सिर्फ तीन फिल्मों ने बना दिया के. आसिफ को लीजेंड
एक शाम संगीतकार नौशाद हारमोनियम पर बैठे हुए किसी फिल्म की धुनें तैयार कर रहे थे कि एक अजनबी ने उनके घर में प्रवेश किया और नोटों का बंडल हारमोनियम पर फेंकते हुए कहा, ‘आप मेरी फिल्म मुगले-आज़म में संगीत दे रहे हैं।’ इस बदतमीज़ी पर अपमान महसूस करते हुए नौशाद ने नोटों के बंडल को अपने टेरेस पर फेंक दिया, जहां से नोट सूखे हुए पत्तों की तरह इधर-उधर उड़ने लगे और असमंजस में पड़ा हाउस स्टाफ नोटों को एकत्र करने लगा। यह घमंडी मेहमान कोई और नहीं बल्कि फिल्म निर्देशक के आस़िफ थे। यह 1950 के दशक के शुरुआत की बात है जब भारतीय सिनेमा में उनकी कोई खास पहचान नहीं थी। लेकिन ‘मुगल-ए-आज़म’ (1960) के लिए उनकी कल्पना की कोई सीमा नहीं थी- न समय की, न संयम की और न लत की।
आखिरकार नौशाद बोर्ड पर आ गये और इन दोनों के रचनात्मक गठजोड़ से भारतीय सिनेमा को अपना महानतम संगीत मिला- जब प्यार किया तो डरना क्या, मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे, बेकस पे करम कीजिये सरकारे-मदीना, मुहब्बत ज़िंदाबाद आदि। ‘दास्ताने-मुगल-ए-आज़म’ पुस्तक के लेखक राजकुमार केसवानी ने कहा, ‘इस व्यक्ति (के आस़िफ) की खूबी यह थी कि उसने एक सुंदर सपना देखा और उसने उस सपने को हकीकत में बड़े पर्दे पर हूबहू वैसे ही उतार दिया जैसा कि उसने देखा था। इस एक व्यक्ति ने लाखों लोगों को साहस व विश्वास दिया कि वह भी अपने ख्वाबों को हकीकत का रूप दे सकते हैं।’
के आस़िफ के शब्दकोश में ‘समझौता’ शब्द मौजूद ही नहीं था। इसलिए उन्होंने अपनी कल्पना से कभी कोई समझौता नहीं किया, भले ही आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा हो, एक्टर्स को बदलना पड़ा हो (पहले राज कपूर व नर्गिस फिल्म में थे), हर मोड़ पर प्रोडक्शन में देरी हुई हो। लेकिन वह अपने सपने को साकार करने में मुस्तैदी से लगे रहे। अपनी इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ सच्चे मोतियों के इस्तेमाल पर बल दिया बल्कि जब बैकग्राउंड में तानसेन की ‘आवाज़’ देने की बात आयी तो वह नौशाद को लेकर उस्ताद बड़े गुलाम अली खां के पास पहुंच गये, जो फिल्मों में गाना पसंद नहीं करते थे। उस्ताद ने के. आस़िफ को टालने के उद्देश्य से कहा कि वह गाने के 25,000 रूपये लेंगे, जो उस ज़माने में बहुत बड़ी रकम थी कि मुहम्मद ऱफी व लता मंगेशकर जैसे स्थापित गायकों को एक गाने के 200-400 रूपये ही मिलते थे। उस्ताद की रकम सुनकर आस़िफ ने कहा, ‘उस्ताद! बस इतने ही।’ और अपनी जेब से 25,000 रूपये निकालकर दे दिये। मजबूरन उस्ताद को मुगल-ए-आज़म के लिए गाना पड़ा (प्रेम जोगन बन के और शुभ दिन आयो)।
के. आस़िफ का जब 9 मार्च 1971 को निधन हुआ तो वह ‘लव एंड गॉड’ का निर्देशन कर रहे थे। उनकी यह अंतिम फिल्म अधूरी रही और उनके जाने के बाद 1986 में ही रिलीज़ हो सकी। आस़िफ की सिर्फ तीन फिल्में ही रिलीज़ हो सकीं, लेकिन उन्हें लीजेंड बनाने के लिए यही पर्याप्त रहीं। लोग अक्सर ‘वक्त’ को बॉलीवुड की पहली मल्टी-स्टार फिल्म कहते हैं, लेकिन आस़िफ तो यह काम बहुत पहले 1945 में ‘फूल’ के साथ कर चुके थे, जब वह पृथ्वीराज कपूर, सुरैया, दुर्गा खोटे आदि बड़े नामों को एक साथ पर्दे पर लाये, जबकि उस दौर में यह काम लगभग असंभव था। इतनी कम फिल्मों का निर्देशन करने की वजह से बहुत से निर्देशक तो समय के साथ गुमनामी के अंधेरे में खो जाते, लेकिन मुगल-ए-आज़म ने सुनिश्चित किया कि के. आस़िफ के नाम को कभी भुलाया नहीं जायेगा।
के. आस़िफ का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ था। वह मात्र 17 वर्ष की आयु में म़ुगल साम्राज्य पर फिल्म बनाने जैसे बड़े सपने लेकर बॉम्बे आये। उनके चाचा ने उनके लिए टेलर की दुकान खुलवा दी, लेकिन आसिफ की दिलचस्पी कपड़े सीने की बजाय महिला ग्राहकों को प्रभावित करने में अधिक थी। यह देखते हुए कि आस़िफ की दिलचस्पी कहां है, चाचा ने उन्हें फिल्म निर्माण की ओर धकेल दिया। आस़िफ 20-22 साल की आयु तक निर्देशक बन चुके थे। उनकी पहली फिल्म ‘फूल’ बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त हिट रही, लेकिन आस़िफ के सपने तो इससे बहुत बड़े थे- अकबर, सलीम व अनारकली की कहानी पर। वह फिल्म बनाते नहीं थे बल्कि उन्हें तराशते थे संगमरमर की तरह। इसके लिए चाहे खर्च कितना ही हो जाये। मुगल-ए-आज़म बनाते हुए वह स्वयं दिवालिया हो गये, 15 मिलियन रूपये का कज़र् हो गया। लेकिन वह घबराये नहीं और अपने समय की सबसे महंगी भारतीय फिल्म बना डाली। पर्फेक्शन से कम उन्हें कुछ चाहिए ही नहीं था, जिस कारण उनका फाइनेंसर्स, एक्टर्स, तकनीशियनों आदि से टकराव होता रहता था। अगर कोई चीज़ उनके पैमाने पर खरी न उतरती तो उसे दोबारा करते। आस़िफ जुआरी थे, ड्रीमर थे, आर्टिस्ट थे, जिन्होंने एक फिल्म पर अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया। प्रेम चोपड़ा ने कहा, ‘आस़िफ तो ऐसे निर्देशक थे जो फिल्म पूरी करने के लिए अपनी आखिरी कमीज़ भी बेच देते। वह एकदम फकीर थे... लेकिन उन्होंने कालजयी फिल्म बनायी।’
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





