खाड़ी युद्ध—भारत के समक्ष चुनौतियां
संसद का बजट अधिवेशन जारी है। इसमें कुछ ऐसे मामले उभर कर सामने आए हैं जो बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और जिनके संबंध में सरकार और विपक्षी पार्टियों के अपने-अपने और अलग-अलग विचार हैं। इनमें से पहले मामला पिछले दिनों भारत-अमरीका में हुए व्यापार समझौते का है। इससे पहले भारत सरकार ने अनेक देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं, जिनमें ब्रिटेन और यूरोप के बड़े गुट यूरोपीयन यूनियन, जिसमें 27 देश शामिल हैं, के साथ किया गया समझौता भी शामिल है। इसके अतिरिक्त न्यूज़ीलैंड, आस्ट्रेलिया के साथ भी अलग-अलग व्यापारिक समझौते किए गए हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री ने भी अपने भारत दौरे पर दोनों देशों के व्यापारिक और अन्य संबंधों को पुन: पहले की भांति स्थापित करने संबंधी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श किए हैं।
रूस और चीन आपसी आदान-प्रदान के संबंध पहले की भांति ही चले आ रहे थे, परन्तु भारत की ओर से रूस से तेल की खरीद कम करने से देश में कुछ विवाद भी पैदा हुआ है। इससे ही यह प्रभाव भी बना है कि भारत अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में फैसले कर रहा है। यह भी ठीक है कि अमरीकी राष्ट्रपति पिछले एक वर्ष से विश्व भर के देशों के साथ अपने देश के समझौतों को नए सिरे से नियोजित करने का यत्न कर रहे हैं। अमरीका आज विश्व की एक महाशक्ति है। ट्रम्प की नीति प्रत्येक पक्ष से अपने देश के हितों को मुख्य रखने की रही है। अपने नए किए जा रहे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भी उन्होंने ‘अमरीका फर्स्ट’ की नीति अपना कर अन्य दर्जनों ही देशों के साथ अपनी शर्तों पर व्यापार करने को प्राथमिकता दी है और अपने देश में अन्य देशों से आने वाली वस्तुओं, अभिप्राय: आयात और तरह-तरह के भारी कर (टैरिफ) लगाने के लिखित समझौते करने भी शुरू किए हैं। इस नीति की ज्यादातर देशों द्वारा कड़ी आलोचना की गई है और इसे अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा दिखाई जा रही धौंस भी कहा गया है। भारत अपने देश की ज़रूरतों और कमियों को मुख्य रख कर प्रत्येक पक्ष से अपनी ओर से पहले किए गए विचार-विमर्श के दृष्टिगत अमरीका के साथ नए प्रस्तावित समझौतों पर पहुंचने का यत्न कर रहा है। कई बड़े भारतीय मंत्रियों ने बार-बार यह बात कही है कि इस नए समझौते में भारी सीमा तक कृषि उत्पादों को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि ऐसा करने से ही कृषि और किसानों के हित आरक्षित किए जा सकते हैं, परन्तु इसके बावजूद यह भी प्रभाव बन रहा है कि भारत अमरीकी दबाव के चलते ही ऐसे समझौतों को सम्पन्न करने के लिए विवश हो रहा है। विपक्षी पार्टियों तथा भिन्न-भिन्न वर्गों ने इस बात पर सरकार की कड़ी आलोचना की है कि उसने अमरीका के समक्ष घुटने टेक दिए हैं।
जारी बजट अधिवेशन के दौरान इस महत्त्वपूर्ण मामले का उठना ज़रूरी था। इसलिए विपक्षी पार्टियां सरकार से संसद में इसका विस्तारपूर्वक स्पष्टीकरण देने की मांग कर रही हैं परन्तु पिछले समय में दोनों ही सदनों में जिस तरह की गड़बड़ और तनाव वाला माहौल बना रहा है, उसके दृष्टिगत लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला द्वारा विपक्षी पार्टियों के प्रति कड़ा रुख धारण किए जाने के बाद ज्यादातर विपक्षी पार्टियों ने स्पीकार की ऊंची आवाज़ में कड़ी आलोचना करनी शुरू कर दी थी तथा उस संबंध में अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए नोटिस भी दिया था, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया था। इसी समय में पश्चिमी एशिया (मध्य पूर्व) में इज़रायल-अमरीका और ईरान युद्ध शुरू हुआ और जिसमें ईरान के सबसे बड़े नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, उनके पारिवारिक सदस्यों और अनेक मंत्रियों तथा जरनैलों के मारे जाने के बाद इस क्षेत्र के हालात बेहद बिगड़े दिखाई दिए हैं। दोनों पक्षों के बीच हो रहे विनाशकारी युद्ध को शुरू हुए लगभग दो सप्ताह होने वाले हैं। ईरान के साथ लगती ‘होर्मज स्ट्रेट’ द्वारा विश्व भर का बड़ा व्यापार होता है, जिसे ईरान द्वारा रोकने के कारण हालात और भी बिगड़ते दिखाई देते हैं। इससे विश्व भर में तेल और ऊर्जा की भारी कमी पैदा होना शुरू हो गई है, जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप में भारत पर ही पड़ेगा। इस बिगड़ती हालत को सम्भाल पाना भारत सरकार के लिए बड़ी चुनौती वाली बात होगी, क्योंकि भारत में ज्यादातर तेल खाड़ी देशों के साथ-साथ ईरान और रूस से भी मंगवाया जाता है, परन्तु दूसरी तरफ जिस तरह अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस मामले पर भारत को लगातार निर्देश दे रहे हैं, उसकी भी भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। यह प्रभाव भी बना है कि भारत सरकार को अमरीकी राष्ट्रपति की ओर से दिए जा रहे निर्देशों संबंधी स्पष्ट और कड़ा रुख धारण करना चाहिए और यह बताना चाहिए कि भारत एक प्रभुसत्ता सम्पन्न देश है, जिसकी अपनी स्वतंत्र नीति है। इस कारण वह किसी दूसरे देश द्वारा किए गए निर्देशों को कदाचित बर्दाश्त नहीं करेगा। मध्य पूर्व की इस लड़ाई संबंधी विपक्षी पार्टियां संसद के इस अधिवेशन में विस्तारपूर्वक बहस करवाने की मांग कर रही हैं, परन्तु हम समझते हैं कि इससे पहले विपक्ष द्वारा स्वयं स्पीकर संबंधी दिए गए अविश्वास प्रस्ताव का समाधान होना ज़रूरी था। विपक्ष को स्वयं ही इस मामले का निपटारा करवाने के लिए सहमति देनी चाहिए थी। इसी दौरान लोकसभा में स्पीकर के विरुद्ध पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा पूर्ण होने के उपरांत अविश्वास प्रस्ताव रद्द भी हो गया है। इसके बाद अब सरकार को भी खाड़ी संकट से संबंधित अपनी व्यापक नीति को विपक्षी पर्टियों के समक्ष रख कर इस संबंध में चर्चा करवाने के लिए सहमत होना चाहिए। नि:संदेह इस देश के सामने पेश इन चुनौतीपूर्ण मुद्दों से निपटने के लिए जहां सरकार को दृढ़ता दिखाने की ज़रूरत होगी, वहीं इस समूचे घटनाक्रम के प्रति उसके लिए पारदर्शी होना भी बेहद ज़रूरी है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

