नारी शक्ति वंदन अधिनियम : महिला आरक्षण का नया अध्याय

लोकतंत्र एक सफल एवं समृद्ध राष्ट्र का आधार है। भारतीय लोकतंत्र में कई ऐसे ऐतिहासिक क्षण आते हैं जब विधायी कदम सामान्य कानून निर्माण से ऊपर उठकर लोकतंत्र की नैतिक दिशा को निर्धारित करने का कार्य करते हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम संविधान (106वां संशोधन अधिनियमए 2023)  निश्चित रूप ऐसा ही एक ऐतिहासिक कदम है, जो भारत के विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा में इतिहास को नई दिशा दे रहा है।
यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करता है, यही नहीं यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित सीटों पर भी लागू होगा। इसके अलावा, यह निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन और आगामी जनगणना व परिसीमन प्रक्रिया (सीमा निर्धारण) से इसे जोड़ते हुए एक पारदर्शी और संवैधानिक व्यवस्था सुनिश्चित करता है। वर्षों की चर्चा, व्यवधान और विलम्ब के बाद भारत अब संकल्प से क्रियान्वयन की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
भारतीय संस्कृति में नारी को अन्नपूर्णा माना जाता है जो पोषण, समृद्धि और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है। यह सम्मान केवल सांस्कृतिक मान्यता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मूल्यों में भी गहराई से निहित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा महिला सशक्तिकरण को राष्ट्र निर्माण के लिए अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका यह दृष्टिकोण कि ‘जब महिलाएं प्रगति करती हैं, तो दुनिया प्रगति करती है’, महिलाओं को भारत की विकास प्रक्रिया के केंद्र में दर्शाता है, जहां उन्हें ऐसे रूप में देखा जाता है जिनके पास भारत की प्रगति में नेतृत्व करने और निर्णय लेने की क्षमता है।
प्रतीकात्मकता से वास्तविक परिवर्तन तक : भारत के लोकतंत्र में महिलाओं की मतदान भागीदारी हमेशा उल्लेखनीय रही है, लेकिन  विधायिका में उनका प्रतिनिधित्व कम रहा है।  देश की लगभग आधी आबादी होने के बावजूद संसद में उनका प्रतिनिधित्व न्यूनतम है।
हालांकि, यह अवधारणा नई नहीं है। वास्तव में साल 1996 में ही बिल का एक संस्करण  प्रस्तुत किया गया था, लेकिन उसके बाद आगामी वर्षों में राजनीतिक अनिच्छा, राजनीतिक अभिजात वर्ग के बीच असहमति और इस कानून को अस्तित्व में लाने में विभिन्न बाधाएं आईं। वर्तमान शासन सहमति बनाने और विधायी इच्छाशक्ति के साथ इस विधेयक को भारी बहुमत के साथ अधिनियमित करने में सक्षम हुआ, जो कि लगभग तीन दशकों से भारत में नहीं हो पाया था। हालाकि जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया के कारण देरी की आलोचना को संदर्भ में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। ये केवल प्रक्रियाएं नहीं, बल्कि देश में 715 मिलियन से अधिक महिलाओं के प्रतिनिधित्व में समानता सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा तंत्र का गठन हैं।
कल्याण से महिला-नेतृत्व वाले विकास तक : नए कानून के महत्व को समझने के लिए 2014 के बाद देश की नीतियों की दिशाको भी देखना ज़रूरी है। भारतीय जनता पार्टी का ध्यान महिलाओं के विकास से आगे बढ़कर महिला नेतृत्व वाले विकास पर केंद्रित हुआ है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने लाखों महिलाओं को धुएं और स्वास्थ्य जोखिमों से मुक्ति दिलाई जबकि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान ने समाज में जागरूकता और शिक्षा को बढ़ावा दिया। जन धन खातों, मातृत्व लाभ और आवास योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी ने उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और गरिमा को मजबूत किया है।
ग्रामीण स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं में लगभग 50 प्रतिश महिलाओं की भागीदारी एक शांत लेकिन सशक्त क्रांति का उदाहरण है। इसने यह सिद्ध किया है कि अवसर मिलने पर महिलाएं प्रभावी, संवेदनशील और ज़िम्मेदार नेतृत्व प्रदान कर सकती हैं। ऐसे में उच्च विधायिकाओं में आरक्षण कोई प्रयोग नहीं बल्कि एक सफल ट्रैक रिकॉर्ड बनाना है।
वर्तमान समय की सबसे बड़ी विशेषता है नीतिगत सुधार, कानूनी सुधार और निरन्तर नीति कार्रवाई का तालमेल। महिला आरक्षण विधेयक कोई अलग कानून नहीं है, बल्कि भारत की विकास गाथा में विगत एक दशक से चल रही महिला-केंद्रित विकास नीति का स्वाभाविक परिणाम है। जब महिलाएं निर्णय लेने की प्रभारी होती हैं, तभी वे वास्तव में सशक्त होती हैं।  भारत जब विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है, तब भारत के लोकतंत्र को न केवल आर्थिक आधार पर, बल्कि इसके संस्थानों की समावेशिता के माध्यम से भी मापा जाएगा जिसमें महिलाओं का प्रतिनिधित्व शासन में योगदान देगा।
विशेष रूप से संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम- 2023 पर विचार-विमर्श करने के लिए 16 अप्रैल से 18 अप्रैल तक तीन दिवसीय विशेष संसद सत्र का विस्तार स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सरकार अब प्रतिनिधित्व की परिभाषा को पुनर्लेखित कर रही है, जहां भारत की महिलाओं की आवाज सत्ता के गलियारों में स्पष्ट और सशक्त रूप से गूंजती है। 
ई-मेल : satnam.sandhu@sansad.nic.in

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