व्यापार समझौते को लेकर यूरोपियन संघ के लिए भारत सुरक्षित विकल्प
सालों से भारत और यूरोपियन संघ (ईयू) के बीच व्यापार समझौते के लिए बातचीत किनारे पर ही अटकी हुई थी। जब यह शुरू हुई, तो ईयू ने बड़े-बड़े दावे किए और भारत के मुद्दों पर पीछे हटने से मना कर दिया, चाहे वह भारत के छोटे और मामूली किसानों को सस्ते यूरोपियन संघ कृषि के उत्पादनों के हमले से बचाने का मामला हो, या भारत का अपने देश में बनी व्हिस्की को भी इसी नाम से बुलाने का अधिकार हो। हालांकि, समय नज़रिए और मजबूरियों को पूरी तरह बदल सकता है। अब भारत ही है जिस पर अब तक यूरोपियन संघ का सारा ध्यान है।
इतना ज़्यादा कि यूरोपियन कमीशन की प्रमुख उर्सुला वैन डेर लेयेन ने खुद वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के बड़े मंच से ऐलान किया कि अगले हफ्ते भारत के साथ एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किया जाएगा। अपने जोश या निराशा में उन्होंने भारत के साथ व्यापार समझौते को ‘सभी ट्रेड डील्स की मां’ बताया। यह पुराने महादेश के लिए एक ऐसा समझौता होगा जिसमें प्रगतिशील सोच रखने वाला, तेज़ी से बढ़ता हुआ, नवाचार और अक्सर तेजस्वी कहा जाने वाला भारत होगा। वॉन डेर लेयेन ने उस समझौते का ज़िक्र किया जिसमें करीब दो अरब लोग शामिल हैं और जो वैश्विक जीडीपी का एक-चौथाई हिस्सा है।आखिर ईयू के लिए क्या मजबूरियां थीं? यूरोपियन देश आज एक कोने में फंस गए हैं। आखिर उनका सबसे पुराना साथी और रक्षक अमरीका उनसे दूर होता लग रहा है। ट्रम्प ने खुद बार-बार इस बात पर ध्यान दिलाया है कि यूरोपियन संघ दशकों से अमरीकी सामरिक रक्षा प्रणाली पर सवार हैं। यूरोपियन अपने रक्षा पर खर्च नहीं कर रहे हैं और अपनी रक्षा को मज़बूत करने के लिए अमरीकी बजट पर निर्भर हैं। ट्रम्प चाहते थे कि यूरोपीय देश अपनी रक्षा के लिए पैसे दें, न कि अमरीकी इसके लिए पैसे दें।
ट्रम्प ने खुद ओवल ऑफिस में अपने पसंदीदा प्रैस के सामने ब्रिटिश प्रधानमंत्री का अपमान किया था। यूरोप के लिए विकल्प और भी बुरे हैं, रूस यूक्रेन में बढ़त बना रहा है और बाकी यूरोप को युद्ध के नाम पर धमका रहा है। मौजूदा हालात में रूस की दोस्ती ट्रम्प के अपमान से कोई राहत नहीं दे सकती। दूसरा बड़ा खिलाड़ी चीन भी कोई राहत नहीं देता।
अगर दे भी रहा है तो चीन यूरोप की अर्थव्यवस्था के लिए एक खतरा साबित हो रहा है। चीनी इलेक्ट्रिक कारें यूरोप के लंबे समय से बने ऑटोमोबाइल बाज़ार में धमाका कर रही हैं। प्रसिद्ध आटो मोबाइल कम्पनियां मुश्किल से ही चीनी प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर पा रहे हैं। चीन वैश्विक बाज़ार में बहुत सस्ते स्टील उद्पादों की बाढ़ ला रहा है। चीन के साथ समझौता, मुक्त व्यापार या सीमित व्यापार सबसे अच्छा आत्मघाती कदम होगा।
इस परिस्थिति में भारत शायद एक सुरक्षित विकल्प लगता है। अभी भारत इतना शक्तिशाली या बड़ा नहीं है कि यूरोपियन देशों पर दबाव बनाने के लिए तैयार हो। फिर भी यह अकेला ऐसा देश है जिसके पास इतनी ताकत है—एक बड़ी आबादी, एक युवा समूह और बढ़ता हुआ मध्य वर्ग जो और भी बेहतर उत्पादनों की मांग कर रहा है। भारत के पास बड़े बाज़ार का फायदा है। हैरानी की बात नहीं है कि ज़्यादा से ज़्यादा आर्थिक वर्ग भारत के साथ व्यापार समझौता करना चाहते हैं। इसलिए अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के ताज़ा हमले के संदर्भ में भारत उनके लिए एक आदर्श पसंद बन गया। वॉन डेर लेयेन ने कहा कि यूरोप भारत के साथ बड़े आर्थिक रिश्ते बनाने की उम्मीद कर रहा है, जो तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यूरोप भारत के बढ़ते हुए बड़े आर्थिक रिश्तों का फायदा उठा रहा है। भारत के बाज़ारों में कई तरह के उत्पादन पेश कर रहा है और साथ ही भारत को अपना सर्वोत्तम दे रहा है। चूंकि भारत-अमरीका व्यापार बातचीत अधर में है, ऐसी पृष्ठभूमि में वॉन डेर लेयेन ने बताया कि दोनों के बीच इस व्यापार समझौते से ईयू को एक ऐसे क्षेत्र में ‘फर्स्ट मूवर एडवांटेज’ मिलेगा जो बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और बढ़ते आर्थिक और रणनीतिक अवसर प्रदान कर रहा है।
भारत-ईयू व्यापार समझौते के परिणामस्वरूप यूरोप के उत्पादों की पूरी रेंज बहुत कम टैरिफ के आधार पर भारत में प्रवेश पाएगी, जिससे भारत में बढ़ते मध्य वर्ग के बाज़ार के बड़े हिस्से खुल जाएंगे। साथ ही ईयू भारत की व्यापार संबंधी चिंताओं के प्रति संवेदनशील रहा है। इन संवेदनशीलता को देखते हुए भारत-ईयू समझौता कृषि क्षेत्र, चीनी उद्योग और कई अन्य उत्पादों को कवर नहीं करेगा। यूरोपीय स्पिरिट्स और वाइन पर ऊंचे टैरिफ भारत द्वारा कम किए जाएंगे जबकि यूरोप के कुछ भौगोलिक संकेतकों को व्यापार समझौते से बाहर रखा जाएगा।
यह घोषणा तेज़ी से आगे बढ़ने और दुनिया की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन की पहचान पर आधारित एक नई व्यवस्था की आवश्यकता पर ज़ोर देती है। इसमें कोई शक नहीं कि भारत कई यूरोपीय देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण खिलाड़ी है, जो इक्कीसवीं सदी में छोटे पड़ गए हैं। (संवाद)



