अ़फगानिस्तान और पाकिस्तान भीषण युद्ध के मुहाने पर

पाकिस्तान और अ़फगानिस्तान के बीच हो रहे युद्ध को तीन सप्ताह का समय हो गया है। इससे पहले भी पिछले कई वर्षों से ये दोनों देश आपस में बुरी तरह उलझते रहे हैं, परन्तु विगत दिवस पाकिस्तान द्वारा हवाई हमले करके अ़फगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा छुड़ाओ अस्पताल पर किए गए हमले में 400 से अधिक लोगों के मारे जाने और 250 से अधिक लोगों के बुरी तरह घायल होने के समाचार प्राप्त हुए हैं। इससे दोनों देशों में भीषण युद्ध होने की सम्भावना बन गई है। अ़फगानिस्तान सरकार के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुज़ाहिद ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बातचीत और कूटनीति का समय समाप्त हो गया है। हम अब पाकिस्तान से बदला लेंगे।
पिछले कई सप्ताह से चल रहे इस युद्ध में अब हमला बेहद भयावह और अमानवीय है, जिसमें इतनी बड़ी संख्या में बीमार लोगों के मारे जाने का समाचार प्राप्त हुआ है। कुछ दिन पहले भी दोनों देशों की सीमा के तौर पर जानी जाती डूरंड लाइन पार करके कंधार के क्षेत्र में पाकिस्तान ने सैकड़ों ही रॉकेट हमले किए थे। इससे पहले तुर्की, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और चीन आदि देशों ने समय-समय पर मध्यस्थता कर दोनों देशों में समझौता करवाने के यत्न किए थे, परन्तु इन यत्नों का कोई ठोस हल नहीं निकल सका था। अब अ़फगानिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के बड़े मुफ़्ती ने पाकिस्तानी सेना के विरुद्ध जिहाद का ़फतवा जारी कर दिया है और सभी मुसलमानों को सेना के विरुद्ध मैदान में उतरने की अपील की है। 
कुछ वर्ष पहले पाकिस्तान, अ़फगानिस्तान का गहरा मित्र था। अ़फगानिस्तान में 1990 के दशक में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने तालिबान के गठन में सहायता की थी और लगातार कई दशकों  तक इसकी सहायता जारी भी रखी थी। अब मुख्य रूप में पाकिस्तान ने यह कहा है कि अ़फगानिस्तान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.) को सुरक्षित ठिकाने प्रदान कर रहा है। पाकिस्तान ने दोबारा वर्ष 2021 में अ़फगानिस्तान में तालिबानों को पुन: सत्ता में लाने में भी बड़ी सहायता की थी, परन्तु बाद में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की पाकिस्तान के विरुद्ध गतिविधियों के कारण दोनों देश आज एक दूसरे के दुश्मन बने हुए दिखाई देते हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का गठन वर्ष 2001 में अ़फगानिस्तान पर अमरीकी हमले के बाद हुआ था। उस समय कई पाकिस्तानी आतंकवादी जो अ़फगानिस्तान के लड़ाकों  के साथ मिलकर संघर्ष कर चुके थे, वह इसलिए पाकिस्तान के विरुद्ध हो गए, क्योंकि पाकिस्तान ने अमरीका द्वारा अ़फगानिस्तान में आतंकवादियों के विरुद्ध शुरू किए गए अभियान में उनकी सहायता की थी। उस समय अ़फगानिस्तान के तालिबान और अल-कायदा ने भी इस नए संगठन की सहायता की थी, जिसकी पूरी स्थापना 2007 में हुई थी। इस आतंकवादी संगठन का लक्ष्य जहां पाकिस्तान के सुरक्षा बलों के विरुद्ध लड़ाई करना था, वहीं पाकिस्तान पर पश्चिम के प्रभाव का विरोध करना और वहां अ़फगानिस्तान की तरह शरियत कानून लागू करना था। लगातार अ़फगानिस्तान में बैठे अलग-अलग आतंकवादी संगठनों के सहयोग से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की ताकत बढ़ती गई। 
वर्ष 2021 में जब अमरीका ने अ़फगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाई थी तो वहां तालिबान पुन: सत्ता में आ गया था, जिसका पाकिस्तान की सरकार ने स्वागत किया था।  पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने वहां तालिबान की वापसी को, अ़फगानों द्वारा गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने समान बताया था। चाहे पाकिस्तान ने लगातार ये यत्न किए हैं कि अ़फगानिस्तान की तालिबान सरकार पाकिस्तान में तालिबान की सहायता न करे, परन्तु इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला, जिससे युद्ध के निकट भविष्य में और भी तेज़ होने की सम्भावना बन गई है।
नि:संदेह आज पाकिस्तान कई पक्षों से बुरी तरह शिकंजे में फंसा दिखाई देता है, इसकी आर्थिकता बुरी तरह डावांडोल हो चुकी है। बलोचिस्तान में कई दशकों से इसका कड़ा विरोध चल रहा है। खैबर पख्तूनख्वा में चल रहे कड़े घटनाक्रम ने इसे और कमज़ोर कर दिया है। आज टूट रहा पाकिस्तान कैसे स्वयं को सुरक्षित रख सकेगा, इस संबंध में अब अनिश्चितता बनी दिखाई देती है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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