नकली चेहरे, नकली ज़िन्दगी

जो अपनी आंखों से देख रहे हो, वह हमेशा सच नहीं होता। हम कहते हैं पिछले दशक में हमने अभूतपूर्व तरक्की कर ली। दुनिया की ग्यारहवीं आर्थिक महाशक्ति से पहले पांचवीं, फिर चौथी और अब तीसरी आर्थिक महा-शक्ति बन जाने की घोषणाओं के करीब आ गये। वे हमारे कानों में दिन-रात ढोल बजाते हैं, कि जब आज़ादी के सौ साल पूरे करोगे, तो अपना राष्ट्र पूर्णत: विकसित राष्ट्र बन जाएगा। कोई हैरानी न होगी कि यह देश दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन जाए, अमरीका और चीन को पछाड़ कर।
हम फटी जेबों और सस्ते राशन पर पलती अपनी दुनिया की सबसे बड़ी आबादी के साथ यह घोषणा सुन कर इतरा सकते हैं, लेकिन असली क्या है, और नकली क्या है, कुछ पता नहीं चलता क्योंकि इसके साथ ही पता चलता है कि यहां औसत आदमी की जेब तलाशो तो वह एशिया में ग्यारहवें स्थान पर है। लोगों की खुशहाली जांचने जाओ, तो हमारे पड़ोसी देश भी हमसे आगे नज़र आते हैं, कि जिनके आर्थिक रूप से जर्जर होने की घोषणा हम न जाने कब से कर रहे हैं। अभी पिछले दिनों प्रसन्नता सूचकांक निकला, तो पता लगा कि सबसे अधिक अप्रसन्न और अस्वस्थ देशों में से हम भी एक हैं। कामकाज का सूचकांक निकला तो पता चला कि देश की आधी आबादी बिना काम के बैठी है। आज भी घर और खेत में काम करती औरतों को उनकी मेहनत का भुगतान नहीं मिलता, कि ‘भई घर का काम है, कर रहे हो। इसके लिए वेतन क्या?’
हम अपने देश को युवा देश कहते हैं, क्योंकि इसकी आधी आबादी कामकाज योग्य आयु कोष्ठक में है, लेकिन यथा समय यथोचित काम न मिलने के कारण बुढ़ा गई है। क्यों न अब अपने देश को हम असमय बूढ़े हो गये लोगों का देश कह दें। लेकिन नहीं कह पाते और अब भी अपने देश को युवा देश कहे जा रहे हैं।
इतना ही क्यों? लोग केवल नकली ही नहीं हो गये, नकली जीवन जीने में भी सुख पाने लगे हैं, जिसे दो पंक्ति सही लिखनी नहीं आती, वह अपने आपको महापण्डित या महान लेखक कहते हुए तनिक भी शर्मिन्दा नहीं होता बल्कि किराये के मंचों से अपना प्रशस्ति गायन करवाने से नहीं चूकता।
क्या करें? पुस्तक संस्कृति का अवसान हो गया और लोग गूगल से मिले ज्ञान के बल पर विद्वान बन गये हैं। अब असली नहीं, नकली हो जाने की ही महिमा है। लोग सम्पर्क संस्कृति की सहायता से किसी महामना से हाथ मिला आते हैं, तो उसे उसके द्वारा किया गया बड़ा सम्मान बताते हैं। यहां नकली मसीहाओं की बन आई है। वे अपने दुष्कर्मों पर चमकदार लबादे ओढ़ाते हैं।
संकोच की छोड़िये, संकोच का तो नाम ही जैसे शब्दकोशों से गायब हो गया है। अब पैसे देकर अपनी पुस्तक छपवा कर, स्वयं उस पर एक साहित्य मिलनी आयोजित करवा अपने आपको किसी बड़े शीर्षक वाला पुरस्कार देने वाले से अभिनंदित करवा लिया जाता है। इस फर्जीवाड़े से किसी को कोई संकोच नहीं होता, बल्कि अपने द्वारा किये गये अपने ही अभिनंदन का वे सोशल मीडिया पर प्रचार करने और लाइक्स बटोरने के धंधे में लग जाते हैं।
यहां नये-नये धंधे पनप रहे हैं। क्या इसी का नाम नवाचार है? तनिक फेसबुक या सोशल मीडिया पर छप रहे विज्ञापनों को देखिये। पहले किसी दूसरे के नाम से लिखने और रचना कर्म करने को लेखक के लिए आत्महत्या समझा जाता था। इस पर बड़े-बड़े दर्दनाक नाटक लिखे और मंचित किये जाते, कि ‘कलम को बेचो हमें रोटी चहिए’ का आर्तनाद इन नाटकों के पीछे रहता।
क्या आप जानते हैं, कि अब दूसरे के नाम से लिखना या घोस्ट राइटिंग बाकायदा एक धंधा बन गया है। बाकायदा ऐसे लेखन की सेल लगाई जाने लगी है। एक पर एक फ्री। अचानक बौड़म लोग कलाकार, रचनाकार के रूप में आपसे टकरा जाते हैं। बड़े-बड़े परिचय पत्र हैं उनके पास, उनके नाम से लिखे गये रचनाकर्म की फेहरिस्त है उनके पास। अब किसाने बाज़ार में हांक लगा कर किसके लिए क्या लिख दिया, कुछ पता नहीं चलता। यूं ही यह बाज़ार फलता फूलता रहा, तो एक दिन इस लम्बे-चौड़े देश का हर पढ़ा-लिखा आदमी अपने नाम से लिखी गई एक-एक किताब लेकर घूमता हुआ नज़र आएगा। महाभारत तो एक ही होगा, उसके लिखने वाले न जाने कितने वेद व्यास नज़र आने लगेंगे।
यही नहीं, यहां तो डिग्रियों और ईनाम अभिनंदन की भी सेल लग गई है। पहले तो विदेश जाने के लिए ही अंग्रेज़ी जानने की फज़र्ी डिग्रियां बिकती थीं, अब तो डाक्टरेट तक की फज़र्ी डिग्रियां बिकने लगीं। अध्यवसाय का विकल्प समृद्धि हो गई। पैसों से जेब भरी है, तो जो चाहे वह डिग्री खरीद लो, और अपनी नाम पट्टिका को अलंकृत कर लो।
मज़ेदार बात यह है कि किसकी डिग्री और किसका पुरस्कार असली है या नकली, यह जानना भी आजकल बड़ा कठिन हो गया है। हरिद्वार में चोटीवाला एक प्रसिद्ध भोजनालय है। अब वहां न जाने कितने भोजनालय हो गये इसी नाम से, और हर भोजनालय अपने आपको असली बता रहा है। विडम्बना यह है कि कई बार यह नकली असली से ज्यादा चल निकलते हैं। मिलावटी सामान अपने आपको जितना विशुद्ध कहता है, उतना ही अधिक बिकने लगा कि जैसे पहले कहते थे, कौआ चला मोर की चाल, अपनी चाल भी भूल गया। अब तो कौए की चाल देख कर मोर भी अपनी चाल भूलने लगे हैं।

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