विश्व कप जीतने के लिए संतुलन को वरीयता


इंग्लैंड में आगामी 30 मई से खेले जाने वाले आईसीसी क्रिकेट विश्व कप के लिए भारत ने जो 15 सदस्यों की टीम की घोषणा की है उसमें कुछ महत्वपूर्ण नाम नहीं हैं, लेकिन तीसरी बार विश्व कप जीतने की चाहत में चयनकर्ताओं ने व्यक्तिगत क्षमता की जगह टीम के संतुलन पर अधिक ध्यान दिया है और खिलाड़ियों के वर्तमान फॉर्म पर भी, जोकि अच्छी बात है। यह भी सराहनीय है कि टीम चयन में हाल में खेले जा रहे आईपीएल प्रदर्शन को संज्ञान में नहीं लिया गया है क्योंकि एक दिवसीय व टी-20 फॉर्मेट पूर्णत: अलग हैं। गौरतलब है कि भारत ने 1983 (इंग्लैंड) व 2011 (भारत) में विश्व कप अपने नाम किया था। विराट कोहली की कप्तानी में यह पहला विश्व कप होगा। कागज पर तो टीम संतुलित व मजबूत नजर आ रही है, पिछले कुछ माह के प्रदर्शनों को देखते हुए जीत की प्रबल संभावना भी है, अब होता क्या है, यह समय ही बतायेगा। बहरहाल, दो नाम जिनकी संभावना टीम में होने की बहुत थी- विकेटकीपर ऋषभ पंत व मध्यक्रम के बल्लेबाज अम्बाती रायडू- का न होना चर्चा का विषय अवश्य है। पंत ने बल्ले से अपने हाल के प्रदर्शन से मजबूत दावेदारी पेश की थी, लेकिन चयनकर्ताओं को लगा कि बैक-अप विकेटकीपर के स्पॉट के लिए दिनेश कार्तिक बेहतर रहेंगे। मुख्य विकेटकीपर एमएस धोनी हैं, जिनके नेतृत्व में भारत ने 2011 का विश्व कप जीता था।  अधिक बड़ा डिबेट बल्लेबाजी क्रम में नंबर 4 स्पॉट के लिए था। इसके लिए अम्बाती रायडू की जगह हरफनमौला खिलाड़ी विजय शंकर को चुना गया। शायद इसलिए कि शंकर मध्यम तेज गति की गेंदबाजी भी कर लेते हैं, जो इंग्लैंड की स्विंग को मदद करने वाली स्थितियों में काफी लाभकारी हो सकती है। ध्यान रहे कि भारत ने 1983 में कपिल देव के नेतृत्व में इंग्लैंड ही में जो अपना पहला विश्व कप जीता था, वह मध्यम तेज गति से गेंद फेंकने वाले हरफनमौला खिलाड़ियों- रॉजर बिन्नी, मोहिंदर अमरनाथ, मदन लाल व बलविंदर सिंह संधू- के शानदार प्रदर्शन की बदौलत संभव हो सका था। तेज गेंदबाज कपिल देव स्वयं हरफनमौला खिलाड़ी थे और जिम्बाब्वे के खिलाफ  उनकी 175 रन की पारी, जब भारत के मात्र 19 रन पर पांच खिलाड़ी आउट हो गये थे, विश्व कप इतिहास की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक है। इन्हीं हरफनमौला खिलाड़ियों के कारण भारत ने फाइनल में वेस्टइंडीज (जो उस समय विश्व की सबसे मजबूत टीम थी) को मात्र 183 रन का लक्ष्य देकर भी मैच जीत लिया था। इसी जीत के कारण भारत में ऐसी क्रिकेट क्रांति आयी कि इस खेल ने लगभग धर्म का दर्जा प्राप्त कर लिया है, और सर्वकालिक महानतम बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के भगवान हैं। एक बैक-अप ओपनर के रूप में के.एल. राहुल का चयन टीम को आवश्यकता पड़ने पर अन्य विकल्प भी प्रदान करता है। सलामी बल्लेबाजी के लिए रोहित शर्मा व शिखर धवन स्वाभाविक नाम थे, इसके बावजूद भारत की संभावित सफलता में कप्तान विराट कोहली के कंधों पर ही बल्लेबाजी को दिशा देने की अधिक जिम्मेदारी होगी। टीम में दो और आल-राउंडर हैं- हार्दिक पंड्या व रविन्द्र जडेजा। कुलदीप यादव व युज्वेंद्र चहल विशेषज्ञ स्पिनर हैं। टीम में जो तीन तेज गेंदबाज- भुवनेश्वर कुमार, मुहम्मद शमी व जसप्रीत बुमराह- हैं, वह अपने फॉर्म व काबिलियत पर अपनी जगह बनाये हुए हैं। कुल मिलाकर तथ्य यह है कि चयनकर्ताओं ने व्यक्तिगत क्षमता की तुलना में संतुलन पर बल दिया है, जो इस अर्थ में सही है कि व्यक्तिगत प्रदर्शन के महत्व के बावजूद क्रिकेट आखिरकार टीम गेम है। टीम जब एकजुट होकर अच्छा प्रदर्शन करती है तो जीत की संभावना बढ़ जाती है, व्यक्तिगत प्रदर्शन से भी टीम जीतती है, लेकिन कभी-कभार ही, बड़ी प्रतियोगिता जीतने के लिए टीम प्रयास आवश्यक होता है। विजय के लिए कोहली की बल्लेबाजी और धोनी का अनुभव आवश्यक है। युवा खिलाड़ियों को एक यूनिट की तरह इन दोनों की मदद करनी होगी। मेजबान इंग्लैंड इस समय एक दिवसीय फॉर्मेट की सबसे मजबूत टीम है। ऑस्ट्रेलिया सही समय पर पीक कर रही है, दक्षिण अफ्रीका चोकर के टैग को दफनाने के प्रयास में है, न्यूजीलैण्ड संतुलित टीम है और दोनों पाकिस्तान व वेस्टइंडीज के बारे में यही है कि वह कभी भी खतरनाक हो सकती हैं। अत: यह आज तक का सबसे खुला विश्व कप है, जरा-सी लापरवाही घातक हो सकती है। इसलिए यह भी जरूरी है कि भारत की ताकत, कमजोरी का मूल्यांकन कर लिया जाये।भारत के जो शुरुआती तीन बल्लेबाज हैं, वह इस समय विश्व में टॉप पर हैं। रोहित शर्मा एकमात्र खिलाड़ी हैं जिनके ओडीआई में तीन दोहरे शतक हैं, प्रमुख प्रतियोगिताओं में शिखर धवन हमेशा बेहतर प्रदर्शन करते हैं, और कोहली आज सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज हैं। इसके अतिरिक्त भारत के पास सबसे संतुलित गेंदबाजी है, जो इसलिए अधिक खतरनाक हो जाती है कि स्टंप्स के पीछे से धोनी महत्वपूर्ण इनपुट्स देते रहते हैं। यह तो है भारत की ताकत और कमजोरी यह है कि अगर टॉप तीन बल्लेबाज फ्लॉप हो जाएं तो मध्यक्रम अक्सर बिखर जाता है और नंबर 4 स्पॉट अब भी चिंता का विषय है। आज जब इंग्लैंड जैसी टीमें आसानी से 350 का स्कोर कर रही हैं, भारत अब भी अक्सर एक्सलेटर पर पैर नहीं रखता है, जो हाई स्कोरिंग मैच में घातक हो सकता है। यादव, चहल, बुमराह व शमी बहुत लम्बी टेल बना देते हैं और जडेजा भी अक्सर बल्ले से प्रभावित नहीं कर पाते हैं। इस समय भुवनेश्वर फॉर्म में नहीं हैं, इसलिए स्लॉग ओवर्स भारत के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं। इसके बावजूद भारत के अवसर यह है कि हर टीम आपस में खेलेंगी, जिससे निरंतरता महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर भारत की अनुभवी टीम विश्व में अपने दूसरे स्थान की रैंकिंग से इंसाफ  करती है तो सेमी फाइनल तक पहुंचने में उसे कोई कठिनाई नहीं होगी। भारत के पास अपनी 1983 की परीकथा जीत को दोहराने का सुनहरी अवसर है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर