बेटे का  समर्पण


12 साल के बालक ने बड़े आश्चर्य में भोजन करना छोड़कर अपनी रोती विधवा मां से पूछा-‘मां तुम क्यों रो रही हो?’ मां ने टालते हुए कहा, ‘कोई बात नहीं है।’ परन्तु बालक को संतुष्टि नहीं हुई। रहस्य को जानने की उसकी इच्छुकता और अधिक हो गई। उसने कहा, ‘नहीं, मां अवश्य कोई बात होगी?’ मां ने बताया, ‘बेटा तुम्हारा भाग्य बड़ा बलवान है। एक दिन तुम बड़े आदमी बनोंगे। तुम बहुत धनवान और यंशस्वी होगे।’ मां की बात सुनकर उसने कहा-‘मां इसमें रोने की क्या बात है? यह तो प्रसन्नता की बात है।’ विधवा मां ने रोते-रोते कहा-‘बेटा जब आदमी धनवान और यशस्वी हो जाता है तो यह आदमी की फितरत है कि वह सब रिश्ते-नातों को ताक पर रख देता है, इसलिए मुझे रोना आ रहा है कि मेरा एकमात्र सहारा छूट जाएगा और मैं किस सहारे जिऊंगी।’ बालक तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न था। उसके मन में बार-बार यह सवाल उठ रहा था कि आखिर मेरी मां को पता कैसे चला? बालक की जिद देखकर, मां को सारी बात बतानी पड़ी। मां ने बताया कि बेटा एक बड़े ज्योतिषी ने तुम्हारे सामने  के दो दांत बाहर निकले देखकर यह बताया था कि तुम बड़े होकर बहुत शोहरत को हासिल करोगे। मां के दु:ख से दुखी होकर बालक तत्काल उठा और बोला, ‘मां अभी आता हूं। झट-पट उस बच्चे ने बाहर जाकर पत्थर से अपने आगे के दोनों दांतों को तोड़ दिया। लहूलुहान बालक ने मां से कहा, ‘अब मुझे धन दौलत और शोहरत हासिल नहीं होगी। अब मैं बड़ा होकर मां की सेवा करूंगा।’ मां ने रोते हुए बच्चे को सीने से लगा लिया। यह बालक आगे चलकर बड़ा विद्वान बना, जो पूरी उम्र कुंवारा रहकर केवल अपनी मां की सेवा में तल्लीन रहा।

— राम प्रकाश शर्मा