किसानों की आय बढ़ाने के लिए उचित योजनाबंदी की ज़रूरत
किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि संबंधी किसानों की सोच बदलने की ज़रूरत है। उन्हें कृषि को व्यापार समझना चाहिए। केन्द्र द्वारा कुछ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया गया, जिसमें गेहूं और धान मुख्य फसलें थीं। इससे उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। केन्द्रीय अनाज भंडार में दोनों फसलों का ज़खीरा बढ़ाया गया जिसमें पंजाब की बड़ी भूमिका रही है। इस योगदान में पंजाब ने पहला स्थान प्राप्त किया। चाहे अब गेहूं उत्पादन में उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश भी शामिल हैं, जो आगे निकल गए हैं। सब्ज़ क्रांति की वजह से उत्पादन में इतनी वृद्धि हुई कि भारत आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों को अनाज निर्यात करने के योग्य हो गया। आज भारत विश्व में सबसे ज़्यादा चावल पैदा करने वाला देश है। यह 150 मिलियन टन तक चावल पैदा कर रहा है जिसमें पंजाब का प्रभावशाली योगदान है। भारत द्वारा 60 लाख टन विदेश भेजी जा रही बासमती में पंजाब का 40 प्रतिशत तक हिस्सा है। इससे देश को 50 हज़ार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा आ रही है।
अब आगामी समय में पंजाब में फसली विभिन्नता लाना ज़रूरी है। धान की काश्त का रकबा कम करने की ज़रूरत है ताकि पानी की बचत हो। फसली विभिन्नता आने से किसानों के लिए कृषि एक व्यापार बन जाएगी। उन्हें पूरा विवरण और हिसाब-किताब रखना होगा। कृषि यहां तक ही सीमित नहीं होगी कि किसान गेहूं-धान की भांति फसल काटें और सरकारी खरीद पर एमएसपी होने के कारण मंडी में बेच आएं। उन्हें मंडीकरण का पूरा ज्ञान रखना पड़ेगा। इसके बिना सही योजनाबंदी नहीं हो सकती। उत्पादन से आय बढ़ाने के लिए उचित योजनाबंदी की ज़रूरत है। योजनाबंदी करते हुए किसानों को ज़्यादा आय के दृष्टिगत अधिक लाभ वाली फसलों को प्राथमिकता देकर कृषि को व्यापारिक बनाना होगा। इस तरह आय बढ़ाने के लिए किसान समझदारी से सोचने के लिए मजबूर होंगे कि कौन-सी फसल की काश्त करनी है, कौन-से सहायक धंधे अपनाने हैं, अलग-अलग किस्मों के अधीन कितना-कितना रकबा रखना है, किस खेत में कौन-सी किस्म बोनी है। आय बढ़ाने के लिए इस सब पर विचार करने की ज़रूरत है। कौन-से बीज, खाद, कीटनाशक और कृषि के औज़ारों की ज़रूरत है, इसका पूरा प्रबंध करना पड़ेगा। योजनाबंदी भी करनी होगी कि गेहूं-धान के फसली चक्र को कम करके जो फसलें पैदा करनी हैं, उनका भंडारण और निपटान कैसे करना है, क्योंकि उनकी कोई एमएसपी पर सरकारी खरीद नहीं है।
शुद्ध आय बढ़ाने के लिए किसानों को विशेषज्ञों की सिफारिश के अनुसार कृषि सामग्री का इस्तेमाल करना पड़ेगा। अब वे पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की प्रति एकड़ 110 किलो यूरिया डालने की सिफारिश को दृष्टिविगत करके प्रति एकड़ 180-200 किलो तक यूरिया डाल रहे हैं। इस तरह ज़रूरत से ज़्यादा डीएपी का इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे खर्च बढ़ता है और शुद्ध आय कम होती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि ज़्यादा नाइट्रोजन डालने से फसल पर बीमारियां भी ज़्यादा आती हैं जिस कारण किसानों को कीटनाशक और छिड़काव पर ज़्यादा खर्च करना पड़ता है। किसानों को शुद्ध रासायनिक खाद, कीटनाशक, नदीननाशक तथा अन्य कृषि सामग्री शुद्ध रूप में उपलब्ध करने के लिए डा. गुरजीत सिंह बराड़ निदेशक कृषि एवं किसान कल्याण विभाग बहुत प्रयास कर रहे हैं ताकि उत्पादन बढ़े, जिससे किसानों की आय भी बढ़ेगी।
उत्पादन बढ़ने के बाद भी किसान अधिक ऋणी होते जा रहे हैं। यहां तक कि औसतन एक घर पर 2.03 लाख रुपये का ऋण हो गया है। यह भारत में तीसरे स्थान पर है। किसानों को अपनी कृषि और योजनाबंदी के दृष्टिगत ऋण लेने का फैसला करना चाहिए। किस एजेंसी से कितना ऋण लेना है और कहां से कम ब्याज पर बिना परेशानी के मिलता है, इसकी भी किसानों को पूरी जानकारी लेने के बाद सही फैसला करना चाहिए। किसान मेले भी बीज बेचने के केन्द्र तथा व्यापारियों की प्रदर्शनियां लगा कर सिर्फ आय प्राप्ति का ज़रिया ही नहीं बनने चाहिएं, अपितु सही रूप में किसानों तक अनुसंधान तथा दरपेश समस्याओं का समाधान ढूंढ कर उन्हें सही दिशा देने का केन्द्र हों।
आम किसानों में योजनाबंदी की रुचि बहुत कम है। किसानों को कृषि विशेषज्ञों से दिशा-निर्देश लेकर उचित ढंग से योजनाबंदी करने की ज़रूरत है। इससे ही उनकी आय में वृद्धि होगी। फसली विभिन्नता के पक्ष से विशेषज्ञों तथा अनुसंधान संस्थाओं को किसानों के साथ तालमेल करके ऐसी फसलें तथा उनकी लाभदायक किस्में उपलब्ध करनी चाहिएं, जो धान जितना मुनाफा दें। इस समय वर्तमान फसली चक्र में उनकी शुद्ध आय गेहूं पर कम, परन्तु धान पर अधिक आधारित है, क्योंकि गेहूं से अधिक मुनाफा धान देता है।
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