पर्यावरणीय घटकों के संरक्षण का संकल्प लिया जाए

प्रकृति एवं पर्यावरण भयंकर प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। सांस लेना कठिन होता जा रहा है, फिर ऐसे में नव वर्ष के उल्लास के साथ चिंतन करते हुए संकल्प की ओर बढ़ना ही उचित है। जल, वायु, नदियां, समुद्र, धरती, पहाड़, जंगल, ग्लेशियर, विभिन्न प्रकार जीव-जंतु और वनस्पतियां आदि पर्यावरणीय घटक हैं। ये घटक आज गंभीर प्रदूषण की गिरफ्त में है अथवा अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। परिणामस्वरूप इन घटकों का विकृत होना अथवा असंतुलित होना मानव सहित समूची जीव सृष्टि के लिए खतरा बनता जा रहा है। अब यह खतरा प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा है। 
विगत लंबे समय से दिल्ली-एनसीआर की हवा गंभीर और बेहद गंभीर श्रेणी में चल रही है। घरों से निकलना मुश्किल हो गया है। इससे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिकता पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। ब्रिटेन स्थित भारतवंशी डाक्टरों ने वायु प्रदूषण को कोरोना महामारी के बाद सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट बताया है। दिल्ली एनसीआर में सांस की बीमारियों से जूझ रहे लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक आयु वर्ग के लोग सिर दर्द, थकान, हृदय रोग, खांसी, बुखार, गले एवं आंखों में जलन और सूखापन, त्वचा के रोग व बार-बार संक्रमण जैसी परेशानियों से जूझ रहे हैं। प्रदूषण की अधिकता ने हवा को ज़हरीला बना दिया है। वाहनों, उद्योगों और विद्युत् संयंत्रों की धूल, धुआं व घातक रसायन जीवन पर भारी पड़ रहे हैं। सेंटर फार रिसर्च आन एनर्जी एंड क्लीन एयर की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश के करीब 78 प्रतिशत ताप बिजली संयंत्रों में सल्फर डाइआक्साइड को नियंत्रित करने की प्रणाली नहीं है और प्रदूषण फैलाने में ताप बिजली संयंत्रों की बड़ी ज़िम्मेदारी है। क्या इन्हें मानकों के अनुरूप संचालित करना शासन-प्रशासन की ज़िम्मेदारी नहीं है?
अधिकतर नदियां भयंकर प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। महानगरों का अशोधित सीवेज और औद्योगिक कचरा सीधे नदियों में गिर रहा है। विडंबना यह भी है कि विभिनन्न प्रदेशों में सीवेज शोधन हेतु सीवरेज ट्रीटमैंट प्लांट (एसटीपी) पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। जितने हैं, वे भी समुचित रूप में काम नहीं कर रहे हैं। शासन- प्रशासन की सुस्ती से यह स्थिति और भी चिंताजनक बनती जा रही है। 
दिसम्बर 2024 की एक रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि अकेले उत्तर प्रदेश में गंगा व सहायक नदियों में 225 नाले सीधे मिल रहे हैं और लगभग 1100 मिलियन लीटर सीवेज प्रतिदिन सीधे नदियों में गिर रहा है। बंगाल के 27 शहरों में कुल 41 एसटीपी हैं जिनमें से अधिकांश मानकों के अनुरूप काम नहीं कर रहे हैं। पूरे बिहार में केवल 20 एसटीपी के सहारे ही काम चल रहा है। दिल्ली में भी 37 एसटीपी हैं जिनमें से लगभग 16 ही क्षमता के अनुरूप काम कर रहे हैं। दिल्ली सहित देश के विभिन्न महानगरों में छोटे बड़े सैकड़ों नाले सीधे नदियों में गिर रहे हैं।  वन क्षेत्र धरती के फेफड़े कहे जाते हैं। लेकिन पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से भी लोग अनभिज्ञ नहीं हैं। प्रत्येक वर्ष करोड़ों पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन उनके संरक्षण-संवर्धन की समुचित योजनाएं नहीं हैं। 
बोतलें, पॉलिथीन, खिलौने आदि के रूप में प्लास्टिक सूक्ष्म रूप में पर्यावरणीय घटकों को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहा है। कूड़े के रूप में प्लास्टिक के संग्रहण एवं निस्तारण की समुचित व्यवस्था नहीं हैं। लोग प्लास्टिक और कूड़े को इकट्ठा करके आग लगा देते हैं अथवा जल स्रोतों में फैंक देते हैं। धरती से हमें खाद्यान्न और भिन्न-भिन्न प्रकार की जीवन रक्षक औषधियां प्राप्त होती हैं। रासायनिक खादों के अधिकाधिक प्रयोग से धरती का स्वास्थ्य निरंतर गड़बड़ा रहा है और भूजल प्रदूषित हो रहा है। खाद्य पदार्थ ज़हरीले हो रहे हैं।  विकास और पर्यटन के नाम पर पहाड़ों में मानवीय हस्तक्षेप निरंतर बढ़ रहा है। पहाड़ों में दुर्गम स्थानों पर पहुंचने के लिए सड़कों व सुरंगों का जाल बिछाया जा रहा है। परिणामत: पहाड़ों के दरकने, टूटने व भू-स्खलन की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं।
विभिन्न प्रकार का कचरा जीवन और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार देशभर में प्रतिवर्ष 6.20 करोड़ टन कचरा निकलता है जिसमें से 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा, 1.7 लाख टन जैव चिकित्सा कचरा, 79 लाख टन खतरनाक अपशिष्ट, 15 लाख टन ई-कचरा और 4.30 करोड़ टन एजेंसियों द्वारा एकत्र किया जाने वाला कचरा है। क्या ये सब चिंताजनक नहीं है? (अदिति)

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