क्या जीवन दान की भांति मृत्यु दान भी संभव है ?
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से एक पुरानी बहस फिर शुरू हो गई है। इस मामले में पिछले 13 वर्षों से एक युवक मरणासन्न अवस्था में पड़ा था और ठीक होने की उम्मीद नहीं थी। माता-पिता की ओर से उसके लिए मौत मांगी गई जिसे स्वीकार कर लिया गया। प्रश्न यह है कि क्या सभी विकल्प जैसे आयुर्वेद और यूनानी, होम्योपैथी और प्राकृतिक या किसी भी अन्य उपचार से रोगमुक्त नहीं हो सकता था? इसका उत्तर डॉक्टर या मृत्युदान प्राप्त व्यक्ति के परिजन ही दे सकते हैं। इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए।
मृत्यु और पुनर्जन्म : भारत में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान औसत आयु 65 से 75 वर्ष तक की आंकी गई है। यदि कोई 80 तक पहुंच गए तो जश्न, 90 के हो गए तो ईश्वर की विशेष कृपा। इससे अधिक उम्र वाले किसी भी समय दुनिया से जाने के लिए तैयार होते हैं और सौ पूरे कर लिए तो विरले हो गए। अस्सी पार कर लेने का अनुभव मुझे है। मेरी उम्र के संगी-साथियों और परिजनों के चले जाने के समाचार मिलते रहते हैं। मौत के लिए अनेक निम्र शब्दों का प्रयोग होता है—जैसे स्वर्गवास, परलोक गमन या महाप्रयाण आदि। स्वर्ग या परलोक या कहां गए, इस बारे में किसी को पता नहीं कि ये स्थल कहां हैं। लोग कहते हैं कि स्वर्ग और नर्क तो यहीं रह कर भोगने होते हैं अर्थात् अच्छे कर्मों का फल स्वर्ग जैसा जीवन तथा बुरे कर्मों का फल नर्क जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। परन्तु एक व्यक्ति जिसने अब तक कोई कर्म नहीं किया, वह मृत्यु के बाद कहां जाता होगा?
मृत्यु निश्चित है और इसका होना जन्म लेते ही तय मान लिया जाता है। श्रीमद् भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण कहा है कि जन्म हुआ तो मृत्यु निश्चित है और उस के बाद जन्म भी अवश्य होगा। हिन्दू धर्म और दर्शन में बहुत-सी बातें कही गई हैं, जैसे शरीर नश्वर, आत्मा अमर और जो नहीं रहता वह शरीर है, आत्मा फिर नए शरीर में प्रवेश कर जाती है। अस्सी-नब्बे पार वाले सोचने लगते हैं कि काफी जी लिया है, परिवार को अपने सामने फलता-फूलता देख लिया। सभी तरह की मोह-माया से दूर रहने की बात मन में आने लगती है और सोचते हैं कि जितना जीवन बचा है, अच्छा जिओ। अध्यात्म में रुचि है तो उसे अपनाओ, नहीं तो जो अब तक नहीं किया या देखा, वह करो और देखने के लिए देश-विदेश घूमने चले जाओ। अगर जीवन साथी नहीं या असमर्थ है तो अकेले ही चले जाओ। आजकल तो पर्यटन वालों ने आसान कर दिया है कि यदि दुनिया में कहीं अंतिम सांस लेनी पड़ी तो बीमा कंपनी वाले मृत देह घरवालों तक पहुंचा ही देंगे।
अब यह जो कहा जाता है कि अगला जन्म होगा ही तो यह बात हिंदू, जैन, बोद्ध और सिख दर्शन में सिद्धांत रूप में है कि कहीं न कहीं जन्म तो होना तय है। बात यहीं खत्म हो जाती तो भी ठीक थी, क्योंकि सब यह सोचते हैं कि दोबारा कहां जन्म होगा, लेकिन मुसीबत यह है कि आत्मा कर्मों के अनुसार 84 लाख योनियों में भटकती है। हर कोई सोचता है कि अगर इंसान नहीं बने तो क्या होगा? जो कहते हैं कि ‘जैसा करोगे वैसा भरोगे’ तो यहां प्रश्न यह उठता है और जिसे एक उदाहरण के रूप में भी रखा जा सकता है कि आज अमरीका-इज़रायल और ईरान ने अपनी आपस की दुश्मनी निकालने के लिए पूरी दुनिया में हाहाकार मचा दिया है, लाखों करोड़ों लोगों का जीवन संकट में डाल दिया है तो इन्हें कौन-सी योनि मिलेगी। वैसे ट्रम्प भी अस्सी के करीब हैं और दूसरी तरफ भी मामला इसी के आस-पास है। यह तय है कि उनकी मृत्यु होगी लेकिन कैसे ,कुछ नहीं कह सकते।
इच्छा-मृत्यु अंतिम प्रश्न : हमारे धर्मों में मोक्ष की व्यवस्था है, मतलब कि जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल सकती हैं। इसलिए यही जन्म है, जो चाहे कर लो। असली मुद्दा यह है कि जब हम उस उम्र के दौर में होते हैं जब कभी भी सदा के लिए आंखें बंद हो सकती हैं, तो अपनी वसीयत ज़रूर बना लेनी चाहिए और जब यह तय है कि जब तक जियेंगे तब तक अपने लिए आवश्यक चीज़ें, जैसे रहने को अपना घर और दैनिक खर्च के लिए पैसा हो, ताकि किसी से कुछ मांगना न पड़े, चाहे इसके लिए अपनों से बहस या मनमुटाव भी झेलना पड़े।
हमारे धार्मिक ग्रंथों, आख्यानों और पौराणिक कथाओं में इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त होने की बात कही गई है। आज इसकी अनुमति माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों में दी है। इसके अनुसार असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों और जीवन की कोई भी उम्मीद खो चुके व्यक्तियों को उनका ‘लाइफ -स्पोर्ट’ (सहायक जीवन प्रणाली) हटाने की की अनुमति दी गई है। इसके भी दो प्रकार हैं, एक तो रोगी को दवा के रूप में ज़हर जैसा कुछ दे दिया जाए या फिर जीवनदायिनी मशीनें बंद कर दी जाएं। सवाल है कि किसी पारिवारिक या राजनीतिक झगड़े में कोई ऐसा व्यक्ति जिसके न रहने पर व्यक्तिगत लाभ हो तो अगर चिकित्सक के साथ मिलीभगत कर मृत्यु दान दे दिया जाता है तो उसके लिए कानून में क्या व्यवस्था होगी?



