर देने की ज़रूरत है। पंजाब में 14.5 लाख ट्यूबवेल हैं। लगभग 32.5 लाख हैक्टेयर रकबे पर धान की काश्त की जानी है। सिंचाई के अधीन 99.5 प्रतिशत रकबा है। कुल 150 ब्लॉकों में से 117 ब्लॉक ‘ब्लैक ज़ोन’ में चले गए हैं। जहां नया ट्यूबवेल लगाना सम्भव नहीं। इस साल गर्मी भी अधिक पड़ रही है और मॉनसून भी गत वर्ष के मुकाबले कमज़ोर रहने की संभावना है। इन हालात में पानी का इस्तेमाल संयम से करना चाहिए। धान को ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है।  सरकार पानी बचाने के लिए सीधी बिजाई (डीएसआर) का रकबा बढ़ा कर 2.77 लाख एकड़ तक ले जाने की कोशिश कर रही है और इस पर 1500 रुपये प्रति एकड़ तक की सब्सिडी भी देगी। 
फसलों में आई स्थिरता, पर्यावरण प्रदूषण और मौसम में आ रहे बदलाव से संबंधित समस्याओं और भूमि की कम हो रही उपजाऊ शक्ति को रोकने की ज़रूरत है। उधर दूसरे राज्य अब गेहूं और धान की काश्त में आगे बढ़ रहे हैं। गेहूं की काश्त में पंजाब का सभी राज्यों में आग्रणी होने का दर्जा पिछड़ गया है। पीएयू और आईएआरआई को गेहूं और धान की ऐसी किस्में किसानों को देनी चाहिएं जिनका उत्पादन ज़्यादा हो और खर्च कम हो। चाहे किसानों में बीजों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, परन्तु अभी भी बीज बदल दर बहुत कम है। किसान अपना बीज इस्तेमाल कर रहे हैं या अप्रमाणित निजी कंपनियों से हाइब्रिड बीज खरीद रहे हैं।  कृषि और किसान कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ के अनुसार हाइब्रिड्स की काश्त चावल की गुणवत्ता को प्रभावित करेगी। विभाग ने हाइब्रिड्स की काश्त पर पाबंदी लगाई थी, जिसे अदालत ने हटा दिया। किसानों कहते हैं कि हाइब्रिड्स का उत्पादन ज़्यादा है और काश्त का खर्च कम होता है। मिलों वाले हाइब्रिड्स की फसल खरीदने से गुरेज़ करते हैं, क्योंकि उनमें दाना कम होता है और टोटा ज़्यादा होता है। 
आम किसानों को विश्वविद्यालयों एवं अनुसंधान संस्थानों द्वारा नई किस्मों के बीज भी उपलब्ध नहीं हो रहे। किसान मेलों में इन नई किस्मों के बीज वितरण प्रबंधन में सुधार लाने की ज़रूरत है। कृषि खर्च बढ़ने के कारण किसानों पर दिन-प्रतिदिन कज़र् बढ़ रहा है। कृषि व्यवसाय को व्यापार समझ कर किए जाने की ज़रूरत है, सिर्फ गुज़ारे के लिए नहीं। किसानों की आय बढ़ाने के लिए लेज़र लैंड कराहे के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए। लेज़र लैंड कराहे का इस्तेमाल करने हेतु सरकार छोटे किसानों को सब्सिडी दे, ये मशीनें बड़े किसानों को चाहे सब्सिडी पर न दी जाएं, क्योंकि वे तो इन मशीनों को किराये पर चला कर व्यापारिक आय लेते हैं। लेज़र कराहे से समतल किए गए खेतों में पानी एक समान लगता है और पानी की बचत होती है। खादों, विशेषकर यूरिया का निपुणता से इस्तेमाल होने से खेत में जो पांच-पांच थैले प्रति एकड़ डाले जा रहे हैं, उनमें कमी आएगी और पीएयू द्वारा सिफारिश किए गए प्रति एकड़ में 2.5 थैले डालने की सिफारिश को भी मानने के लिए किसान तैयार होंगे। अंतर्राष्ट्रीय मंडी में यूरिया की कीमत बढ़ गई है। भारत इसे भारी मात्रा में आयात करता है। यूरिया पर पहले से ही भारी सब्सिडी दी जा रही है। अगर इसकी खपत कम नहीं की गई तो सब्सिडी को और बढ़ाना पड़ेगा, जिससे देश की आर्थिकता प्रभावित होगी। पंजाब सरकार ने नहरी पानी ज़्यादा से ज़्यादा खेतों तक पहुंचाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। इससे उत्पादन भी बढ़ेगा और भूमिगत पानी के स्तर में आ रही गिरावट भी रुकेगी। फसली विभिन्नता लाने की बहुत ज़रूरत है। पंजाब और हरियाणा से अन्य राज्यों में अनाज भेजने की गुंजाइश हर साल तेज़ी से कम हो रही है।  पंजाब में गेहूं और चावल के भंडारण की समस्या आ रही है। यहां गेहूं और चावल की एमएसपी पर सरकारी खरीद होने की वजह से किसान इन फसलों की काश्त छोड़कर अन्य वैकल्पिक फसलें लगाने के लिए मुश्किल से ही तैयार होंगे। उन्हें ऐसी वैकल्पिक फसलें उपलब्ध की जानी चाहिएं जो गेहूं और चावल जितना ही मुनाफ दें। 
 पानी की बचत के लिए फसलों का उत्पादन बैड्ड प्लांटिंग विधि अपनाकर भी किया जा सकता है। सब्ज़ी उत्पादकों की आय बढ़ाने के लिए पॉली हाउस विधि को प्रोत्साहित किया जा सकता है। कृषि के लिए पानी का इस्तेमाल बहुत ही समझदारी से किया जाना चाहिए। भविष्य में कृषि संकट को गहरा होने से रोकने के लिए सरकार द्वारा अग्रिम कदम उठाने की ज़रूरत है।

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