माननीयों के विरुद्ध आपराधिक मामले
एक गम्भीर मामला
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के जन-प्रतिनिधित्व के ज़रिये निर्वाचित प्रतिनिधियों में बढ़ते जाते आपराधिक चेहरों और इनमें से अरबपति हो गये सदस्यों की बढ़ती संख्या ने एक ओर जहां देश की बहुसंख्या को चौंकाया है, वहीं लोकतंत्र की मूल आत्मा को भी आघात पहुंचाया है। देश के कुछ राज्यों में सम्पन्न हुए राज्य सभा के आंशिक चुनावों के बाद, लोकतांत्रिक सुधार संबंधी एसोसिएशन द्वारा हाल ही में किये गये एक विश्लेषण के अनुसार संसद के उच्च सदन राज्यसभा में मौजूदा समय में 32 प्रतिशत अर्थात सर्वेक्षण में शुमार किये गये कुल 229 में 73 सांसदों के विरुद्ध आपराधिक केस दर्ज हैं। ये आंकड़े उन दस्तावेज़ों के आधार पर एकत्रित किये गये हैं जो इन माननीयों ने अपने चुनाव नामांकन पत्रों के साथ साक्षी के तौर पर दाखिल किये थे। इस रिपोर्ट के अनुसार द्वारा दाखिल की गई अपनी ही रिपोर्ट के आंकड़ों पर दृष्टिपात करें, तो जन-प्रतिनिधियों की सम्पत्ति में भी कालान्तर में भारी इज़ाफा होते पाया गया है।
यह स्थिति केवल राज्यसभा सदस्यों को लेकर ही नहीं है, अपितु लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को लेकर स्थिति कम-ओ-बेश एक जैसी है। यहां तक कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल और राज्य विधानसभाओं से आगे प्रदेश मंत्रिमंडलों में भी ऐसे द़ागी सदस्यों की संख्या बहुत अधिक है। इस संस्था की ओर से पिछले वर्ष जारी की गई ऐसी ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार देश भर के कुल 47 प्रतिशत मंत्रियों के विरुद्ध आपाराधिक मामले दर्ज हैं। इन द़ागी मंत्रियों, सांसदों और विधायकों में बेशक सभी राजनीतिक दलों के सदस्य शामिल हैं, किन्तु इनमें भाजपा और कांग्रेस दोनों के सांसद, विधायक और मंत्री अधिक हैं। ऐसा स्वत: सम्भव भी है क्योंकि केन्द्र में भी भाजपा की सरकार है, और देश के अधिकतर राज्यों में भी भाजपा अथवा भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ राजग की सरकारें सत्तारूढ़। बहुत स्वाभाविक है कि इस कारण भाजपा और राजग से निर्वाचित सदस्यों की तादाद अधिक होगी।
मौजूदा रिपोर्ट के अनुसार राज्यसभा में भाजपा के 99 में से 27 सांसदों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। कांग्रेस के 13 में से चार और आम आदमी पार्टी के दस में से चार सांसदों पर भी आपराधिक मामले दर्ज हैं। अन्य राजनीतिक दलों और निर्दलीय सांसदों-विधायकों का विवरण भी इस मामले में किसी से कम नहीं है। इनमें से कई सांसदों-विधायकों के विरुद्ध तो हत्या और हत्या का प्रयास करने जैसे आरोप भी दर्ज हैं। राज्यसभा के तीन सांसदों के विरुद्ध तो महिलाओं से सम्बद्ध आपराधिक मामले तक सामने आए हैं। कइयों के विरुद्ध ये आरोप चिरकाल से चले आ रहे हैं। न कभी संसदीय सदनों के अध्यक्षों ने इस स्थिति का गम्भीरता से अवलोकन किया, न अदालतें में ही इन मामलों को त्वरित रूप से निपटा सकीं। प्रशासनिक तंत्र की ओर से कोई गम्भीर पग उठाये जाने की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती।
इसके अतिरिक्त मौजूदा राज्यसभा के 14 प्रतिशत सांसद ऐसे हैं जो अरबपति और यहां तक कि खरबों रुपये के मालिक हैं। लोकसभा और मंत्री-पद तक पहुंचे निर्वाचित प्रतिनिधियों की सम्पत्तियों में भी येन-केन-प्रकारेण इज़ाफा होते चला गया है। राज्यसभा में वी.आर.एस. के सांसद बी. पार्थसारथी रेड्डी घोषित की गई सम्पत्ति के मामले में सबसे आगे हो सकते हैं जिन्होंने अपनी कुल पूंजी 5300 करोड़ रुपये बताई है। इसके विपरीत सबसे कम सम्पत्ति वाले सदस्य पंजाब से आम आदमी पार्टी की ओर से निर्वाचित सदस्य संत बलबीर सिंह सीचेवाल हैं जिनके पास कुल सम्पत्ति तीन लाख रुपये मूल्य की है। पंजाब से ही आम आदमी पार्टी के राजिन्दर गुप्ता और वाई.एस.आर.सी.पी. के ए.ए.. रामी रेड्डी अधिकतम सम्पत्ति के मामले में दूसरे स्थान पर आते हैं। राज्यसभा के कुल 31 सांसदों ने अपनी सम्पत्ति एक सौ करोड़ रुपये अधिक घोषित की है। भाजपा के 6, कांग्रेस के पांच, वाई.आर.एस. कांग्रेस के अधिकतम प्रतिशत के हिसाब से 4, और आम आदमी पार्टी के ऐसे दो सांसद हैं। कुल सदस्यों और कुल सम्पत्ति की औसत के अनुसार प्रत्येक राज्यसभा सदस्य के पास 120.69 करोड़ रुपये तक की घोषित सम्पत्ति आती है।
हम समझते हैं कि नि:संदेह यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए हितकर नहीं है। आपराधिक मामलों से द़ागी सांसद-विधायक अक्सर दबंग होते हैं। ऐसे सदस्य लोकतांत्रिक धरातल पर कदापि अधिक श्रेयस्कार नहीं होते, किन्तु अक्सर ऐसे तत्वों को टिकट देना राजनीतिक दलों की मजबूरी हो जाता है। ऐसे दबंग तत्व चुनाव जीतने हेतु बड़े सहायक तो बनते हैं, किन्तु इनके कारण ही लोकतांत्रिक मूल्यों का हृस भी होने लगता है। नि:संदेह हम समझते हैं कि लोकतंत्र के प्रकाश स्तम्भ को यदि प्रकाशमान रखना है, तो ऐसे आपराधिक और दबंग तत्वों को टिकट देने से परहेज़ करना होगा। ऐसा सभी राजनीतिक दलों की आपसी सहमति और चुनाव आयोग की थोड़ा सख्ती और नीतिज्ञता से ही संभव हो सकता है।

