रुक जाओ न मंगला!
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एम.ए. की पढ़ाई पूरी होने से पहले ही मंगला के बापू चल बसे। मां तो बचपन में ही छोड़ गई थी। बापू को मंगला इतनी प्यारी थी कि उसने किसी रिश्तेदार को भी दूसरी शादी का नाम नहीं लेने दिया। अब जब मंगला बिल्कुल अकेली हो गई थी, तो दूर-नज़दीक के सभी नाते रिश्तेदारों ने बहुत सिर मारा कि मंगला भी अब घर बसा ले, लेकिन मंगला ने किसी की बात पर कान नहीं धरे। हालांकि इस बीच उसे गिरीश का कोई समाचार भी नहीं मिला। फिर भी कहीं उसके मन के आंगन में तुलसी के पौधे सा गिरीश का नाम सुगंध बिखेरता रहता था। यह अलग बात है कि वह अब गिरीश की ओर से निराश हो चली थी। कहां खोजती उसे सिवाय अपने मन के! बापू उसकी कोई बात तो नहीं टालते थे लेकिन वह उनसे कभी कह भी तो नहीं सकी थी कि वह गिरीश को खोजें। क्या सोचेंगे बापू भी? फिर अब तो बापू ही नहीं और मंगला की सहेलियां भी एक-एक करके सब ही तो ब्याही गई थीं।
मंगला ने एम.ए. संगीत की वाद्य विधा में किया था। अब वह पी.एच.डी. के लिए फिर देहरादून चली गई। यहीं एक बार फिर उसका गिरीश से सामना हो गया। गिरीश उसे खुशी-खुशी अपने घर ले गया जहां उसका परिचय उसने अपनी सुन्दर और विदुषी पत्नी कंचन, दो बेटों और चार मास की बेटी पूजा के साथ-साथ मंगला की समव्यस्क अपनी बहन दीपा से भी कराया। इस भरे पूरे परिवार को देख कर मंगला को एक झटका तो अवश्य लगा किन्तु उसने तुरन्त ही स्वयं को सहज कर लिया। अलबत्ता दीपा से उसके सहज स्नेह सम्बंध दृढ़ से दृढ़तर होते चले गये। फिर दीपा से मंगला के भीतर का सच भी छुपा न रह सका लेकिन अब हो भी क्या सकता था।
मंगला को मां अक्सर याद आती जिसे उसने बचपन में खो दिया था। परिवार में और तो कोई था नहीं जो मंगला को शादी के लिए मजबूर करता। सब दूर के रिश्तेदार थे, किन्तु अब दीपा और गिरीश उसे समझाने-बुझाने में लगे हुए थे परन्तु उन दोनों के लाख सिर मारने पर भी मंगला शादी के लिए रजामंद नहीं हुई। उसके सामने जब भी उसके विवाह की बात छेड़ी जाती तो उसे लगन मंडप में सेहरा बांधे गिरीश ही खड़ा नज़र आता और बाल बिखराये रोती बिलखती कंचन और छोटे-छोटे उसके तीन बच्चे। वह सहम कर झट से मना कर देती। अब तो थककर गिरीश ने भी हार मान ली थी।
पी.एच.डी. पूरी होने से पहले ही मंगला को नौकरी भी देहरादून में ही मिल गई थी। धीरे-धीरे गिरीश पर भी यह भेद खुलने लगा कि मंगला के दिल में क्या है, लेकिन अब वक्त बीत चुका था। अब तो गिरीश का अपना सफल संसार था पर गिरीश यह भी तो नहीं कह सकता था कि उसने कभी मंगला की चाह ही नहीं की थी।
वह गांव से लौट कर अपने माता-पिता को अपनी इच्छा बताना चाह रहा था किन्तु उन्होंने तो उसके लिए कंचन को पहले ही पसंद कर लिया था। सो उसने चुपचाप उसे स्वीकार कर लिया। गिरीश को क्या पता था कि भाग्य उन्हें फिर एक ही जगह पर ला खड़ा करेगा। एक दिन अवसर देखकर गिरीश ने ही बात छेड़ी थी,
‘देखो मंगला! पागल मत बनो, तुम जानती हो न कि दूसरे किनारे लगी नाव की आशा करना बेकार है।’ गिरीश बात को यहीं समाप्त कर देने की ़गज़र् से मंगला को समझाने लगा, ‘ऐसी हालत में तुम स्वयं तो परेशान हो ही, मुझे भी उलझा रही हो। जरा सोचो, मेरे साथ चार जीवन और बंधे हैं।’
‘मैं आप को कुछ कह रही हूँ क्या? कहां डिस्टर्ब किया है मैंने आप लोगों को? आप जानते हैं, मैंने तो कभी आपकी निकटता भी नहीं खोजी।’ मंगला ने धरती पर नज़रें जमाए उत्तर दिया।
‘आखिर प्रेम का प्रतिदान तो सब चाहते हैं।’ गिरीश ने नाक पर चश्मा ठीक किया, फिर थोड़ा मुस्कराकर बोला, ‘चलो, तुम तो कुछ नहीं कह रही हो, नारी हो न! अपने संयम पर दृढ़ भी हो और तुम्हें स्वयं पर विश्वास भी है, परन्तु कहीं मैं ही दुर्बल पड़ गया तो?’
‘आप चिन्ता न करें। मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।’
और फिर मंगला ने वह नौकरी ही छोड़ दी और मेरठ चली गई। बेगम बाग में थोड़ी सी जमीन उसके बापू की खाली पड़ी थी। कुछ रिश्तेदार भी वहां थे। वहीं, उसी ज़मीन पर एक छोटा-सा घर बनाकर उसने संगीत का एक स्कूल खोल लिया।
मेरठ रहते हुए मंगला को जाने कितने ही साल बीत गये थे कि एक दिन उसे बाज़ार में दीपा ने घेर लिया। बहुत सारे गिले शिकवे करने के बाद दीपा बोली,
‘मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा, हां! मुझ से क्यों नाता तोड़ लिया तुमने?’ भरे बाजार में दीपा ने उसे पकड़कर झकझोर डाला तो मंगला कुछ भी उत्तर नहीं दे सकी। बस, इतना ही कह पाई, ‘इतने दिनों बाद मिली हो तो क्या बाज़ार में ही लड़ती रहोगी? चलो घर चलकर झगड़ा कर लेना।’ और वह उसे अपने घर ले आई। दीपा दो दिन मंगला के पास रही।
(क्रमश:)



