एक चेतावनी है मानसून का बदल रहा स्वरूप

एक समय था जब भारत में बकायदा बरसात शुरु होने और खत्म होने की निश्चित तारीखें हुआ करती थीं। इन तारीखों से मानसून अधिकतम दो-चार दिन ही आगे-पीछे हुआ करता था। वह उम्मीदों का मौसम होता था। किसान पहले से योजना बनाकर रखते थे कि कब बुआई शुरू करनी है और कब बुआई खत्म हो जायेगी। मानसून आने की तय तारीख को वे आसमान की ओर उम्मीदों से देखते, मुस्कुराते और बच्चे, जवान सब पहली बारिश में भीगने को बेताब रहते। हालांकि तब न तो मानसून की भविष्यवाणी करने वाली उन्नत मशीनें थीं और न ही मानसून विज्ञान ही इतना विकसित था। फिर भी मानसून लगभग तय और सुनिश्चित हुआ करता था। लेकिन विगत दो दशकों से लगातार मानसून का स्वरूप बदल रहा है। अकसर हर साल कभी यह सालों पहले की तय तारीखों से कई दिन आगे आ जाता है, तो कई बार काफी पीछे आता है। अब बादल कहीं कई-कई दिनों या दो-दो हफ्तों तक बरसते ही नहीं, खेत प्यासे रह जाते हैं और कहीं-कहीं कुछ ही घंटाें में महीने भर में होने वाली बारिश एक साथ हो जाती है, जिससे पूरे इलाका जलमग्न हो जाता है। इन इलाकों के शहरों में जनजीवन पूरी तरह से थम जाता है। बाढ़ तबाही मचाती है, पेय जल का संकट खड़ हो जाता है और फसलें पानी में डूब और सड़ जाती हैं। जबकि कहीं सावन-भादो के मौसम में भी आसमान से आग टपकती है और ज़मीन से धूल उड़ती है।
पिछले एक दशक में मानसून लगातार अपना स्वरूप हर साल न सिर्फ  बदल रहा है, बल्कि यह लगातार भयावह होता जा रहा है। जबकि भारत की आधी से अधिक आबादी आज भी न सिर्फ कृषि बल्कि मानसून पर ही निर्भर है। करोड़ों किसानों की आय, जलाशयों का जलस्तर, उद्योग धंधों के लिए बिजली उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और देश की अर्थव्यवस्था, मौसम के इस बदलते चेहरे से हर बार डरती है और लगातार सशंकित रहती है। यही कारण है कि मानसून में आया छोटा सा बदलाव भी, बड़े आर्थिक और सामाजिक प्रभाव छोड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अब केवल यह मायने नहीं रखता कि कुल कितनी बारिश हुई है, बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि बारिश कब, कहां और कितनी देर में हुई है। पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है कि लंबे समय तक सूखा रहता है और फिर कम समय में अत्यधिक वर्षा हो जाती है। ऐसी बारिश न खेतों के लिए पूरी तरह से उपयोगी होती है और न ही यह पानी वापस धरती में समा पाता है। इस वजह से बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। इससे न केवल गांवों बल्कि शहरों की भी स्थिति बेहद चिंताजनक हो चुकी है। कुछ घंटों की तेज़ बारिश, दिल्ली, मुम्बई, बंग्लुरु, गुरुग्राम, पटना, गुवाहाटी शहरों की रफ्तार पूरी तरह से रोक देती है। सड़कें नदियों में तब्दील हो जाती हैं, यातायात ठप हो जाता है, बिजली और संचार की समूची व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है और जल जीवन असहाय सा महसूस करने लगता है। नि:संदेह इसका बड़ा कारण अनियोजित शहरीकरण, जल निकासी की समुचित व्यवस्था का अभाव और जलाशयों पर बढ़ता अतिक्रमण भी है। 
लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं सारी स्थितियों में पहले यही बारिश कहीं ज्यादा काम की और कम भयावह हुआ करती थी, तो इसकी वजह यह थी कि मानसून का एक तयशुदा स्वरूप था, परन्तु अब यह हर बार हमारे अनुमान को, हमारी योजना को और हमारी व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। गांवों को मानसून के इस स्वरूप का दोहरा नुकसान होता है। एक तरफ जहां कम समय में भारी बारिश के कारण गांव अकसर खतरनाक बाढ़ का शिकार हो रहे हैं, वहीं कभी देर से , तो कभी कम समय में भारी बारिश के कारण कृषि बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। कभी मानसून के मौसम में लंबे समय तक बारिश न होने के चलते, तो कई बार लगातार कई हफ्तों तक अनुमान से कई गुना ज्यादा बारिश होने के कारण खेती बर्बाद हो जाती है और किसानों की मेहनत में पानी फिर जाता है। कई क्षेत्र में तो किसानों को अब फसल चक्र तक बदलने की ज़रूरत पड़ने लगी है। कम पानी वाली फसलों को अपनाने और मौसम की नई परिस्थितियों के अनुरूप अब वह कृषि करने के लिए मज़बूर हो रहे हैं या इसकी ज़रूरत उन्हें महसूस होने लगी है।
वास्तव में ये सारा खेल जलवायु परिवर्तन का है। धरती के बढ़ते तापमान के कारण वातावरण में कहीं अधिक नमी जमा हो जाती है, जिससे कम समय में ही मूसलाधार बारिश की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। साथ ही दूसरी तरफ  लंबे शुष्क दौर भी देखने को मिल रहे हैं। वैज्ञानिक इसे चरम मौसम की घटनाओं (एक्स्ट्रीम वेदर) में वृद्धि का संकेत मानते हैं। हालांकि मौसम के इस बदलाव के बावजूद बड़ी तादाद में जनहानि नहीं होती, क्योंकि पिछले दो दशक में भारत ने मौसम का पूर्वानुमान लगाने, उपग्रह तकनीक को सटीक बनाने तथा आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। यही कारण है कि हाल के सालों में भारी चक्रवातों के बावजूद जान-माल की हानि पर हमने जबरदस्त नियंत्रण हासिल किया है, लेकिन जिस तरह से मौसम बदल रहा है, उससे हमारी अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था बार-बार गंभीर झटके खा रही है। वास्तव में मानसून का यह बदलता स्वरूप एक तरह से प्रकृति के साथ संतुलन साधने की चेतावनी है। हमने जिस तरह नदियों के किनारे बसाहट बढ़ा ली, तालाबों को पाट दिया, जंगलों को काट दिया और शहरों को कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया है, उसके कारण न सिर्फ बारिश का रंग-ढंग बदल रहा है बल्कि बरसा हुआ पानी भी धरती में वापस नहीं समा रहा, जिस कारण भू-जल स्तर भी लगातार घटता जा रहा है। 
विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले सालों में यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है, अगर इसे रोकने के लिए युद्ध स्तर पर पूरी दुनिया ने साझी कोशिशें एक साथ न शुरू कीं तो वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि इस दीर्घकालीन भयावह आपदा से बचना और मुश्किल हो जायेगा। इससे बचने के लिए पूरी दुनिया को तुरंत जल संरक्षण, मौसम के अनुकूल टिकाऊ कृषि, बेहतर शहरी नियोजन और पर्यावरण संरक्षण पर काम करना होगा। भारत जैसे देश के लिए यह चेतावनी भर नहीं, बल्कि हमारे जीवन-मरण का सवाल है, क्योंकि हमारे लिए मानसून आज भी जीवन का आधार है। ऐसे में यदि हमने अब भी प्रकृति की इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और जल, जंगल तथा ज़मीन के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभायी, तो आने वाले दिनों में मानसून इससे भी ज्यादा भयावह कहर ढा सकता है।
एक बीमा कम्पनी के आंकलन के मुताबिक अकेले साल 2025 में भारत में आई विभिन्न जलवायु संबंधी आपदाओं के कारण देश ने लगभग 12 अरब अमरीकी डॉलर यानी 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का आर्थिक नुकसान उठाया है और इसमें 60 फीसदी से ज्यादा नुकसान सिर्फ  बाढ़ से हुआ है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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