जेट इंजन निर्माण में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर भारत
भारत ने अब उस क्षेत्र में कदम रख दिया है जहां पहुंचना दुनिया के गिने-चुने देशों के लिए ही संभव हो पाया है और वह है जेट इंजन निर्माण। यह एक ऐसी तकनीक है जिसे रक्षा क्षेत्र का सबसे जटिल विज्ञान माना जाता है और यही अब भारत के आत्मनिर्भर मिशन का नया केंद्र बनता जा रहा है।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के तहत काम करने वाली गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (जीटीआरई) ने देश में ‘नैशनल एयरो इंजन टैस्ट कॉम्प्लेक्स’ स्थापित करने की दिशा में बड़ी पहल शुरू कर दी है। यह पहल सिर्फ एक इंफ्र का प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि भारत की सामरिक ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की तैयारी है। जानकारी के अनुसार जेट इंजन तकनीक पर आज तक कुछ ही देशों का दबदबा रहा है। ऐसे में भारत का इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ना रक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और निर्णायक बदलाव का संकेत माना जा रहा है। यह कदम न सिर्फ भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करेगा बल्कि भविष्य में स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास को भी नई गति देगा।
जेट इंजन बनाना किसी भी देश के लिए तकनीकी श्रेष्ठता (टेक्निकल सुप्रीमेसी) की सबसे बड़ी कसौटी माना जाता है। यह सिर्फ एक मशीन नहीं बल्कि विज्ञान, इंजीनियरिंग और वर्षों के शोध का परिणाम होता है। यही कारण है कि दुनिया में केवल कुछ ही देश इस क्षेत्र में पूरी तरह सक्षम हैं। इनमें अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन शामिल हैं। भारत लंबे समय से इस विशिष्ट समूह में शामिल होने की कोशिश कर रहा है लेकिन उन्नत टैस्टिंग सुविधाओं की कमी इस राह में सबसे बड़ी चुनौती रही है। अब तक भारत ने कई प्रयास किए हैं। इनमें सबसे प्रमुख रहा ‘कावेरी इंजन कार्यक्रम’ जिसे स्वदेशी जेट इंजन विकसित करने की दिशा में एक बड़ी पहल माना गया था। हालांकि यह परियोजना अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। इसके पीछे कई तकनीकी चुनौतियां थीं लेकिन सबसे अहम कारण मज़बूत और आधुनिक टैस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव ही था।
जानकारों का कहना है कि प्रस्तावित ‘नैशनल एयरो इंजन टैस्ट कॉम्प्लेक्स’ भारत के लिए एक बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकता है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक ऐसी जगह होगी जहां जेट इंजन के हर छोट-बड़े हिस्से जैसे फैन, कम्प्रेशर, कम्बस्टर, टर्बाइन और आफ्टर बर्नर की जांच और परीक्षण एक ही परिसर में किया जा सकेगा। अभी तक इन हिस्सों को अलग-अलग जगहों पर टैस्ट करना पड़ता था जिससे समय भी ज्यादा लगता था और प्रक्रिया भी मुश्किल हो जाती थी। इस कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद पूरी टैस्टिंग एक ही जगह पर आसानी से हो सकेगी। सबसे खास बात यह है कि यहां ज़मीन पर ही आसमान जैसी परिस्थितियां बनाई जा सकेंगी। यानी इंजीनियर लैब में ही 40,000 फीट की ऊंचाई, ठंडा तापमान और कम हवा के दबाव जैसी स्थितियों को तैयार कर पाएंगे। इससे इंजन को असली उड़ान से पहले ही पूरी तरह जांचा जा सकेगा जिससे टैस्टिंग ज्यादा सटीक, तेज़ और कम खर्चीली हो जाएगी।
इसे विदेशी निर्भरता से मुक्ति की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है। आज भारत के ज्यादातर आधुनिक युद्धक विमान जैसे तेजस, विदेशी इंजनों पर चलते हैं। यानी हमें इंजन के लिए दूसरे देशों खासकर अमरीका की कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह सहयोग अभी ज़रूरी है लेकिन इसमें कई दिक्कतें भी हैं। हमें पूरी तकनीक नहीं मिलती, इंजन में बदलाव या अपग्रेड करने की आज़ादी सीमित होती है और सप्लाई भी कभी-कभी अनिश्चित रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर भविष्य में देशों के बीच तनाव बढ़ता है तो हमें इंजन मिलने में दिक्कत आ सकती है और इसका असर सीधे हमारी सेना की ताकत पर पड़ेगा। इसीलिए अपना खुद का जेट इंजन बनाना बहुत ज़रूरी है। यह सिर्फ तकनीक की बात नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भारत इस समय एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) जैसे आधुनिक युद्धक विमान पर काम कर रहा है। ऐसे विमानों के लिए बहुत ताकतवर, भरोसेमंद और आधुनिक जेट इंजन की ज़रूरत होती है। इसी दिशा में जीटीआरई एक स्वदेशी हाई-थ्रस्ट इंजन विकसित कर रहा है लेकिन किसी भी जेट इंजन को तैयार करने से पहले उसे हजारों घंटों तक कड़ी जांच से गुजरना पड़ता है। नैशनल एयरो इंजन टैस्ट कॉम्प्लेक्स बनने के बाद यह पूरी प्रक्रिया तेज़ और आसान हो जाएगी जिससे भारत अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स में ज्यादा आत्मनिर्भर बन सकेगा। आज के समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में तनाव बढ़ रहा है, भारत के लिए अपनी रक्षा क्षमता मज़बूत करना बेहद ज़रूरी हो गया है। (युवराज)

