डिजिटल शिक्षा के अगुआ देश लौट रहे किताबों की ओर 

दुनिया एक ऐसे दौर से गुज़र रही है जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरनेट ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र को बदल दिया है। शिक्षा भी इससे अछूती नहीं रही। गत डेढ़ दशक में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में टैबलेट, लैपटॉप, स्मार्ट क्लास रूम और ऑनलाइन कंटेंट को आधुनिक शिक्षा का पर्याय मान लिया गया। यह माना गया कि अगर बच्चों को बचपन से ही डिजिटल माध्यमों से पढ़ाया जाएगा तो वे भविष्य की टेक्नोलॉजी आधारित दुनिया के लिए बेहतर तैयार होंगे।
लेकिन अब एक दिलचस्प मोड़ सामने आ रहा है। जिस डिजिटल शिक्षा मॉडल को दुनिया भविष्य मान रही थी, वही मॉडल अब कई देशों में पुनर्मूल्यांकन के दौर से गुज़र रहा है। दुनिया की सबसे अधिक डिजिटल शिक्षा प्रणालियों में गिने जाने वाले स्वीडन और फिनलैंड जैसे देश फिर से किताब, कागज़ और पैन की ओर लौट रहे हैं। कई देशों में स्कूलों के भीतर मोबाइल फोन और टैबलेट के उपयोग को सीमित या प्रतिबंधित किया जा रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में सामने आए शोध, अनुभव और सीखने के परिणामों ने शिक्षा नीति निर्माताओं को सोचने पर मजबूर किया है। करीब 15 साल पहले दुनिया के कई विकसित देशों ने शिक्षा के डिजिटल भविष्य की परिकल्पना की। इस सोच के पीछे कई तर्क थे। पहला, तकनीक से पढ़ाई को अधिक रोचक और इंटरैक्टिव बनाया जा सकता है। दूसरा, इंटरनेट के माध्यम से बच्चों को वैश्विक ज्ञान तक तुरंत पहुंच मिल सकती है। तीसरा, डिजिटल उपकरणों के ज़रिए शिक्षा को अधिक व्यक्तिगत शिक्षण बनाया जा सकता है। स्वीडन उन देशों में था जिसने सबसे पहले स्कूलों में डिजिटल माध्यमों को बड़े पैमाने पर अपनाया। वहां धीरे-धीरे कई स्कूलों में किताबों की जगह डिजिटल उपकरणों ने ले ली। फिनलैंड, जो अपनी शिक्षा प्रणाली के लिए दुनिया में सबसे अधिक प्रशंसित देशों में से एक है, वहां भी स्कूलों में डिजिटल उपकरणों को बड़े उत्साह के साथ अपनाया गया। कई जगह छात्रों को मुफ्त लैपटॉप दिए गए और पढ़ाई का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित कर दिया गया। भारत में भी डिजिटल क्लास रूम और स्मार्ट एजुकेशन जैसे शब्द शिक्षा सुधार के प्रमुख नारे बन गए।
लगभग एक दशक तक डिजिटल शिक्षा के प्रयोग के बाद कुछ समस्याएं धीरे-धीरे सामने आने लगीं। शिक्षकों, अभिभावकों और शोधकर्ताओं ने पाया कि तकनीक ने पढ़ाई को आसान तो बनाया है, लेकिन कई बुनियादी कौशल कमज़ोर भी कर दिए हैं। स्वीडन में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि स्क्रीन पर पढ़ने वाले छात्रों की एकाग्रता और गहराई से समझने की क्षमता कम हो रही है। (अदिति

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