मैं हूं न तेरे साथ

आज अन्तर्राष्ट्रीय पिता दिवस पर विशेष

समय बदलता रहता है। बदलते समय के साथ रिश्तों के रूप, उनकी पहचान बदलनी भी स्वाभाविक है। आज हम इस महत्वपूर्ण मौके पर उस रिश्ते की बात करेंगे, जिस का रूप, आकार, ज़िम्मेदारियां, सब कुछ नई पहचान में, नये रूप में, पीढ़ी-दर-पीढ़ी अकेला बदला ही नहीं बल्कि और गहरा, और ज़िम्मेदार हुआ है।
बापू जी, पिता जी, पापा जी से डैड, डैडी, पौपस के इस स़फर ने एक पिता रूपी शख्स में बहुत तबदीलियां देखी हैं।
20वीं शताब्दी में जब महिलाओं, माताओं की भूमिका में तबदीली आई, वह घर की गृहिणी के साथ-साथ नौकरी करने वाली भी बनती गईं तो इस तबदीली ने जन्म दिया पिता के नये रूप को। माता और पिता के इस बदलते सामाजिक स्वभाव के साथ पिता द्वारा घर में निभाई जाती भूमिका को भी नया आकार मिल गया।
हर किसी की अपने बचपन से बड़े होने तक के स़फर की यादें मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। होश संभालने तक मुझे माता और पिता की अलग भूमिका समझ आने लग पड़ी थी। माता जी का काम घर संभालना और बच्चों को संभालना, पिता जी की भूमिका काम करना, दफ्तर संभालना, समाचार पत्र, किताबों में व्यस्त रहना, जो कि उनके लिए बहुत ज़रूरी था। इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी संभालना कोई आसान काम नहीं था। उस समय की माताएं पति को काम की ज़िम्मेदारी उठाने में इस तरह सहयोग देती थीं, कि वे स्वयं घर और बच्चों को संभालती थीं, ताकि पिता अपने काम की ओर ध्यान दे सकें। ये यादें अकेले मेरी ही नहीं अपितु मेरी उम्र के हर शख्स की होंगी।
पिता का स्वरूप बदला, भूमिका बदली। आजकल चाहे काम करने वाली मां हो या घर संभालने वाली, आजकल के पिता दोनों मामलों में मां के साथ बराबर की भूमिका निभा रहे हैं बात चाहे घर-गृहस्थी संभालने की हो, चाहे बच्चों के पालन-पोषण की बात हो।
आज के समय में पिता की भूमिका बहुत बड़े और महत्वपूर्ण तरीके के साथ उभरी है, बहुत सारी नई उम्मीदें और ज़िम्मेदारियां लेकर। मौजूदा पिता बच्चों के पालन-पोषण और हर समय उनके लिए मौजूद रहने वाले हैं जो बच्चों को समझते हैं, उनको उत्साहित करते हैं। ‘डाइपर’ बदलने और स्कूल के प्रोग्रामों से लेकर ‘होमवर्क’ और बच्चों के पाठ्यक्रम से बाहर की गतिविधियों में पूरा भाग लेते हैं।
अपने मार्ग दर्शन के साथ पिता अपना योगदान परिवार और समाज दोनों को दे रहे हैं। एक अनुसंधान के अनुसार जो पिता अपने बच्चों के साथ सक्रिय तरीके के साथ व्यस्त रहते हैं, उनके बच्चे दूसरों के मुकाबले अच्छे भावनात्मक सेहत वाले, कम गुस्से वाले और अच्छा शैक्षणिक प्रदर्शन करने वाले होते हैं। 
आजकल की पीढ़ी को सबसे ज्यादा ज़रूरत है कि कोई उनकी भावनात्मकता को समझे, उनको प्यार और हौसला दे। इस काम में पिता अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं।
इस तरह की भावनात्मकता की नींव बच्चों को पूरी उम्र मज़बूत रिश्ते निभाने में मदद करती है और उनकी शख्सियत का हिस्सा बनती है। आज पिता हर पारिवारिक ज़रूरत पूरी करने के लिए अपने-आप को ढाल रहे हैं।
मौजूदा पिता मार्ग-दर्शक का रोल निभा कर अपने बच्चे को ज़रूरी हुनर सिखाने में कामयाब हो रहे हैं। इस तरह पिता और बच्चे के आपसी तालमेल के साथ सिर्फ उनका रिश्ता ही मज़बूत नहीं होता बल्कि बच्चों को पूरी ज़िंदगी इस हुनर का इस्तेमाल करना आ जाता है।
आजकल के पिता अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने से नहीं डरते, बच्चों का पहले चलना, पहली बार मुंह से ‘पापा’ बोलना, स्कूलों में प्रदर्शन से लेकर बेटियों की डोली तक, हर समय भावुक हो जाते हैं। बच्चे का पहली बार पापा कहना उनके लिए किसी भी पुरस्कार से बड़ा ईनाम है। वे बच्चों को सिखाते हैं कि मज़बूत होना और नरम दिल होना एक ही बात है।
आजकल के ज्यादातर पिता बेटियों के प्रति पुत्रों के बराबर ही सोच रखते हैं। उनको अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करते हैं, समाज की कटु एवं नकारात्मक नज़रों से दूर रखने की कोशिश करते हैं।
अपनी पत्नी को साथी मानते हैं। अपने-आप को मालिक नहीं मानते। बच्चों की पढ़ाई से, ज़िंदगी तक के फैसले अपनी पत्नी के साथ मिल कर लेते हैं। 
एक बेटी होने के नाते मैं यह बात ज़रूर साझा करना चाहती हूं कि लड़कियों के एक उम्र के पड़ाव के बाद, वे अपने पिता के ज्यादा नज़दीक हो जाती हैं। पिता के साथ हर बात साझी करती हैं, पिता के आगे फरमाइश रखती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि यदि कोई उनकी अंदरूनी भावनाओं को सबसे ज्यादा अच्छे ढंग के समझ सकता है तो वह पिता और सिर्फ पिता ही है। एक बेटी सब कुछ बर्दाश्त कर लेगी परन्तु अपने पिता पर आई आंच वह सहन नहीं कर सकती। पिता के गुस्से और नाराज़गी में भी बच्चों के लिए प्यार, उनका ध्यान रखने की भावना होती है, जो बच्चे कई बार नहीं समझ पाते।
नि:संदेह बदलता समय और बदलता पिता सिर्फ ए.टी.एम. नहीं, वह धन भी है, अध्यापक भी है और मां का साथी भी है। वह बच्चों के लिए ‘सुपरमैन’ है, जो उनके लिए बड़े होने तक, हर समय उपस्थित रहता है। पिता का कंधा बच्चों के लिए चाहे वह जितना चाहे दूर हो लेकिन हर समय हाज़िर और मज़बूत रहता है। 
आज का बच्चा सिर्फ पैसा नहीं, समय भी, समझ भी मांगता है और एक ऐसा पिता मांगता है जो कहे ‘मैं हूं न तेरे साथ’।
आज पिता दिवस के मौके पर अपने पिता का धन्यवाद करना न भूलें। आओ, प्रण करें कि अपने पिता को हमेशा अपने पर गर्व महसूस कराएं और उसका सिर्फ गर्व से ऊंचा रखें।
‘पिता दिवस की शुभकामनाएं’
 

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