ग्यारह मौतें, ग्यारह सवाल, सोया हुआ क्यों है सिस्टम
मध्य प्रदेश के सागर में जहरीली शराब ने अब तक 11 ज़िंदगियां निगल लीं। बंडा क्षेत्र के नौराज, गोगरा (घूघरा खुर्द) और पाटन आदि गांवों में शनिवार रात लोगों ने शराब समझकर जो पिया, वह शराब नहीं, मौत का घोल था। कुछ ही देर में आंखों की रोशनी धुंधली हुई, चक्कर आने लगे, शरीर में कमजोरी आई और कई लोगों की सांसें थम गईं (कुछ मामलों में शरीर नीला पड़ने जैसे लक्षण भी देखे गए)। इसे महज ‘जहरीली शराब से मौत’ कहना असली अपराध को छोटा करना होगा। बोतल में मेथनॉल था, मगर उसके पीछे लापरवाही, भ्रष्टाचार की आशंका, निगरानी की विफलता और वह संवेदनहीन व्यवस्था थी, जिसमें गरीब की जान सबसे सस्ती समझी जाती है। ग्यारह शव केवल एक हादसे की कहानी नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर खड़े ग्यारह कठोर सवाल हैं।
ये मौतें अचानक आसमान से नहीं टपकीं। इनके पीछे नकली बोतलों, फर्जी लेबलों, नकली कोड और जहरीले तरल का वह नेटवर्क है जो बेखौफ अपना कारोबार चला रहा है। सीमा पार से नकली शराब आती है, गांवों तक पहुंचती है और उन जेबों तक जाती है, जहां वैध शराब महंगी और यह जहर सस्ता है। गरीब जानता है कि बोतल सस्ती है, मगर यह नहीं जानता कि उसके भीतर उसकी जिंदगी की कीमत छिपी है। यही इस धंधे की सबसे बड़ी क्रूरता है-वैध शराब पहुंच से बाहर, लेकिन अवैध जहर घर की चौखट पर। सवाल सीधा है- जब कारोबारी यह जहर गांवों तक इतनी आसानी से पहुंचा देते हैं, तो उसे रोकने वाली सरकारी मशीनरी आखिर किस मोड़ पर सोई रहती है?
हर ऐसी घटना के बाद व्यवस्था जागती है। दुकानें सील होती हैं, संदिग्ध हिरासत में लिए जाते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, अधिकारियों पर कार्रवाई और जांच के आदेश जारी होते हैं। अस्पताल भर जाते हैं, स्वास्थ्य टीमें गांवों में दौड़ती हैं और गंभीर मरीज दूर के अस्पतालों में भेजे जाते हैं। मगर यह सक्रियता एक कड़वा सवाल छोड़ जाती है-जब जहरीली शराब बिक रही थी, तब व्यवस्था कहां थी? क्या शासन की आंखें तभी खुलती हैं, जब मौतों का आंकड़ा दो अंकों में पहुंच जाता है? यदि कार्रवाई की शुरुआत शवों की गिनती से होती है, तो उसे रोकथाम कैसे कहा जाए? निलंबन और गिरफ्तारियां ज़रूरी हैं, मगर वे उन ग्यारह जिंदगियों की भरपाई नहीं कर सकतीं, जिन्हें अब लौटाया नहीं जा सकता।
सबसे बड़ी कीमत उन परिवारों ने चुकाई है, जिनसे अचानक कमाने वाला, पिता, पति या सहारा छिन गया। कहीं बच्चों के सिर से पिता का हाथ उठ गया, कहीं महिला पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ पड़ी, तो कहीं बुजुर्गों की बुढ़ापे की लाठी टूट गई। सरकारी मुआवजा ज़रूरी सहारा हो सकता है, मगर मौत से बनी वह खाली जगह कभी नहीं भर सकता। जांच समिति रिपोर्ट देगी, अधिकारी बयान देंगे, सुर्खियां बदलेंगी और समाज आगे बढ़ जाएगा लेकिन जिन घरों के चूल्हे के पास एक थाली हमेशा खाली रहेगी, वहां यह त्रासदी कभी पुरानी नहीं होगी। समाचार भुलाया जा सकता है, अपनों का जाना नहीं।
इस त्रासदी की जड़ केवल शराब की बोतल में नहीं, उन हालात में भी है जो लोगों को सस्ते नशे की ओर धकेलते हैं। कठिन मेहनत, अनिश्चित रोज़गार, आर्थिक तंगी और भविष्य की चिंता से राहत पाने के लिए लोग उसी नशे का सहारा लेते हैं, जो आसानी से मिल जाए। अवैध शराब का धंधा इसी मजबूरी को अपना बाजार बना लेता है। इसलिए मेथनॉल सिर्फ जहरीला रसायन नहीं, उस व्यवस्था का प्रतीक है जिसने गरीब की सुरक्षा को महत्व नहीं दिया। जब तक इन सामाजिक-आर्थिक मजबूरियों को दूर किए बिना केवल बोतलें पकड़ने की मुहिम चलेगी, बोतलें बदलती रहेंगी और खतरा बना रहेगा।
मध्य प्रदेश के सागर की यह घटना बताती है कि अवैध शराब का कारोबार किसी एक गांव या व्यक्ति तक सीमित नहीं। यदि सीमा पार से नकली बोतलें और जहरीला तरल लगातार पहुंच रहा है, तो स्थानीय ही नहीं, अंतर्राज्यीय स्तर पर भी निगरानी ज़रूरी है। छोटे विक्रेता को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं। उस पूरी आपूर्ति-श्रृंखला तक पहुंचना होगा, जहां नकली लेबल छपते हैं, कोड बनते हैं, जहरीली शराब तैयार होती है और फिर गांवों तक पहुंचती है। असली जांच यह भी पूछे कि यह नेटवर्क इतने समय तक चलता कैसे रहा। प्रशासन की जिम्मेदारी केवल अपराधी पकड़ना नहीं, उस रास्ते को बंद करना भी है, जिससे अपराध बार-बार लौटता है।
अब उस पुराने सरकारी नाटक को खत्म करने की ज़रूरत है, जिसमें हादसे के बाद निलंबन, गिरफ्तारी, जांच, मुआवजा और आश्वासन का दौर चलता है और कुछ समय बाद सब शांत हो जाता है। सुरक्षित आजीविका, सतत निगरानी, नकली शराब के स्रोत पर प्रहार, गांवों में जागरूकता, तत्पर स्वास्थ्य सेवाएं और प्रभावी सामाजिक हस्तक्षेप-इन सब पर एक साथ काम करना होगा। गरीब से केवल यह कहना कि जहरीली शराब मत पीओ, पर्याप्त नहीं। उसे ऐसा सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देना होगा, जिसमें सस्ता नशा उसकी मजबूरी न बने। वरना अगली त्रासदी में फिर वही कैमरे, वही बयान और वही आंसू होंगे।
सागर की ग्यारह मौतों को आंकड़ा बना देना आसान है, उनसे सबक लेकर व्यवस्था बदलना कठिन। मगर असली परीक्षा यही है। यदि इन मौतों के बाद भी गिरफ्तारियों और मुआवजे को ही कार्रवाई मान लिया गया, तो मृतकों के साथ न्याय नहीं हुआ। जहरीली शराब की एक बोतल ने ग्यारह जानें लीं लेकिन उसके पीछे खड़ी व्यवस्था की लापरवाही इससे बड़ी त्रासदी का रास्ता खोल सकती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि जहरीली शराब किसने बनाई, सवाल यह भी है कि उसे बनने, बिकने और गांवों तक पहुंचने से किसने नहीं रोका? सागर की धरती से उठता संदेश साफ है-गरीब की जान कोई आंकड़ा नहीं। शासन की जिम्मेदारी मौत के बाद शुरू नहीं, मौत से पहले पूरी होनी चाहिए।



