एक तीर से दो निशाने साधे हैं नितीश कुमार ने
करीब 20 वर्षों तक सतत बिहार के मुख्यमंत्री रहने वाले नितीश कुमार का राज्यसभा में जाना तय हो गया है। ऐसा माना जाता है कि महीने भर के अन्दर ही वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। इसके पश्चात बिहार में मुख्यमंत्री भाजपा का होगा एवं एकमात्र उप-मुख्यमंत्री नितीश कुमार के इंजीनियर बेटे निशांत कुमार होंगे। मात्र उप-मुख्यमंत्री ही नहीं, ऐसी पर्याप्त संभावना है कि गृह जैसा संवेदनशील मंत्रालय भी राजनीति के नये खिलाड़ी निशांत ही संभालेंगे।
अब नितीश के दिल्ली जाने को लेकर और भाजपा के संभावित मुख्यमंत्री होने पर सिर्फ विपक्षी दल राजद में ही नहीं बल्कि नितीश कुमार की पार्टी जदयू में भी बड़ी नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। तेजस्वी यादव तो बिना लाग-लपेट के यह आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिये नितीश को हाईजैक कर लिया और बिहार की सत्ता पर कब्जा करने का षड्यंत्र किया है। जदयू का एक बड़ा तबका भी इस बात को लेकर चिल्ल-पों मचा रहा है कि नितीश कुमार मुख्यमंत्री का पद छोड़कर दिल्ली क्यों जा रहे हैं और भाजपा को मुख्यमंत्री पद क्यों सौंप रहे हैं?
इस संबंधी एक बात तो बहुत ही स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि नितीश कुमार यदि मुख्यमंत्री का पद छोड़ रहे हैं तो वह कोई भाजपा पर एहसान नहीं कर रहे। उल्टे भाजपा का उन्हें एहसानमंद होना चाहिए कि उसने उनकी लाज रखली। वर्ष 1999 में जब भाजपा और जदयू अलग-अलग चुनाव लड़े, तब भाजपा को जदयू से एकीकृत बिहार में ज्यादा सीटें आई थीं। फिर भी भाजपा ने कतिपय कारणों से नितीश का नेतृत्व बनाये रखा। दूर जाने की कोई ज़रूरत नहीं, वर्ष 2020 के चुनाव में तो भाजपा की 80 सीटों के मुकाबले विधानसभा में जदयू को मात्र 43 सीटें मिली थीं पर भाजपा ने अपने वचन का निर्वहन करते हुये नितीश को मुख्यमंत्री बनाया। भाजपा के सामने चाहे समस्या कहें या मजबूरी, कि यदि वह अपना मुख्यमंत्री बनाने का आग्रह करती तो नितीश लालू यादव से भी हाथ मिला सकते थे। वह 2005 से मुख्यमंत्री बनने के बाद दो बार लालू से हाथ मिला भी चुके हैं पर वहां उन्हें वह स्वतंत्रता नहीं थी जो भाजपा के साथ रही। लालू यादव के साथ उन्हें भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर समझौता भी करना पड़ता, इसलिये वह दोनों बार भाजपा के साथ वापस आ गये। इससे इतना तो समझा जा सकता है कि लालू के साथ जाने में उन्हें बहुत सैद्धांतिक समस्या नहीं थी।
अब यदि 75 वर्ष की उम्र में नितीश मुख्यमंत्री का पद छोड़कर दिल्ली जा रहे हैं तो यह उनका कोई त्याग नहीं वरन मजबूरी है। पहली बात तो यह कि वह ऐसे ही दिल्ली नहीं जा रहे वरन इस बात की प्रबल संभावना है कि वह केंद्र में मंत्री पद संभालेंगे। दूसरे एकमात्र बेटा उप-मुख्यमंत्री तो बन ही रहा है। इस तरह से वह फिलहाल बिहार का नेता भले न हो पर जदयू का सर्वोपरि नेता तो बन ही जायेगा। तीसरे जो बातें छन कर आ रही हैं, वे यह हैं कि भाजपा जिसे भी मुख्यमंत्री बनायेगी, वह नितीश की सहमति से बनायेगी और राज-पाट चलाने में भी नितीश राय-मशवरा देते रहेंगे, यानी अपना हस्तक्षेप कायम रखेंगे। बड़ी बात यह भी कि यदि नितीश उम्र के इस अंतिम पड़ाव में मुख्यमंत्री बने रहने की ज़िद पाले रहते तो बेटे को उत्तराधिकार कैसे सौंपते? इसलिये निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि नितीश के दिल्ली जाने के पीछे पुत्र को उत्तराधिकार सौंपना बड़ी बात है।
नितीश सदैव वंशवाद की बुराई करते रहे, परिवारवाद से लड़ते रहे। इस मामले में राजद सदैव उनके निशाने पर रहता था क्योंकि लालू यादव ने जेल जाने पर अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया था तो 26 साल की उम्र में तेजस्वी को उप-मुख्यमंत्री और एक तरह से राजद का नेता बना दिया था परन्तु नितीश कुमार एक सुलझे और परिपक्व राजनीतिज्ञ हैं। मुख्यमंत्री रहते उन्हें इसकी खास ज़रूरत भी नहीं थी। दूसरे उन्हें अपना चेहरा भी बचाना था लेकिन जैसे ही ऐसा वक्त आया कि अब बेटे का राज तिलक कर ही देना चाहिए तो उन्होंने किन्तु-परन्तु नहीं किया।
आज देश की बड़ी समस्या यह है कि भाजपा को छोड़कर देश की सभी अन्य राजनीतिक पार्टियां परिवारवादी हैं और यदि परिवारवादी नहीं तो व्यक्तिवादी हैं। जो पार्टी प्रमुख होता है, उसे ऐसा लगता है कि पार्टी उसी की लोकप्रियता के बल पर चल रही है और ऐसे में पार्टी उसकी निजी जागीर जैसी हो जाती है। ऐसी स्थिति में वह पार्टी को अपने परिवार को छोड़ भला दूसरे के हवाले कैसे कर दे चाहे वह कितना ही समाजवाद एवं लोकतंत्र की दुहाई दे। निश्चित रूप से नितीश कुमार भी इसके अपवाद नहीं हैं। तभी तो राजनीति से पूरी तरह एक अनुभवहीन युवा को अपनी पार्टी को जैसे विरासत में सौंप दी है। जहां तक सवाल इस बात का है कि उनकी पार्टी जदयू ऐसा ही चाहती है तो विरोध में आवाज उठाना तो दूर, यदि कोई हां में हां नहीं मिलायेगा तो उसके गुमनामी में जाने का खतरा सामने खड़ा होता है। फिर भी जब इतिहास मूल्यांकन करेगा तो नितीश कुमार बहुत से राजनीतिज्ञों की तुलना में अलग ही दिखाई देंगे। सुशासन बाबू की छवि और परिवारवाद को लेकर उतावलापन न दिखाना उन्हें बहुत से राजनीतिज्ञों की तुलना में अलग खड़ा करता है। (युवराज फीचर्स)



