आस्था, उत्सव और लोक परम्पराओं में दशहरा

20 अक्तूबर दशहरा पर  विशेष

भारत ऐसा देश है, जहां हर पर्व न केवल आस्था का प्रतीक होता है बल्कि जीवन के उत्साह और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन भी होता है। 20 अक्तूबर को मनाया जा रहा विजयदशमी या दशहरा भी ऐसा ही पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश लेकर आता है। यह पर्व राम-रावण युद्ध की याद दिलाता है, जब भगवान श्रीराम ने असत्य और अधर्म के प्रतीक रावण का वध कर धर्म की स्थापना की थी। दिलचस्प बात यह है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को मनाने के तौर-तरीके एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। कहीं पुतला दहन होता है, कहीं रथयात्रा निकलती है, कहीं नृत्य-नाट्य प्रस्तुत होते हैं तो कहीं पूजा और व्रत का विशेष आयोजन।
भारत में दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि सांस्कृतिक विविधता का उत्सव है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक हर क्षेत्र इसे अपने ढ़ंग से मनाता है। कहीं देवताओं का संगम है, कहीं शौर्य की पूजा, कहीं भक्ति का नृत्य तो कहीं लोककला का उत्सव। हालांकि सभी का मूल संदेश एक ही है, सत्य की विजय और असत्य का अंत। यह पर्व हमें यही सीख देता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंतत: जीत अच्छाई की ही होती है। आइए एक सांस्कृतिक यात्रा पर निकलते हैं और देखते हैं कि कैसे दशहरा देशभर में विविध रंगों के साथ मनाया जाता है।
कुल्लू का अनोखा दशहरा : देवताओं का संगम
यदि आप हिमालय की वादियों में बसे कुल्लू पहुंचें और दशहरे का समय हो तो आपको यहां एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलेगा। यहां दशहरे का स्वरूप देशभर से बिल्कुल अलग है। न रामलीला, न रावण दहन और न ही आतिशबाजी। इसके विपरीत यहां का दशहरा देवताओं का महासंगम होता है। कुल्लू घाटी के गांव-गांव से सजे-धजे रथों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां निकलती हैं और विशाल मैदान में एकत्रित होती हैं। यहां रघुनाथ जी का भव्य दरबार सजता है। मान्यता है कि रावण के अत्याचारों से त्रस्त होकर घाटी के देवी-देवताओं ने श्रीराम से प्रार्थना की थी और जब रघुनाथ जी ने रावण का वध किया तो सबने आभार स्वरूप उन्हें अपना आराध्य देव मान लिया। यही कारण है कि आज भी दशहरे के मौके पर घाटी के सभी देवता रघुनाथ जी के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। विशेष बात यह है कि जब पूरे देश में दशहरा खत्म हो जाता हैए उसी दिन कुल्लू का दशहरा शुरू होता है और पूरे सात दिनों तक चलता है। पहले यहां पशु बलि की परंपरा थी, जिसे अब सांकेतिक बना दिया गया है। इस आयोजन की शुरुआत 17वीं शताब्दी में राजा जगतसिंह ने की थी, जो आज विश्व प्रसिद्ध है।
बैजनाथ : जहां नहीं होता रावण दहन
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले का बैजनाथ शहर भी दशहरे के अवसर पर विशेष चर्चा में रहता है लेकिन यहां दशहरे का आयोजन नहीं होता। इसका कारण एक अद्भुत मान्यता है। कहा जाता है कि रावण ने बैजनाथ शिव मंदिर क्षेत्र में कठोर तपस्या की थी और भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। इसीलिए यहां रावण के पुतले का दहन करना अनुचित माना जाता है। बताया जाता है कि कुछ वर्ष पहले यहां दशहरा मनाने की कोशिश की गई थी लेकिन उस दौरान कई अनिष्टकारी घटनाएं घटित हुई और लोगों ने इसे अपशकुन मानकर दशहरा मनाना बंद कर दिया। यह उदाहरण दर्शाता है कि भारत की आस्थाएं कितनी गहराई से जुड़ी हैं और कैसे हर क्षेत्र अपनी मान्यताओं के अनुसार परंपराएं गढ़ता है।
अमृतसर : हनुमान की गूंज
पंजाब का अमृतसर दशहरे के दौरान अद्भुत उल्लास से भर उठता है। यहां की गलियों और चौपालों में जब रामलीला होती है तो बच्चों की टोली हनुमान का रूप धरकर ढ़ोलक की थाप पर नाचते-गाते दिखाई देती है। लाल वस्त्रों में, हाथों में छोटी-छोटी गदाएं थामे, वानर सेना के स्वरूप में ये बच्चे पूरे माहौल को हनुमानमय बना देते हैं। कहा जाता है कि अश्वमेध यज्ञ के समय जब लव-कुश ने श्रीराम के घोड़ों को रोक लिया था, तब उन्हें छुड़ाने के लिए श्रीराम ने हनुमान को अमृतसर की धरती पर भेजा था। यही कारण है कि यहां दशहरा केवल रावण वध का उत्सव नहीं बल्कि हनुमान भक्ति का भी पर्व है।
काशी और अवध : रामलीला का अद्वितीय वैभव
उत्तर प्रदेश में दशहरे का रंग सबसे भव्य रूप में नज़र आता है। चाहे लखनऊ हो या प्रयागराज अथवा काशी, हर जगह रामलीलाओं का भव्य मंचन होता है। काशी में तो केवल रामलीला ही नहीं, कृष्णलीला, शिवलीला और विष्णुलीला भी दशहरे के दौरान देखने को मिलती हैं। काशी नरेश स्वयं हाथी पर सवार होकर दशहरे के मेले में शामिल होते थे और यह परंपरा वर्षों तक लोगों को आकर्षित करती रही।
बिहार : दुर्गा पूजा और दशहरा साथ-साथ
बिहार में दशहरा दुर्गा पूजा के साथ मनाया जाता है। नौ दिनों तक दुर्गा पूजा के बाद दशहरे के दिन प्रतिमाओं का विसर्जन होता है, साथ ही रावण वध का आयोजन भी होता है। शहरों और कस्बों में बड़े-बड़े मेले लगते हैं, झूले और मिठाईयों की दुकानों से वातावरण उत्सवमय हो उठता है। यहां दशहरा केवल धार्मिक ही नहीं, सामाजिक मेल-जोल का भी पर्व है।
हरियाणा : ज्वारे और आशीर्वाद
हरियाणा में दशहरे की शुरुआत श्राद्ध पक्ष के बाद ज्वारे बोने से होती है। बच्चे इन्हें घर के बड़े-बुजुर्गों को भेंट करते हैं और आशीर्वाद पाते हैं। व्यापारी वर्ग इस दिन से नए बही-खाते बनाता है, जिसे शुभ माना जाता है। शाम को रामलीला और आतिशबाजी का आयोजन पूरे जोश के साथ होता है।
पश्चिम बंगाल : दुर्गोत्सव की धूम
यदि दशहरे के दौरान कहीं सबसे ज्यादा उमंग और भक्ति का संगम होता है तो वह है पश्चिम बंगाल। यहां दुर्गा पूजा की भव्यता देखते ही बनती है। विशाल प्रतिमाओं, आकर्षक पंडालों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और धार्मिक उत्साह से पूरा बंगाल सजीव हो उठता है। दशहरे के दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं का जल में विसर्जन होता है। ढ़ोल-नगाड़ों की गूंज और धुनों के बीच जब प्रतिमाएं गंगा या अन्य नदियों में प्रवाहित होती हैं तो वातावरण अत्यंत भावुक हो जाता है।
राजस्थान : शस्त्र पूजा और रावण की पिटाई
राजस्थान में दशहरे को ‘वीरों का पर्व’ कहा जाता है। यहां शस्त्र पूजा और शमी वृक्ष की आराधना की जाती है लेकिन हाड़ोती क्षेत्र का दशहरा सबसे अलग है। यहां मिट्टी से बना रावण का पुतला तैयार किया जाता है। लोग पहले उस पर पत्थर फैंकते हैं, फिर उसे लाठियों से पीटते हैं। मान्यता है कि इससे बीमारियां दूर होती हैं और लोग स्वस्थ रहते हैं। यह परम्परा 13वीं सदी से चली आ रही है।
महाराष्ट्र : सोना पत्ती की परम्परा
महाराष्ट्र में दशहरे पर शमी वृक्ष की पत्तियां ‘सोना’ मानी जाती हैं। लोग इन्हें आपस में बांटते हैं और गले मिलकर शुभकामनाएं देते हैं। कहा जाता है कि रावण वध के बाद विभीषण ने लंका का सोना लोगों में बांटा था, उसी की स्मृति में यह परंपरा है। इसके अलावा पांडवों ने भी अपने हथियार अज्ञातवास के समय शमी वृक्ष के नीचे छिपाए थे। यही कारण है कि यहां दशहरा विजय और समृद्धि का प्रतीक बन गया है।
गुजरात : गरबा और नवरात्रि की रौनक
गुजरात में दशहरा नवरात्रि की रौनक के साथ मनाया जाता है। नौ रातों तक गरबा और डांडिया का उत्सव चलता है। रंग-बिरंगे परिधान पहने युवक-युवतियां लोकनृत्य में भाग लेते हैं। दशहरे की शाम को रावण दहन के साथ उत्सव का समापन होता है। यहां मिट्टी के मटकों में दीये जलाकर मोहल्लों के चौराहों पर टांगने की परंपरा भी देखने लायक होती है।
दक्षिण भारत : गुड़ियों और नृत्य-नाट्य की परम्परा
दक्षिण भारत में दशहरे का स्वरूप बेहद सांस्कृतिक है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में घरों में गुड़ियों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। महिलाएं उन्हें सजाती हैं और पूजा करती हैं। तमिलनाडु में -बोम्बलाट्टम’ नामक पुतली नृत्य बहुत लोकप्रिय है। वहीं केरल में रामकथा का प्रस्तुतीकरण ‘कथकली’ नृत्य के माध्यम से होता है। यह केवल उत्सव ही नहीं बल्कि कला और संस्कृति की जीवंत झांकी है।

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