कचरा प्रबन्धन को लेकर सर्वोच्च् अदालत की सख्ती
साफ और स्वस्थ वातावरण मनुष्य मात्र के लिए अत्यावश्यक और जीवन का अभिन्न हिस्सा होने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई एक ताज़ा टिप्पणी ने एक ओर जहां निरन्तर बढ़ते जाते प्रदूषण की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है, वहीं तत्काल रूप से इस संबंधी उपचार-पग उठाये जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। उच्च न्यायालय ने इस हेतु बनाये गये नियमों एवं कानून के असमान पालन की प्रक्रिया को भी इस समस्या के प्रति उत्तरदायी ठहराया है। अदालत ने इस संबंध में चेतावनी भी जारी की है कि भावी पीढ़ी समस्या की विकरालता को थामने हेतु वैधानिक पग उठाये जाने में अब तक की जाती रही देरी और उदासीनता को सम्भवत: और अधिक देर बर्दाश्त नहीं कर सकती। सरकारों को इस हेतु कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश लेकर देर-सबेर सामने आना ही होगा। अत: सही समय पर सही निर्णय लेना ही तर्क-संगत होता है। सरकारों को इस संबंध में जागरूक और सक्रिय करने के दृष्टिगत सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किये हैं जिनकी रौशनी में यह सुनिश्चित किया जा सके कि सम्बद्ध नियमों एवं कानूनों को लागू करने हेतु कार्यकारी अधिकारियों के पास समुचित शक्तियां भी प्राप्त हों। ये नये अदालती दिशा-निर्देश आगामी प्रथम अप्रैल से स्वत: लागू हो जाएंगे।
जस्टिस पंकज मिथल एवं जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी पर आधारित पीठ ने वातावरण में प्रदूषण की बढ़ती पैठ हेतु सामाजिक, व्यवसायिक और घरेलू अवशेष-भण्डारों को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा कि नगर निगमों को कूड़ा-कचरा के निस्तारण हेतु एक ठोस नीति का निर्धारण कर दृढ़ता और प्रतिबद्धता के साथ आगे आना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि आज तकनीकी और आधुनिकता वाले युग में ऐसा कोई कार्य नहीं जिसे किया जा न सके। पीठ ने यह भी चेतावनी दी कि देश की तकनीकी गतिविधियों को पूरी दुनिया देख रही है। ऐसे में तकनीकी उपयोग से मानव-जनित प्रदूषण को रोकना अथवा इसके स्तर को कम करना कदापि कठिन कार्य नहीं है। अदालत ने इस मामले पर भी सरकारों को आगाह किया कि पूरे देश में कचरा प्रबन्धन और कूड़े के निपटान हेतु नियम एवं कानून एक समान नहीं हैं। इस कारण किसी लक्ष्य को समान रूप से हासिल करना प्राय: कठिन हो जाता है। इस कारण पूर्व निर्धारित नियमों का पालन भी एक जैसा नहीं हो पाता।
हम समझते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के तत्संबंधी निर्देश और टिप्पणियां अकारण तो कदापि नहीं हैं। अदालत ने यदि इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है तो उसकी मंशा को भी समझा जाना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण और वातावरण में बढ़ते जाते धुएं के प्रभाव ने विषाक्त तत्वों को भरण-पोषण दिया है। इस कारण कृषि पदार्थों में भी विषाक्त प्रभाव बढ़ा है। यहां तक कि मिट्टी के कणों में विष का असर देखा जा सकता है। हवा और पानी में विषाक्त तत्व बढ़ने से स्थिति और गम्भीर हुई है। वातावरणीय प्रदूषण से ओज़ोन की परत भी बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं। शहरों खास तौर पर महानगरों में कूड़ा डम्प क्षेत्रों के बढ़ने और कई भागों में कूड़े के ढेरों को आग लगाये जाने से तो प्रदूषण का स्तर कई गुणा बढ़ा है।
हम समझते हैं कि विकसित भारत और स्मार्ट भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए जहां वातावरण और पर्यावरण को प्रदूषण-रहित किया जाना बहुत ज़रूरी है, वहीं इस हेतु कूड़ा-कचरा के प्रबन्धन की व्यवस्था करना भी उतना ही लाज़िमी है। सर्वोच्च न्यायालय के नये निर्देशों का एक सार्थक पक्ष यह भी है कि अदालत ने इसे केवल एक प्रशासनिक पक्ष नहीं माना, अपितु इसे मानव मात्र के स्वास्थ्य और समाज की आर्थिकता से भी जुड़ा हुआ माना है। यदि वातावरण स्वस्थ और प्रदूषण-रहित नहीं है तो मानव मात्र का स्वास्थ्य भी कभी दुरुस्त नहीं हो सकता। नि:संदेह इससे मौजूदा समाज रोगी होगा, तो भावी संततियों के लिए भी यह माहौल अच्छा नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केन्द्र सरकार ने बेशक कुछ अच्छी योजनाएं इस हेतु बनाई हैं, किन्तु उन पर सही तरीके से अमल न हो पाने से देश और समाज उनसे पूरी तरह लाभान्वित नहीं हो सका। सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी भी बड़ा अहम महत्त्व रखती है कि अब इस मामले को लेकर और ढील नहीं बरती जा सकती। हम समझते हैं कि सरकारों और उनके प्रसासन को सार्वजनिक जागरूकता और प्रशासनिक सक्रियता के ज़रिये इस समस्या को प्राथमिकता के आधार पर हल करने हेतु आगे आना होगा।

