प्रदूषण की रोकथाम हेतु अदालत की कठोर टिप्पणी

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देश में बढ़ते प्रदूषण को लेकर की गई एक कठोर टिप्पणी के दृष्टिगत जहां प्रदूषण के बेहद गम्भीर चरण पर पहुंच जाने जैसी भयावहता का पता चलता है, वहीं इससे यह भी पता चलता है कि न्यायालय इस मामले पर अब और अधिक समय तक उदार बने रहने के पक्ष में प्रतीत नहीं होता। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण-रोकथाम संबंधी एक महत्त्वपूर्ण मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि वातावरण की स्वच्छता से जुड़े मामलों को लेकर और ढील नहीं दी जा सकती। अदालत ने इस संदर्भ में भी बड़ा गम्भीर रुख इख्तियार किया कि प्रदूषण-रोकथाम संबंधी नियमों का अदालती निर्देशों के बावजूद बार-बार उल्लंघन किया जाता है। विकास परियोजनाओं हेतु सरकारों से फीस अदायगी करके अनुमति तो बेशक ले ली जाती है, किन्तु इसके बाद नियमों और कानूनों को छिक्के पर टांग दिया जाता है। यह स्थिति किसी भी राष्ट्र और समाज के लिए बेहतर और हितकर नहीं हो सकती। अदालत ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी कि परियोजनाओं हेतु प्रदूषण नियंत्रण विभाग से वांछित अदायगी करने के बाद, प्रदूषण फैलाये जाने संबंधी गतिविधियों को सहन नहीं किया जा सकता। इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं हो सकता कि भुगतान करने वाले को कुछ भी करने की अनुमति मिल जाती है। इस फैसले का महत्त्व इस लिए भी बढ़ जाता है कि इसकी सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली जस्टिस जोयमाल्या बागची एवं जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने की थी। इस पीठ ने यह अहम फैसला वन-संबंधी पुनरीक्षण संबंधी कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया। 
इन याचिकाओं में कुछ ऐसी भी थीं जहां पिछली तिथियों का हवाला देते हुए कुछ लोगों ने नियमों का खुलेआम उल्लंघन शुरू कर दिया था। इन उल्लंघनों में वृक्षों का अवैध कटान और अवैध खनन की गतिविधियां शामिल थीं। कई मामलों में कटाई और खनन के लिए वर्णित रकबे से अधिक क्षेत्र में कार्रवाइयां की जाने लगी थीं। अदालत की सख्ती का अनुमान पीठ की इस एक टिप्पणी से भी लगाया जा सकता है कि बिना अनुमति के चल रही और रकबा बढ़ा ली गई परियोजनाओं को लेकर सरकारों और प्रशासन द्वारा अज्ञानता प्रकट किये जाने को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि विदेशों में कहीं-कहीं पर वृक्षों की कटाई और खनन को लेकर नियम एवं कानून काफी ढीले हैं किन्तु विगत कुछ वर्षों से ऐसे देश भी वातावरण की स्वच्छता और प्रदूषण पर नियंत्रण को लेकर काफी कड़ा रवैया अपनाने लगे हैं। अत: स्पष्ट रूप से भारत जैसे विकासशील देश में प्रदूषण को लेकर किसी प्रकार की ढील को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। इस स्थिति को लेकर अदालतें पहले भी कई बार अपनी कठोर भावनाओं को व्यक्त कर चुकी हैं, किन्तु प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही के कारण स्थितियों पर कभी भी नियंत्रण नहीं पाया जा सका। लिहाज़ा प्रदूषण नियंत्रण नियमों के उल्लंघन और वातावरण की स्वच्छता का ध्यान न रखे जाने की क्रियाएं बढ़ती गई हैं।
हम समझते हैं कि स्थिति सचमुच गम्भीर और पानी सिर के ऊपर से होकर गुजर जाने जैसी हो गई प्रतीत होती है। यह स्थिति पूरे विश्व में एक समान पाई गई है, हालांकि भारत इस मामले में बेहद गम्भीर मुद्दा बन गया है। वैश्विक वायु गुणवत्ता संबंधी रिपोर्ट-2025 के अनुसार भारत प्रदूषण बढ़ाने के मामले में नीचे से छठे स्थान पर आता है। देश में ऐसे क्षेत्रों की संख्या निरन्तर कम होती जा रही है जहां वातावरण की स्वच्छता और वायु की शुद्धता को किसी कसौटी पर रखा जा सके। इस रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक धरातल पर पाये गये 25 अत्यधिक प्रदूषित शहरों में से सभी भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हैं। राजधानी दिल्ली विश्व की तीन महा-प्रदूषित  राजधानियों में शुमार होती है। नि:संदेह ऐसे आंकड़ों के बारे में जान कर राष्ट्र-हित का चिन्तन करने वाले किसी भी भारतीय को शर्म आ जाती है, किन्तु देश में स्थिति यह भी है कि स्वयं सरकारी परियोजनाओं में भी वृक्षों के अवैध कटान और अवैध खनन को रोकने हेतु अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। हम समझते हैं कि बेशक सरकारों और उनके अधीनस्थ कार्य करने वालों को प्रदूषण की रोकथाम और वातावरण की स्वच्छता हेतु नियमों एवं कानूनों का प्रतिबद्धता के साथ पालन अवश्य करना चाहिए। अदालतों की सक्रियता से यह भी पता चलता है कि दुनिया की बेहतरी वाले इस कार्य हेतु वे भविष्य में भी अपनी सक्रियता को बनाये रखेंगी। हम समझते हैं कि इस मामले में जन-भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है जितना कि अदालतों की सजगता। जन-भागीदारी हेतु स्वयं-सेवी संस्थाओं को आगे आना चाहिए। यदि सरकारें और स्वयं-सेवी संस्थाएं अब भी नहीं जागीं तो भावी पीढ़ियां मौजूदा पीढ़ी को कभी क्षमा नहीं करेंगी। 

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