बढ़ती का नाम दाढ़ी !

कलाकार अमिताभ बच्चन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, क्रिकेटर विराट कोहली इन तीनों में एक समानता है। आप कहेंगे कि तीनों ‘सेलेब्रेटी’ हैं। ये बात सही है। इसके अलावा एक और समानता है। तीनों ‘दाढ़ीवाले’ हैं। अब आप मुझसे सहमत हो चुके होंगे।  पुरुष कुंवारा हो या विवाहित, उनमें दाढ़ी, मूंछें रखने का जबरदस्त क्रेज जोर पकड़ चुका है। पुराने जमाने में राजा-महाराजा, साधु-संत हों या फिर डकैत, अधिकतर दाढ़ी, मूंछों में ही दिखाई देते थे। कुछ विद्वानों, बुद्धिजीवी, साहित्यकारों आदि की असली पहचान, पूछ-परख ही दाढ़ी, मूंछों के कारण होतीं थी। इसी कारण उन्हें ज़रूरत से ज्यादा मान-सम्मान भी मिलता था लेकिन आजकल हर ऐरा-गैरा, नथू-खैरा दाढ़ी बढ़ाने के चक्कर में रहता है, ताकि वो भी इस कैटगरी में आसानी से शामिल हो जाए। उन्हें भी आदरणीय समझा जाए।
कुछ गोरे, चिकने-चुपड़े चेहरों पर दाढ़ी खूब जंचती-फबती है। गजब की आकर्षण शक्ति होती है उनकी दाढ़ी में, लेकिन कुछ के चेहरों पर उग आई दाढ़ी, मूंछें बड़ी डरावनी, भद्दी लगती हैं। उनका चेहरा बेहद बदसूरत, भयानक दिखने लगता है। जिससे कुछ बच्चे उन्हें चोर, डाकू तक समझने लगते हैं। कई दाढ़ीवालों के चेहरों और सर के बिखरे हुए बालों को देखकर लगता है कि वे बीमार चल रहे हैं। एक फिल्म देखी थी, जिसमें श्याम वर्ण के हीरो के लंबे, काले केश, घनी दाढ़ी, मूंछें थी। ऊपर से शरीर पर डार्क कलर के कपड़े और आंखों पर काला गॉगल चढ़ाकर रखा था। एक तो करैला, ऊपर से नीम चढ़ा! वे नायक कम, खलनायक ज्यादा लग रहे थे। कुछ वर्षों पूर्व तक, छोटे-बड़े शहरों या महानगरों में हमेशा उमंग, उत्साह, उल्लास, ऊर्जा भरे क्लीन शेव वाले चेहरे नजर आते थे। पता नहीं, किसकी नजर लगी कि उनमें से अब ज्यादातर दाखीवाले बन गए। यहां तक की एक ही घर में रहने वाले बाप-बेटे भी दढ़ियल होते हैं।
पुराने जमाने में मूंछों का बड़ा महत्व था। इसे मर्द मानसिकता से जोड़कर देखा जाता था। शनै-शनै मूंछें गायब होने लगीं। सफाचट चेहरों को देखने की आदत सी पड़ चुकी थी कि अब उन्होंने दाढ़ी, मूंछें बढ़ाने को ही फैशन-पैशन-कॉमन बना लिया है। कई अजीबोगरीब स्टाइल की दाढ़ीयां देखने को मिलती हैं। एक की तो कछुआ छाप अगरबत्ती स्टाइल की दाढ़ी देखकर सोचने लगा, सलून वाले को काफी कसरत करनी पड़ती होगी, इसे शेप में लाने के लिये। कुछ के टोढ़ी पर लंबी पट्टी वाले बालों को देखकर सोचना पड़ता है कि इसे दाढ़ी कहें या दाढ़ा! हर 5 में से 1 चेहरा दाढ़ीवाला दिखता है। कई लोगों ने इसे अपनी आन-बान-शान-पहचान का प्रतीक बना लिया है। मुझे भी विवाह बाद शौक चर्राया था दाढ़ी, मूंछों का। लेकिन एक रात श्रीमती जी ने क्रोधित होकर इस चुभती दाढ़ी को मुंडवाने का अल्टिमेट दे दिया। सुबह सलून में जाकर दाढ़ी, मूंछें मुंडवाने पर लगा चेहरे पर का भार कुछ हल्का हो गया है। (सुमन सागर)

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