एक बार फिर शिखर को छू रही है महंगाई
महंगाई का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। देश और समाज जब प्रगति करते हैं, तो देश में वस्तुओं के मूल्यों का बढ़ना लाज़िमी हो जाता है। इसी कारण देश में विगत कुछ दशकों से महंगाई का चक्र अनवरत रूप से जारी रहा है। मौजूदा दौर में इसी तरज पर प्राय: सभी वस्तुओं एवं पदार्थों के दामों में वृद्धि हुई है, किन्तु इस काल में खाद्यान्न पदार्थों के मूल्यों में एकाएक हुए इज़ाफे ने देश के प्राय: 90 प्रतिशत लोगों को सकते में डाला है। आम आदमी के घर-परिवार और उसकी रसोई में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं की कीमतें बाकायदा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती गई हैं। आटा, दालें, चीनी, चावल, खाद्य-तेल यहां तक कि नमक की कीमतों में भी अप्रत्याशित तरीके से उछाल आया है। इससे एक ओर जहां आम आदमी के घर-परिवार का बजट असंतुलित हुआ है, वहीं नौकरी-पेशा लोगों की आर्थिकता भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
देश में अगस्त मास के प्रारम्भ से त्योहारों का मौसम शुरू हो जाता है। राखी से लेकर दीपावली तक देश के जन-मानस के मन में प्राय: उत्साह जागृत रहता है। इस काल में देश में स्वाभाविक रूप से आम आदमी का खर्च बढ़ता है, और इसी के अनुरूप महंगाई का आलम भी स्वत: शुरू हो जाता है, किन्तु इस वर्ष वस्तुओं एवं खाद्य पदार्थों में मूल्य-वृद्धि का जो दौर चला, वो अनवरत रूप से बढ़ता चला जा रहा है। दालों और सब्ज़ियों के दाम बढ़े हैं। फल खासकर सेब, पपीता और आम तो जैसे आम और गरीब आदमी की हैसीयत से बाहर हो गये हैं। चावल के दाम विगत दो-तीन वर्ष में निरन्तर बढ़ते गए हैं। खाद्य तेलों अथवा घी की कीमतें भी नीम पर चढ़े करेला जैसी कसैली हो गई हैं। यहां तक कि वैरायटी के नाम पर रसोई की आम वस्तु नमक की कीमतों में भी व्यापार जगत ने उछाल ला दिया है। जीवन-यापन के लिए आवश्यक प्राय: सभी वस्तुएं निरन्तर महंगी हुई हैं किन्तु खाद्यान्न पदार्थों के बढ़ते दामों ने नि:संदेह आम आदमी को चिन्तातुर किया है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी अन्तत: स्वीकार किया है कि इस वर्ष महंगाई की दर में अप्रत्याशित रूप से इज़ाफा हुआ है। सोना और चांदी तो जैसे आम और मध्यम-वर्गीय परिवारों के लिए सपने में दिखने वाली वस्तुएं हो गई हैं। दशकों पहले चुनावी फिज़ा में नारा लगा करता था—इक रुपये दा किलो आटा, एस सरकार नूं शरम दा घाटा। आज आटा 35 रुपये किलो तक बिक रहा है, किन्तु किसी सरकार, प्रशासन अथवा राजनीतिक दल ने आम और गरीब आदमी के हक में हाअ का नारा नहीं लगाया है।
इस महंगाई अथवा मूल्य-वृद्धि के अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु एक बड़ा और हालिया कारण धरती और आकाश के ज़रिये लड़े जा रहे दो-दो युद्ध भी हो सकते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध बेशक देश की सीमाओं से सैकड़ों मील दूर लड़ा जा रहा है, किन्तु इसके बारूदी सेंक ने पूरे विश्व को विचलित किया है। अमरीका-इज़रायल बनाम ईरान युद्ध ने तो देश के जन-जन को ताप से प्रभावित किया है। इन दोनों युद्धों में खर्च हुए अथवा हो रहे खरबों डॉलर की भरपाई अन्तत: दुनिया के आम आदमी से ही होगी न! मौनसून में देरी और इसके पथ-च्युत होने से भी मूल्य-वृद्धि को ताप मिला है। खरीफ की बुआई में होने वाली देरी से मूल्य-वृद्धि को और बल मिलने की भी बड़ी सम्भावना है। व्यापारी वर्ग के निजी लाभ की मात्रा बढ़ने से भी मूल्य वृद्धि में चक्र-वृद्धि जैसा माहौल बना है।
नि:संदेह यह सम्पूर्ण स्थिति देश और जन-साधारण के लिए किसी भी सूरत अच्छी नहीं है। इस कारण देश में एक ऐसा वातावरण उपजा है जिसमें आम आदमी का जीवन दुश्वार होता जा रहा है। देश में अगले कुछ मास त्योहारी मौसम होने के कारण भविष्य में इस माहौल के बदलने की भी कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती है। तथापि किसी भी लोकतंत्र में प्रजा के अधिकारों और आवश्यकताओं की रक्षा और पूर्ति का दायित्व सरकारों पर होता है। यह भी तय है कि पराये युद्धों और मौनसून में देरी जैसे मुद्दे भी पराये हाथों अथवा प्रकृति पर निर्भर हैं। तो भी, देश की सरकारें वस्तुओं के भण्डारण और अनावश्यक मूल्य-वृद्धि पर अंकुश लगा कर, जन-साधारण को महंगाई से यथा-सम्भव राहत दे सकती है। त्योहारों के आगामी मौसम में सरकार थोड़ी-सी सतर्कता बढ़ा कर महंगाई और मूल्य-वृद्धि को अनियंत्रित होने से अवश्य रोक सकती है। हम समझते हैं कि सरकारें खास तौर पर केन्द्र सरकार इस मुद्दे पर जितना सतर्क रहेगी, जन-साधारण के लिए माहौल उतना ही अधिक साज़गार बनने की सम्भावनाएं बनती चली जाएंगी।

