आखिर चाहते क्या हैं मोहम्मद यूनुस ?

दीपू चंद्र दास और खोखनचंद्र दास के बाद  एक और हिंदू सुरक्षा कर्मचारी अमृत मंडल की बांग्लादेश में हत्या कर दी गई। अभी तक वहां अल्पसंख्यक हिंदू भय के माहौल में हैं। छात्र नेता उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश किस मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है, वह अच्छा संकेत नहीं है। शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद वहां की सत्ता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं ग्रामीण बैंक के संस्थापक तथा शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को इस उम्मीद के साथ अल्प काल के लिए सौंपी गई थी कि वह वहां पर न केवल शांति स्थापित करेंगे, अपितु अव्यस्था की ओर बढ़ रहे बांग्लादेश को फिर से पटरी पर लाकर वहां लोकतंत्र की परिपाटी को मज़बूत करेंगे, लेकिन फिलहाल तो ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है।
यदि बांग्लादेश के इतिहास पर नज़र डाली जाए तो पता चलेगा कि वहां लोकतंत्र कभी भी लंबे समय तक एवं मज़बूती से नहीं टिका है। 1971 में आज़ाद होने के बाद शेख मुजीबुर रहमान ने पहले वहां के राष्ट्रपति का एवं बाद में प्रधानमंत्री का पद संभाला तब लगा था कि पाकिस्तानी अत्याचारों से मुक्ति के बाद बांग्लादेश अब लोकतंत्र की स्वस्थ शासन में आगे बढ़ेगा, लेकिन केवल 4 साल बाद ही 1975 में एक सैनिक षड्यंत्र के तहत शेख मुजीबुर रहमान की सपरिवार हत्या कर दी गई, केवल उनकी दो बेटियां जिनमें एक शेख हसीना थीं, इसलिए बच गई कि वे उस समय वहां नहीं थी । 
उसके बाद एक अल्पकालीन सरकार खोंडकर मुश्ताक के नेतृत्व में बनी। उसका पतन भी एक सैन्य तख्ता पलट में मेजर जनरल ज़ियाउर रहमान के नेतृत्व में हुआ और 1981 में चटगांव दौरे के दौरान मार दिए गए। एक बार फिर अल्पकालिक सरकारों के बाद सत्ता पर लेफ्टिनेंट जनरल इरशाद ने कब्ज़ा किया और सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए बांग्लादेश को इस्लामिक कट्टरता की ओर धकेल दिया लेकिन दो शत्रु राजनीतिज्ञ खालिदा ज़िया और शेख हसीना आपस में मिल गए और इरशाद को भी 1990 में सत्ता गंवानी पड़ी।
इरशाद के पतन के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र का एक लंबा दौर चला और वहां पर सत्ता खालिदा ज़िया और शेख हसीना के बीच बदलती रही। 80 साल की उम्र में 28 दिसम्बर, 2025 को अपना जीवन पूरा करने वाली खालिदा ज़िया 10 साल 1991 से 1996 और 2001 से 2006 तक प्रधानमंत्री रहीं जबकि शेख मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना 1996 से 2001 तक और उसके बाद थोड़ी उथल-पुथल के साथ 2009 से 2024 तक बांग्लादेश की सबसे सशक्त नेता बनकर उभरीं। उनकी इस ताकत के पीछे जहां उनके पिता का प्रभामंडल था, वहीं उनका भारत के प्रति झुकाव और भारत का उनके प्रति समर्थन भी एक प्रमुख कारक था, लेकिन अगस्त 2024 में उनकी सरकार का भी तख्ता पलट हुआ और तब से अब तक बांग्लादेश लोकतंत्र और शांति की प्रतीक्षा में है। 
मोहम्मद यूनुस ने वादा किया हुआ है कि फरवरी में देश में चुनाव करवा कर लोकतांत्रिक ढंग से चुनी जाने वाली सरकार को सत्ता सौंप देंगे। इस बीच मोहम्मद यूनुस की नीति और नीयत दोनों पर ही संदेह है। खालिदा ज़िया की मृत्यु एवं तारीक रहमान की बांग्लादेश वापसी के बाद राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि यह सारा खेल यूनुस के ही इशारों पर खेला जा रहा है ताकि चुनाव को टाला जा सके एवं सत्ता पर खुद या अपने करीबियों को बैठाया जा सके। 
शेख हसीना को बांग्लादेश के न्यायालय द्वारा फांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद उनकी वतन वापसी अभी तो असंभव सी प्रतीत हो रही है। उनकी पार्टी बांग्लादेश अवामी लीग को पहले ही बांग्लादेश के चुनाव से अलग कर दिया गया है और यूनुस का झुकाव बांग्लादेश के कट्टरवादी दल जमात-ए-इस्लामी की ओर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इस दल की बढ़ी हुई गतिविधियों के बरक्स ही अल्पसंख्यक हिंदुओं के प्रति नफरत का सैलाब सा उभर आया है । 
आज़ादी के समय बांग्लादेश में 22 प्रतिशत हिंदू थे जो 1974 की जनगणना के समय 13.5 प्रतिशत रह गए और आज वहां पर केवल 7.9 प्रतिशत हिंदू ही बचे हैं और उनका भी जीवन, परिवार, संपत्ति व व्यापार सब कुछ दांव पर लगा हुआ है, लेकिन मोहम्मद यूनुस की सरकार आगे बढ़ कर कोई कड़ा कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रही है और न ही इतनी सामर्थ्य उसमें लगती है कि वह कुछ कर पाए। 
पिछले कुछ ही वर्षों में पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ-साथ मलेशिया और इंडोनेशिया में भी हिंदू विरोधी लहर दिखाई दी है। (अदिति)

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