इज़रायल-ईरान कैसे बने दोस्त से दुश्मन !

आज ईरान और इज़रायल सीधे हमले कर रहे हैं और खुले युद्ध के मुहाने पर दोनों देश खड़े हैं। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हजारों मिसाइलें दागी हैं जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए अमरीका-इज़रायल के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है। ऐसी खुली दुश्मनी के माहौल में यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि कभी इज़रायल और ईरान गुप्त साझेदार हुआ करते थे।
जानकारी के अनुसार 1960 और 1970 के दशक में जब ईरान इस्लामिक रिपब्लिक नहीं बना था तब वहां शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। उस समय ईरान के पश्चिमी देशों से दोस्ताना संबंध थे और इज़रायल के साथ भी उसके करीबी रिश्ते थे। दोनों देशों के लिए इराक एक बड़ा खतरा था। इज़रायल अपने चारों ओर दुश्मन अरब देशों से घिरा हुआ था। वहीं, शाह के शासन वाला ईरान, इराक के बढ़ते अरब राष्ट्रवादी नेतृत्व और उसके महत्वाकांक्षी रुख से चिंतित था। खासकर सद्दाम के दौर में इराक की क्षेत्रीय प्रभुत्व की कोशिशों ने ईरान और इज़रायल दोनों को परेशान कर दिया था। बताया जाता है, इसी साझा चिंता ने गहरे सहयोग की नींव रखी। इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान की गुप्त पुलिस सवाक ने मिलकर इराक के भीतर कुर्द विद्रोहियों का समर्थन किया। रणनीति साफ थी कि बगदाद को अंदर से कमजोर करना है। 1958 तक इज़रायल, ईरान व तुर्की ने मिलकर एक गुप्त खुफिया गठबंधन बना लिया था जिसे ‘ट्राइडेंट’ कहा जाता था।
1979 में रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामिक क्रांति के साथ ही सब कुछ बदल गया। शाह देश छोड़कर भाग गए और ईरान एक पश्चिम समर्थक राजशाही से बदलकर शरिया कानून पर आधारित इस्लामिक गणराज्य बन गया। खामेनेई ने खुले तौर पर अमरीका को ‘ग्रेट सैटन’ (बड़ा शैतान) और इज़रायल को ‘लिटिल सैटन’ (छोटा शैतान) कहा था। ईरान सार्वजनिक रूप से इज़रायल का कट्टर विरोधी बन गया लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति अक्सर पर्दे के पीछे अलग तरह से काम करती है। क्रांति के सिर्फ 18 महीने बाद सितम्बर 1980 में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया। ईरान-इराक युद्ध शुरू हो चुका था। सद्दाम ने सोचा कि वह ईरान की अंदरूनी अराजकता का फायदा उठाकर पुराने सीमा विवाद (खासकर शत्त-अल-अरब जलमार्ग से जुड़ा) निपटा सकता है। यह युद्ध 8 साल तक चला और इसमें लाखों लोगों की जान गई। वैचारिक दुश्मनी के बावजूद ईरान और इज़रायल ने एक बार फिर खुद को एक ही दुश्मन सद्दाम के सामने खड़ा पाया।
ईरान की सेना बहुत हद तक शाह के दौर में खरीदे गए अमरीकी हथियारों और उपकरणों पर निर्भर थी। 1979 के बंधक संकट के बाद जब ईरानी छात्रों ने 50 से अधिक अमरीकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा, तब अमरीका ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इससे ईरान के सामने हथियारों और कल-पुर्जों की भारी कमी हो गई। ऐसे समय में इज़रायल ने हस्तक्षेप किया ।
1980 के दशक के मध्य में ‘ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण’ के दौरान यह गुप्त रिश्ता दुनिया के सामने आया। अमरीका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुप्त रूप से (आंशिक रूप से इज़रायली रास्ते से) ईरान को हथियार बेचने में मदद की। बदले में लेबनान में हिज्बुल्लाह द्वारा बंधक बनाए गए अमरीकी नागरिकों की रिहाई की कोशिश की गई। बताया जा रहा है। इस धन का कुछ हिस्सा अवैध रूप से निकारागुआ के कॉन्ट्रा विद्रोहियों को दिया गया। इस घोटाले से रीगन सरकार की साख को नुकसान पहुँचा और वॉशिंगटन, यरुशलम और तेहरान के बीच गुप्त सौदों का खुलासा हुआ। विवाद के बावजूद ईरान-इराक युद्ध के दौरान हथियारों की आपूर्ति जारी रही।
1988 में ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के बाद इज़रायल और ईरान की गुप्त नज़दीकी कमजोर पड़ने लगी। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई ने सत्ता संभाली और इज़रायल विरोधी कड़ा रुख जारी रखा। 1990 के दशक तक हालात बदल चुके थे। खाड़ी युद्ध के बाद इराक कमजोर हो गया और सोवियत संघ टूट गया। वे कारण खत्म हो गए जिन्होंने कभी इज़रायल और ईरान को साथ लाया था। इसके बाद ईरान ने खुद को इज़रायल का दुश्मन बना लिया। उसने लेबनान में हिज्बुल्लाह और गाज़ा में हमास का समर्थन किया जिन्होंने 2006 और 2008 में इज़रायल से सीधे युद्ध लड़े। ईरानी नेता अक्सर इज़रायल के विनाश की बात करते रहे।
आज हालात सीधे टकराव तक पहुंच चुके हैं। अमरीकी चेतावनियों के बावजूद खामेनेई के नेतृत्व में आगे बढ़ाए गए ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने तनाव बढ़ाया है। पिछले एक साल में आर्थिक संकट और राजनीतिक दमन के कारण 31 प्रांतों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों पर सख्ती से वैश्विक आलोचना बड़ी और वॉशिंगटन का दबाव भी तेज हुआ।
घरेलू अशांति, परमाणु तनाव और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्षों के बीच हाल में अमरीका-इज़रायल के हमलों में खामेनेई की मौत हुई। जवाब में ईरान ने इज़रायल पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले किए। इज़रायल पहले से ही ईरान समर्थित गुटों गाज़ा में हमास, लेबनान में हिज्बुल्लाह और यमन में हूती से लड़ रहा है। दोनों देश अब पूर्ण युद्ध के सबसे करीब हैं। इतिहास बताता है कि भू-राजनीति स्थायी नहीं होती। कभी इज़रायल और ईरान ने इराक के खिलाफ साथ काम किया था। वह साथ विचारधारा नहीं बल्कि रणनीतिक ज़रूरत पर आधारित था। आज मिसाइलों और धमकियों के बीच वह दौर अकल्पनीय लगता है पर मध्य पूर्व में रिश्ते बदले और कल के गुप्त साझेदार आज कट्टर दुश्मन हैं। 

(युवराज फीचर्स)   

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