एक नया युद्ध छिड़ने की सम्भावनाएं
सदियों पहले ईरान एक साम्राज्य शक्ति था। इसका धरती के एक बड़े भाग पर शासन रहा था। इसकी भाषा और सभ्याचार का भी विश्व भर में दबदबा था। समय बदलता रहता है। इतिहास ने साम्राज्यों का पतन देखा है और वक्त ने अनेक कारणों के दृष्टिगत भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में नई शक्तियों को भी उभरते देखा है। अभी पौनी सदी पहले इस देश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया था। उस समय तेल की बहुलता वाले इस अमीर देश में तेल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था। अमरीका और ब्रिटेन जैसी शक्तियों को यह स्वीकार नहीं था। उनकी शह से लोकतांत्रिक ढांचे को पुन: सदियों से चली आ रही राजाशाही में बदल दिया गया था। कई दशक व्यतीत होने के बाद लोग राजाशाही के भ्रष्ट प्रबन्ध से फिर तंग-परेशान हो गए थे, जिस कारण वर्ष 1979 में लोगों के बड़े विद्रोह के कारण यहां इन्कलाब आया, जो इस्लामिक क्रांति का रूप ले गया था।
विगत 45 वर्ष से अधिक समय तक यहां इस्लामिक तानाशाहों ने सत्ता सम्भाले रखी। अंतत: जन-साधारण ने धार्मिक कट्टरता के शिकंजे से आज़ाद होने के लिए बड़ी अंगड़ाई ली। इस अन्तराल में 1999 में विद्यार्थियों ने एक बड़ा आन्दोलन किया। 2009 में कथित चुनावों में भारी धांधली होने के कारण लोगों का गुस्सा एक बार फिर भड़का। 2019 तक दरपेश आर्थिक समस्याओं से तंग आकर लोगों का विद्रोह फिर भड़क उठा और 2022 में सख्त इस्लामिक कानूनों के विरुद्ध लोगों ने व्यापक स्तर पर विद्रोह शुरू कर दिया, विशेष रूप से महिलाओं ने क्या पहनना है और कैसे काम पर जाना है, आदि संबंधी सरकारी प्रतिबन्धों के विरुद्ध आन्दोलन कर रही एक महिला की सुरक्षा दलों की हिरासत में मौत हो जाने के विरुद्ध महिलाओं के एक बड़े वर्ग ने ब़गावती स्वर छेड़े थे, जिन्हें इस्लामिक प्रशासन ने पूरी सख्ती से दबा दिया था। इसी लिए ईरान के प्रमुख नेता आयतउल्ला अली ़खामनेई को आज कट्टर धार्मिक तानाशाह माना जाने लगा है। एक बार फिर विगत वर्ष दिसम्बर मास से देश भर में लोग सड़कों, बाज़ारों में उतर आए हैं। डावांडोल हो रही आर्थिकता ने लोगों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। विगत तीन वर्षों में महंगाई 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। खाद्य पदार्थों के मूल्य 70 प्रतिशत से अधिक हो गए हैं। इस कारण भी विगत वर्षों में देश के वित्त मंत्री और केन्द्रीय बैंक के गवर्नर को त्याग-पत्र देने के लिए विवश होना पड़ा था।
दूसरी तरफ अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी आदत के अनुसार प्रतिदिन ईरान को धमकियां देने पर उतर आए हैं। ईरान की लगातार गिरती हुई आर्थिकता में अमरीका का भी बड़ा हाथ माना जाता है, जिसने ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने के लगातार किए जा रहे यत्न को सख्ती से रोका है। इसलिए ईरान पर कई तरह के व्यापारिक प्रतिबन्ध लगाए गए हैं। ईरान ने इस्लामिक क्रांति के समय से ही यह प्रण कर लिया था कि वह अरब धरती से इज़रायल का नामो-निशान मिटा देगा। उसने अपने साथ यमन और लेबनान आदि देशों के इज़रायल विरोधी संगठनों को भी जोड़ा और हैती में कब्ज़ा करके बैठे आतंकवादियों की भी इसने पूरी सहायता की। इसलिए इज़रायल और गाज़ा पट्टी में हमास से लड़ाई के साथ-साथ इज़रायल ने अमरीका की सहायता से ईरान पर भी भीषण हमले किए। वेनेजुएला पर कब्ज़ा करने के बाद और भी दलेर हुए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प यह धमकी दे रहे हैं कि यदि ईरानी इस्लामिक प्रशासन ने अपने नागरिकों पर सख्ती बंद न की तो वह उस पर हमला कर देगा। अब तक ईरान में हुई गड़बड़ में सैकड़ों ही लोग मारे जा चुके हैं और हज़ारों को नज़रबंद कर दिया गया है, परन्तु लोगों में उठे ब़गावत के ये स्वर और भी ऊंचे सुनाई दे रहे हैं। चाहे ईरान रूस और चीन के साथ अपने अच्छे संबंधों का दम भर रहा है परन्तु पैदा हुए ऐसे हालात में ये देश भी उसका किस सीमा तक साथ दे सकेंगे, इस संबंध में भी अनिश्चितता ही बनी हुई है।
ऐसे हालात में भारत भी एक बार फिर नाज़ुक स्थिति में फंसा दिखाई दे रहा है। ईरान के साथ इसके संबंध अच्छे हैं। पाकिस्तान की अनदेखी के कारण भारत ईरान के साथ मिल कर चाबहार बंदरगाह को बड़ा विस्तार दे रहा है, ताकि उसके द्वारा अ़फगानिस्तान के साथ व्यापारिक संबंधों को कायम रखा जा सके। ईरान एक शिया इस्लामिक देश है। आज तक ज्यादातर अरब देश हालात के दृष्टिगत इसके विरुद्ध ही भुगतते दिखाई दे रहे हैं। भारत के लिए ईरान के साथ संबंध स्थापित रखना एक कड़ी परीक्षा से गुज़रने वाली बात बन गई है। विश्व एक बार फिर और ़खतरनाक युद्ध के कगार पर पहुंच गया प्रतीत होता है, क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा अमरीकी राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रम्प आज एक बड़े विस्तारवादी तानाशाह बने दिखाई दे रहे हैं और उनकी नीतियों का प्रभाव भिन्न-भिन्न ढंगों से विश्व के ज्यादातर देशों पर पड़ रहा है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

