दूषित जल : विकास के दावों पर एक गम्भीर प्रश्न
अक्सर कहा जाता है कि जल ही जीवन है। किन्तु यदि यही जल दूषित हो जाए तो क्या उसे जीवन का आधार कहा जा सकता है? सच तो यह है कि दूषित जल जीवन को बचाने के बजाय उसे संकट में डाल देता है। आज भारत सहित पूरी दुनिया में स्वच्छ जल की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस देश में नदियों को माता का दर्जा दिया जाता है और जल को जीवन का मूल तत्व माना जाता है, वहीं करोड़ों लोग आज भी स्वच्छ पेयजल से वंचित हैं। यह स्थिति केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं नीतिगत कमजोरियों, प्रशासनिक उदासीनता और विकास के असंतुलित मॉडल की भी देन है। पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं। वर्ष 2019 में आरंभ हुआ जल जीवन मिशन इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना गया। इस योजना का उद्देश्य था कि देश के हर ग्रामीण परिवार को नल के माध्यम से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए।
इसके अतिरिक्त नदियों की स्वच्छता के लिए नमामि गंगे जैसी परियोजनाएं भी शुरू की गईं। इन योजनाओं के कारण पाइपलाइन के माध्यम से जल आपूर्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहां वर्ष 2019 में केवल लगभग 16.7 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल का पानी पहुंचता था, वहीं 2024 के अंत तक यह आंकड़ा 80 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच गया। यह उपलब्धि नि:संदेह महत्वपूर्ण है, किन्तु केवल पाइपलाइन बिछा देने भर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि जो पानी घरों तक पहुंच रहा है वह वास्तव में स्वच्छ और सुरक्षित भी हो।
दुर्भाग्य से जल गुणवत्ता के मोर्चे पर स्थिति उतनी संतोषजनक नहीं दिखाई देती। विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पेयजल के नमूनों की जांच से यह तथ्य सामने आया है कि बड़ी मात्रा में जल प्रदूषित पाया गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि लिए गए दूषित नमूनों में से केवल लगभग एक चौथाई को ही शुद्ध करने के प्रयास किए गए। इसका अर्थ यह हुआ कि बड़ी संख्या में लोग अब भी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। यह स्थिति हमारे विकास के दावों की तार्किकता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। यदि जल जैसे बुनियादी संसाधन की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की जा सकती तो विकास की उपलब्धियां अधूरी ही मानी जाएंगी। पेयजल की गुणवत्ता का संकट केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। शहरी क्षेत्रों में भी यह समस्या बराबर देखने को मिलती है। महानगरों और बड़े शहरों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था और सीवेज प्रबंधन की कमजोरियों के कारण जल स्रोत लगातार प्रदूषित हो रहे हैं। कई स्थानों पर पेयजल पाइपलाइन और सीवर लाइन एक-दूसरे के बेहद करीब बिछी हुई हैं। समय के साथ जब ये पाइपलाइन जर्जर हो जाती हैं तो सीवर का गंदा पानी पेयजल में मिल जाता है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो जाता है। हाल के वर्षों में कई शहरों में दूषित पानी के कारण लोगों के बीमार पड़ने और यहां तक कि मौत होने की घटनाएं सामने आई हैं। मध्यप्रदेश के इंदौर जैसे शहर में हुई ऐसी घटनाओं ने इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। यह विडंबना ही है कि जो शहर स्वच्छता के लिए देश में बार-बार अग्रणी स्थान प्राप्त करता रहा है, वहीं दूषित जल के कारण लोगों की जान जाने की घटनाएं सामने आती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि अधिकांश बीमारियों की शुरुआत पेट से होती है और दूषित जल इसका सबसे बड़ा कारण बनता है। दस्त, उल्टी, टाइफाइड, हैजा और पीलिया जैसी जलजनित बीमारियां आज भी लाखों लोगों को प्रभावित कर रही हैं। इन बीमारियों का सबसे अधिक असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सीमित होती है। ऐसे में दूषित पानी केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं रह जाता, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले लेता है। जल प्रदूषण के पीछे कई कारण हैं। औद्योगिक कचरे का बिना उपचार के नदियों और जलाशयों में छोड़ा जाना एक बड़ा कारण है। इसके अतिरिक्त शहरों से निकलने वाला अनुपचारित सीवेज भी बड़ी मात्रा में जल स्रोतों को प्रदूषित करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार देश की सैकड़ों नदियों के अनेक नदी खंड जल गुणवत्ता के मानकों से नीचे पाए गए हैं। इसका अर्थ यह है कि हमारे जल स्रोत धीरे-धीरे प्रदूषण के गंभीर जाल में फंसते जा रहे हैं। दूसरी ओर, भू-जल का अत्यधिक दोहन भी स्थिति को और जटिल बना रहा है। भारत दुनिया में सबसे अधिक भू-जल निकालने वाले देशों में अग्रणी है। अत्यधिक दोहन के कारण न केवल जल स्तर गिर रहा है, बल्कि कई स्थानों पर भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक और अन्य हानिकारक रसायनों की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। विकास की अंधी दौड़ ने भी इस संकट को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
तेजी से फैलते शहर, बढ़ते उद्योग और बढ़ती आबादी जल संसाधनों पर भारी दबाव डाल रहे हैं, लेकिन इसके समानांतर जल प्रबंधन की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं हो पाई है। कई शहरों में सीवेज उपचार संयंत्रों की क्षमता पर्याप्त नहीं है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में गंदा पानी सीधे नदियों और झीलों में पहुंच जाता है। जब यही जल स्रोत पेयजल आपूर्ति का आधार बनते हैं तो स्वाभाविक रूप से जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूषित जल का प्रभाव केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ता है। नदियों और झीलों में बढ़ते प्रदूषण से जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जल प्रबंधन को केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे जनभागीदारी का व्यापक अभियान बनाया जाए। जब तक समाज, प्रशासन और सरकार मिलकर इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक दूषित जल का संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाएगा। स्वच्छ जल की रक्षा दरअसल जीवन की रक्षा है, और यह जिम्मेदारी हम सभी की है।



