आगरा की सैर

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)

उनकी बातों में इतना गजब का आत्मविश्वास और ऐसा पक्का भरोसा था कि हमें उनके इरादों पर जरा भी शक नहीं हुआ। उन्होंने खुद को इतने स्वाभाविक और पेशेवर ढंग से हमारे सामने पेश किया कि हमें लगा सचमुच वे इस किले या पर्यटन विभाग से जुड़े हुए कोई कर्मचारी होंगे जो पर्यटकों की मदद करते हैं। मेरी पत्नी, जो ताजमहल न देख पाने की वजह से बेहद मायूस थी, उसने उम्मीद भरी नज़रों से मेरी तरफ देखा और धीमे से पूछा कि चलें क्या? मैंने आसपास नज़र दौड़ाई। वहां कुछ और स्थानीय लोग भी खड़े दिखाई दे रहे थे और सड़क पर गाड़ियां चल रही थीं। माहौल बिल्कुल सामान्य और सुरक्षित लग रहा था। मैंने उसकी खुशी के लिए हामी भर दी।
उनमें से एक आदमी हमारे साथ आगे चल पड़ा। उसका शरीर दुबला पतला था, आंखों में एक अजीब सी चंचलता थी और होंठों पर एक मुस्कान लगातार बनी हुई थी। वह खुद को एक बहुत जानकार गाइड बता रहा था। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, वह आगरा और मुगलों का इतिहास सुनाने लगा। वह कह रहा था कि साहब क्या आप जानते हैं कि शाहजहां ने अपने आखिरी दिन इसी किले की खिड़की से ताजमहल को देखते हुए गुजारे थे। वह बड़ी नाटकीय आवाज़ में बता रहा था कि चांदनी रात में ताज का रंग कैसे बदल जाता है, कभी वह दूध जैसा सफेद दिखता है तो कभी हल्का नीला हो जाता है।
मेरी पत्नी उसकी ये सब बातें बड़े ध्यान और कौतूहल से सुन रही थी। वह सचमुच बहुत खुश लग रही थी। शायद उसे यह महसूस हो रहा था कि हमारी यह अधूरी और निराश करने वाली शाम अब एक बेहद खास और यादगार शाम में बदलने वाली है।
लेकिन धीरे धीरे हम मुख्य और रोशन रास्ते से काफी दूर होते चले गए। सामने एक पुराना और वीरान गार्डन जैसा इलाका था। वहां लोगों की आवाजाही पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी। रोशनी के नाम पर सिर्फ दूर जलती हुई स्ट्रीट लाइट की हल्की चमक थी। पेड़ों की लंबी और भयानक परछाइयां जमीन पर ऐसे फैली थीं जैसे कोई जाल बिछा हो। हवा में एक अजीब भारी सन्नाटा था जो दिल में अनजाना खौफ पैदा कर रहा था।
एक पल के लिए मेरे मन में हल्की बेचैनी हुई। मैंने रुककर उस गाइड से पूछा कि अभी और कितना दूर चलना है? वह फिर से उसी मुस्कान के साथ बोला कि बस साहब, सिर्फ दो मिनट की बात और है, वहां सामने उस ऊंचे टीले के ऊपर से पूरा का पूरा ताज आपके सामने होगा।
हम चलते हुए एक ऊंचे टीले जैसी सुनसान जगह पर पहुंच गए। वहां दूर-दूर तक घना अंधेरा फैल चुका था। शहर की वह चहल-पहल और हल्की रोशनियां कहीं बहुत पीछे छूट गई थीं। अचानक मुझे महसूस हुआ कि आसपास का माहौल ज़रूरत से ज्यादा शांत है। यहां तो परिंदों की आवाज तक नहीं आ रही थी।
तभी पीछे से सूखी पत्तियों के चरमराने और भारी कदमों की आवाज आई। हमने चौंककर पीछे मुड़कर देखा। अंधेरे को चीरते हुए पांच हट्टे-कट्टे आदमी हमारी तरफ तेजी से बढ़ रहे थे। उनके हाथों में मोटी और मजबूत लाठियाँ थीं। उनके चेहरों पर एक क्रूर कठोरता थी और उनकी आंखों में किसी भूखे जानवर जैसी खतरनाक मंसूबे दिखाई दे रहे थे।
मेरी पत्नी बुरी तरह घबरा गई और सिहर कर मेरे बिल्कुल करीब आ गई। उसने मेरा हाथ बहुत जोर से पकड़ लिया। कुछ ही सेकंड के भीतर उन पांचों आदमियों ने हमें चारों ओर से घेर लिया। हमारे भागने का हर रास्ता बंद हो चुका था।
उन सब में से एक आदमी जो उनका मुखिया लग रहा था, वह सबसे अलग था। उसका कद काफी लंबा था, शरीर बहुत भारी था और उसके चेहरे पर घनी और ऊपर की तरफ उठी हुई मूंछें थीं जो उसे और भी खूंखार बना रही थीं। उसकी लाल आंखें सीधे मेरी पत्नी के गहनों, हमारी जेबों और हमारे सामान पर टिकी हुई थीं। उसने बेहद कड़क और खुरदरी आवाज में हमसे पूछा कि कहां से आए हो तुम लोग।
मैंने अपने डर को छिपाते हुए किसी तरह जवाब दिया कि हम दिल्ली से आए हैं। वह एक कदम और आगे बढ़ा और गुर्राते हुए बोला कि क्या करते हो तुम। उसकी उस आवाज़ में सवाल कम था और एक बहुत बड़ी धमकी ज्यादा थी। उसी क्षण मेरे दिमाग में बिजली सी कौंध गई और मुझे पूरी तरह समझ आ गया कि हम एक बहुत भयानक जाल में फंस चुके हैं और ये लोग लूटपाट या उससे भी बुरा कुछ करने के इरादे से आए हैं।
मेरी पत्नी का हाथ मेरे हाथों में बुरी तरह कांप रहा था। डर के मारे उसके चेहरे का सारा रंग उड़ चुका था और उसकी सांसें अटक गई थीं। मेरे अपने मन में भी एक पल के लिए खौफ की एक बहुत तेज लहर उठी। वह जगह इतनी सुनसान और वीरान थी कि वहां हमारी मदद करने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं पहुंचने वाला था। अगर ये खूंखार लोग हम पर हमला कर देते, तो शायद हमारी चीखें भी उस अंधेरे को पार करके सड़क तक नहीं पहुंच पातीं।
लेकिन मुझे यह भी पता था कि ऐसे विकट समय में घबराहट इंसान की सबसे बड़ी दुश्मन होती है। अगर मैं कमजोर पड़ा तो हम दोनों नहीं बचेंगे। मैंने अपनी पूरी मानसिक ताकत को इकट्ठा किया और खुद को बहुत मजबूती से संभाला। मैंने बिना पलक झपकाए सीधा उस मूँछों वाले मुखिया की आँखों में घूरते हुए बेहद दृढ़ और सख्त आवाज में कहा कि मैं फौजी हूँ।
मेरे मुँह से निकले इन शब्दों ने जैसे वहां के पूरे माहौल और हवा का रुख ही बदल कर रख दिया। उन सभी लोगों के चेहरों पर अचानक एक गहरा तनाव और असमंजस उभर आया। उस मूंछों वाले आदमी की आंखों में जो कठोरता और शिकार करने की चमक थी, वह कुछ ही पल में ढीली पड़ गई। उसने घबराहट में अपने साथियों की तरफ देखा।
पीछे खड़े एक लठैत ने थोड़ी सहमी हुई आवाज में धीमे से पूछा कि क्या सच में फौज में हो? मैंने उसी आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ अपना सीना चौड़ा करते हुए कहा कि हां मैं फौज में हूँ और अभी छुट्टी लेकर सीधा यहां आया हूँ। (क्रमश:)

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