पीढ़ियों का विभाजन कितना उचित ?
मानव सभ्यता का इतिहास हज़ारों वर्षों के निरंतर विकास और सहज परिवर्तन की गाथा है। समय बदला, तकनीक बदली, रहन-सहन बदला, लेकिन समाज का मूल आधार हमेशा पीढ़ियों का आपसी तालमेल, सम्मान और अनुभवों का आदान-प्रदान ही रहा, परंतु बीते कुछ दशकों में पश्चिमी बाज़ार-व्यवस्था और समाज शास्त्र के नाम पर एक नया चलन ज़ोर पकड़ चुका है—लोगों को उनकी जन्मतिथि के आधार पर ‘जेन-एक्स’, ‘मिलिनियल्स’, ‘जेन-ज़ी’ और ‘जेन अल्फा’ जैसे सांचों में ढालना।
प्रथम दृष्टया यह विभाजन केवल शब्दावली या समाजशास्त्रीय अध्ययन का हिस्सा प्रतीत होता है, लेकिन गहराई से विश्लेषण करें तो यह वर्गीकरण भारतीय सामाजिक ताने-बाने और मानवीय स्वभाव के सर्वथा विपरीत और अप्राकृतिक लगता है। सभ्यता के इतने लंबे इतिहास के बाद अचानक से समाज को ऐसे कृत्रिम खंडों में बांटना न तो तर्कसंगत है और न ही समाज के स्वास्थ्य के लिए शुभ संकेत।
पीढ़ियां कभी भी कैलेंडर की तारीख देखकर अचानक नहीं बदलतीं। ऐसा नहीं होता कि 1996 में जन्मा व्यक्ति किसी एक विचार का है और 1997 में जन्म लेते ही बच्चा किसी बिल्कुल नई ‘जाति’ का हिस्सा बन गया। विचार, संस्कार और जीवन शैली में बदलाव एक बेहद धीमी, स्वाभाविक और निरंतर चलने वाली प्रक्त्रिया है। एक घर में दादा, पिता और पोते के बीच का वैचारिक अंतर समय का स्वाभाविक नियम है, लेकिन उस अंतर को ‘जेन-ज़ी’ या ‘जेन अल्फा’ जैसी अंग्रेज़ी संज्ञाओं से विभाजित कर देना, उस सहज पारिवारिक रिश्ते को एक कृत्रिम विभाजन में बदलने जैसा है।
इस नामकरण और श्रेणीकरण के पीछे सबसे बड़ा हाथ वैश्विक बाज़ार और उपभोक्तावादी संस्कृति का है। जब आप आबादी को उम्र के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांट देते हैं, तो उनके लिए अलग-अलग उत्पाद, अलग मनोरंजन और अलग तरह का विज्ञापन गढ़ना आसान हो जाता है। कंपनियों को ‘जेन-ज़ी’ को एक विशेष उपभोक्ता समूह बनाकर बेचना है और ‘जेन-अल्फ’ के लिए अलग बाज़ार तैयार करना है।
लेकिन इस बाज़ारवादी दृष्टिकोण का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह समाज में पीढ़ियों के बीच विषमता और अविश्वास का बीजारोपण कर रहा है। जब हम युवाओं को यह महसूस कराते हैं कि वे अपने से बड़ों से पूरी तरह ‘अलग’ हैं और बड़ों को यह सिखाते हैं कि वे आज के बच्चों को समझ ही नहीं सकते, तो हम अनजाने में उनके बीच संवाद के रास्ते बंद कर रहे होते हैं। इस तरह के वर्गीकरण का सीधा असर सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों पर पड़ रहा है जैसे :
संवादहीनता : जब यह मान लिया जाता है कि जेन-ज़ी की दुनिया और सोच पुरानी पीढ़ी से पूरी तरह भिन्न है तो दोनों ओर से बात करने का प्रयास ही कम हो जाता है।
अनुभव बनाम आधुनिकता का टकराव : पुरानी पीढ़ी को ‘आउटडेटेड’ (अप्रासंगिक) मान लिया जाता है और नई पीढ़ी को ‘दिशाहीन’ या ‘संवेदनहीन’। इससे परस्पर असम्मान की भावना को बल मिलता है।
पारिवारिक बिखराव : भारतीय संस्कृति ‘संयुक्त’ और ‘सह-अस्तित्व’ की संस्कृति रही है, जहां बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा मिलकर समाज को दिशा देते हैं। कृत्रिम श्रेणियों में बांटने से यह सह-अस्तित्व कमज़ोर होता है। भारतीय समाज में उम्र के पड़ाव को बाल्यकाल, युवावस्था, प्रौढावस्था और वृद्धावस्था के रूप में देखा गया है, जो कि जीवन का एक स्वाभाविक और जैविक प्रवाह है। यह वर्गीकरण किसी को एक-दूसरे से नीचा या अलग नहीं दिखाता, बल्कि जीवन के हर पड़ाव के अपने उत्तरदायित्व और मर्यादा तय करता है।
तकनीक का प्रभाव निश्चित रूप से हर नई पीढ़ी पर अलग होता है। आज का बच्चा स्मार्टफोन के साथ बड़ा हो रहा है, जबकि उसके माता-पिता ने कागज़ा-कलम से पढ़ाई की थी। लेकिन तकनीक में बदलाव का अर्थ यह कतई नहीं है कि मानवीय संवेदनाएं, नैतिक मूल्य और पारिवारिक जुड़ाव बदल गए हैं। तकनीक केवल एक साधन है, वह दो पीढ़ियों के बीच दीवार खड़ी करने का बहाना नहीं बन सकती।
समय आ गया है कि हम पश्चिमी बाज़ार द्वारा थोपे गए इन सतही और कृत्रिम शब्दों (जेन-ज़ी, जेन-अल्फा आदि) के अंधानुकरण से बचें। हमें यह समझना होगा कि युवा केवल किसी श्रेणी का हिस्सा नहीं हैं, वे हमारी परम्परा, संस्कार और भविष्य की कड़ी हैं।
यदि हम समाज को श्रेणियों और खानों में बांटते रहे, तो हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां हर पीढ़ी अपने ही बुलबुले में जीवन व्यतीत और दूसरों के प्रति असहिष्णु होगी। इसके विपरीत आवश्यकता इस बात की है कि हम पीढ़ियों के बीच के पुल को मज़बूत करें, न कि उनके बीच की खाई को नाम देकर उसे और गहरा करें। समाज का विकास विभाजन से नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच के आदर, संवाद और निरन्तरता से ही संभव है। (युवराज)



