बच्चें पर करियर का दबाव

मध्य वर्ग का पूरा परिवार उस युवा होते बच्चे की तरफ बड़ी उम्मीद से देख रहा होता है जो प्लस-टू के बाद आगे की लाइन चुन रहा होता है। पिछले दो-तीन दशक पहले दो ही विकल्प देखे जाते थे डाक्टर बनो या इंजीनियर। फिर जब डाक्टरी की पढ़ाई लाखों रुपये लगा भी पूरी न होती नज़र आई और इंजीनियर से बेहतर पलम्बर की कमाई ज्यादा नज़र आने लगी। कम्प्यूटर की तरफ ज़ोर डाला गया। एम.बी.ए. के लिए सीढ़ियां चढ़ना-उतरना कठिन लगने लगा और कोटा जैसी जगहों से आत्महत्या के समाचार आने लगे तो चिंता हुई विकल्प चुनने की। दरअसल इस करियर की दौड़ में विद्यार्थी की अपनी सोच बनती ही नहीं। या कहा जाए बनने ही नहीं दी जाती।
कहीं न कहीं वे दो पाटन के बीच फंसे होने की स्थिति में है। एक सरकार, जिसने नौकरियों के द्वार खोलने हैं और बिल्कुल न्यायपूर्ण ढंग से परीक्षा और प्रतियोगिता के अवसर देने हैं। दूसरा मां-बाप जो अपने अधूरे सपने बच्चों में देखने लगते हैं कि वे कब सलेक्ट होंगे और घर का हुलिया बदल डालेंगे। विद्यार्थी को दो फैसलों के बीच की खबराहट को झेलना होता है जो उसकी अपनी इच्छा-अनिच्छा से परे है। वह किसी पारिवारिक समारोह में जाता है तब भी उसके हंसने खेलने की बजाय कुछ प्रश्नवाचक निगाहें उससे सवाल कर रही होती हैं। अब क्या? उसकी शादी की बात को भी उसी अंदाज़ में परखा जाता है। यानी एक बोझ छूटा नहीं दूसरा सामने। यह युवक या युवती के लिए एक ऐसी कसरत है जिसमें उसकी योग्यता, क्षमता-अपना फैसला, सब कुछ पीछे रह जाता है। मिलता है तो एक अवाम तनाव। सबसे अफसोसजनक यह है कि पिछले तीन दशक से अधिक समय समाज के बनाये इसी दर्रे में गुज़रे हैं जिसमें जीवन इच्छा भी डगमगायी है। विचारणीय मामला यह है कि निर्णय किसका हो? माता-पिता के अधूरे सपनों से निकले रास्ते पर चलने का? अध्यापक का? विद्यार्थी का अपना? जवाब इतनी सरलता से नहीं दिया जा सकता? सभी की भूमिका है भी और नहीं भी। अध्यापक जिस तरह बच्चे को परख रहा है, माता-पिता नहीं परख सकते। बच्चे को किताबों के बोझ से लदा रातें जाग-जाग कर मेहनत करते देख उस तनाव को अपने भीतर महसूस करते हुए कई बार माता-पिता कुछ भी कहने से डरते हैं। बच्चा उनको पैसों का मुश्किल से इंतजाम करते देख, उनकी जिज्ञासा को अपने भीतर समेट चुप रह जाता है। परिवार छोटे हो गए हैं। चाचा, भुआ, मौसी, कोई ऐसा है नहीं जिससे मन की बात की जा सके। जो विषय रखवा दिए गए हैं। उनमें मन नहीं लग रहा, तब भी वही पढ़ने होंगे। छोड़ने और बदलने की न संभावना है न गुंजाइश। अपने भीतर की उथल-पुथल किसे बताएं किससे साझा करें। शिक्षक जो कुछ महसूस कर रहा है उसे माता-पिता तक कैसा पहुंचाए। वह न तो परिवार की आर्थिक स्थिति जानता है, न उसके परिवार का वातावरण, न यह कि उसका पीरियड खत्म होने के बाद बच्चा कहां जाता है, क्या करता है। पचास-सौ की क्लास को समझने वाले के पास इतना समय  कहां?

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