निडर व महान सेनापति थे अकाली फूला सिंह
शहीदी दिवस पर विशेष
अकाली बाबा फूला सिंह का जन्म 14 जनवरी, 1761 ई. को पिता ईशर सिंह और माता हर कौर जी के घर गांव देहला सिहां, तह. मूनक, जिला संगरूर में हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार उनके पूर्वजों का पृष्ठभूमि राजस्थान में थी। उनमें से कुछ गांव देहला सिहां में आकर बस गए और कुछ दूसरे गांवों में चले गए। अकाली बाबा फूला सिंह सिर्फ दो साल के थे जब उनके पिता ईशर सिंह ने उनकी ज़िम्मेदारी शहीद मिसल के जत्थेदार बाबा नैना सिंह को सौंप दी। छोटी सी उम्र में ही अकाली फूला सिंह ने गुरुमुखी लिपि और नितनेम के श्लोक याद कर लिए थे। अपने पिता की तरह वह प्रतिभा संपन्न योद्धा बने। अकाली फूला सिंह के पिता ईशर सिंह महान घल्लूघारा के दौरान सिख सेना में शामिल हुए और बहुत मेहनत की। युद्ध में घायल होने के बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक घर देहला सिहां में किया गया। जब अकाली फूला सिंह सात साल के थे, तब उनकी माता हर कौर का साया उनके सिर से उठ गया। उनकी मृत्यु के बाद जत्थेदार ईशर सिंह के दोस्त नारायण सिंह (नैना सिंह) की देखरेख में उन्होंने घुड़सवारी व युद्ध कला में महारत हासिल की थी। सिख समुदाय के प्रति उनकी सेवाओं को देखते हुए सिख पंथ ने उन्हें श्री अकाल तख्त साहिब का 6वां जत्थेदार नियुक्त किया। इतिहास गवाह है कि उन्होंने नैतिकता के खिलाफ कोई भी कोई काम बर्दाश्त नहीं किया। वह सिख नैतिकता के खिलाफ गलती करने वाले सबसे बड़े सिख नेता को भी बराबर की सज़ा देने का पक्का इरादा रखते थे। सिख समुदाय की रक्षा के लिए अपनी निहंग सेना के साथ आज़ादी से घूमते रहे। इस दौरान उन्होंने बिना वेतन के काम किया। वह एक अनोखे सेनापति थे। वह बड़ी बहादुरी से दुश्मन से लड़ते थे और जीत हासिल करते थे। उन्होंने अपनी एक सेना तैयार की थी। उन्होंने कसूर, मुल्तान, पेशावर, कश्मीर और नुशहरा की जीत जैसी अहम जीतें दर्ज कीं। अरदास की पवित्रता और उसकी शान के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले अकाली बाबा फूला सिंह जी ऊंचे नैतिक मूल्यों और रूहानी ताकत वाले एक निडर योद्धा थे। युद्ध के मैदान में उन्होंने अपनी हिम्मत बनाए रखी, बड़े-बड़े पठानों को भी उनके सामने हार का सामना करना पड़ा। लोग उन्हें प्यार से बाबा जी या अकाली जी कहते थे। वह अंग्रेज़ों को धोखेबाज, चालबाज और देश का दुश्मन मानते थे। वह युद्ध कला में पूरी तरह माहिर थे। उनकी लड़ाइयां इस बात का साफ सबूत हैं कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में एक भी लड़ाई नहीं हारी थी। अकाली जी के निहंग उनके एक इशारे पर अपनी जान कुर्बान करने को तैयार रहते थे। उनके ग्रुप में बहादुर निहंग शामिल थे, जिन्होंने मुल्तान समेत कई लड़ाइयों में अपनी बहादुरी दिखाई और दुश्मन सैना को धूल चटाई। दुश्मन सैनिकों की अधिक संख्या उन्हें कभी डरा नहीं सकी।
अकाली फूला सिंह ने कश्मीर, पेशावर और नौशेरा की लड़ाइयों में हिस्सा लेकर सिख राज्य के निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान दिया और अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा पंथक कार्यों में सेवा करते हुए बिताया। अकाली बाबा फूला सिंह द्वारा लड़ी गई आखिरी लड़ाई नौशहरा की थी। इस लड़ाई में जीत का झंडा फहराते हुए वह 14 मार्च, 1823 को शहीद हो गए। यह लड़ाई भी दूसरी लड़ाइयों की तरह उनकी बहादुरी की वजह से जीती जा सकी थी। अमृतसर में जिस जगह वे रुके थे, वहां आज उनकी याद में ‘बुर्ज बाबा फूला सिंह’ बना हुआ है। उनकी याद को ताज़ा रखने के लिए हर साल 10 से 14 मार्च तक सालाना शहीदी जोड़ मेला मनाया जाता है। 14 मार्च को उनकी शहादत के दिन हर साल गांव देहला सिंहां में गुरमीत समागम और नगर कीर्तन निकाला जाता है।
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