ट्रम्प के चीन दौरे का महत्त्व
विश्व भर की नज़रें अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तीन दिवसीय चीन यात्रा पर केन्द्रित हैं। अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा उठाया गया यह बड़ा कदम है। इससे 9 वर्ष पूर्व भी ट्रम्प राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल में वर्ष 2017 में चीन गए थे, परन्तु इस बार उनके दौरे को अनेक पक्षों से देखा जा रहा है। आज ये दोनों देश विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियां हैं। चाहे अभी भी चीन इस पक्ष से अमरीका से आधा ही माना जाता है, परन्तु अन्य सभी देशों को उसने अपनी लगातार मज़बूत हो रही आर्थिकता से बहुत पीछे छोड़ दिया है। आज जिस तरह के अन्तर्राष्ट्रीय हालात बने दिखाई देते हैं और जिस तरह की गम्भीर और जटिल समस्याएं इन दोनों देशों के समक्ष हैं, उनका निश्चित समय में हल हो पाना बेहद कठिन प्रतीत होता है। इस बार डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी कुर्सी सम्भालते ही अपने देश में होते निर्यात संबंधी विश्व भर के देशों को निशाना बनाया था और उन पर अपनी इच्छानुसार अलग-अलग तौर पर कर (टैरिफ) लगा दिए थे। चीन के संबंध में भी उसने ऐसा ही रवैया धारण किया था, जो अब तक भी जारी हैं, परन्तु इसके बावजूद विश्व की बड़ी कम्पनियों के प्रमुखों को जिस तरह वह अपनी इस यात्रा में साथ लाये हैं, उससे यह प्रभाव मिलता है कि उनका मुख्य लक्ष्य आपसी व्यापार है और खासकर उन वस्तुओं का आदान-प्रदान करना है, जो अपने-अपने ढंग से दोनों ही देशों के लिए ज़रूरी हैं।
चीन में ट्रम्प का शानदार स्वागत हुआ है। उनकी चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग के साथ पहले की भेंटवार्ताएं बहुत ही भावपूर्ण रही हैं। इस समय सबसे बड़ी समस्या अमरीका और ईरान का युद्ध है, जो ट्रम्प ने 28 फरवरी को स्वयं ही इज़रायल के साथ मिलकर शुरू किया था। इसमें वह स्वयं भी पूरी तरह फंसे हुए दिखाई देते हैं, क्योंकि उनके अपने देश में ही इस युद्ध का व्यापक स्तर पर विरोध हो रहा है और अमरीका के अब तक अरबों ही डॉलर इस पर खर्च हो चुके हैं, जिससे वहां महंगाई भी बढ़ती हुई दिखाई देती है। यहीं बस नहीं, इस युद्ध की चपेट में विश्व भर के देश आ चुके हैं। कच्चे तेल के उत्पादन और सप्लाई में भारी कमी पैदा हो जाने से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल के मूल्य आसमान छूने लगे हैं, जिसका विपरीत प्रभाव उनकी आर्थिकता पर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में युद्ध के लम्बे होते जाने से भारत में भी इसकी तपिश महसूस की जाने लगी है। चीन ने पश्चिम एशिया के इस लम्बे होते युद्ध में अब तक अपनी अच्छी भूमिका ही निभाई है। विगत दिवस ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची चीन आए थे। समाचारों और बयानों के अनुसार चीन के नेताओं ने ईरान को शीघ्र होर्मुज़ जल मार्ग खोलने हेतु प्रेरित किया था और इसके साथ ही परमाणु हथियार न बनाने की तेहरान की प्रतिबद्धता की प्रशंसा की थी। ईरान होर्मुज़ के मुद्दे पर स्वयं भी अन्तर्राष्ट्रीय रूप से अकेला पड़ता दिखाई दे रहा है।
दूसरी तरफ अमरीका ने भी ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी करके उसे पूरी तरह घेरने का अपना यत्न जारी रखा हुआ है। देखना यह होगा कि यह यात्रा इन पक्षों से कितनी सफल रहती है। ताइवान जोकि एक बड़ा द्वीप है, पर चीन हमेशा अपना अधिकार जताता आया है, जबकि ताइवान ने हमेशा अपना आज़ाद अस्तित्व बताया है। वहां लगातार लोकतांत्रिक प्रक्रिया मज़बूत हुई है और इसने पिछले दशकों में आश्चर्यजनक सीमा तक विकास भी किया है। अमरीका और जापान चीन से इसकी रक्षा करने के लिए हमेशा उसके साथ खड़े रहे हैं। अभी भी ताइवान ने अमरीका के साथ रक्षा उपकरणों के लिए अरबों डॉलर का सौदा किया है। दोनों राष्ट्रपतियों में इस जटिलता को सुलझाने में कितनी सामर्थ्य और इच्छा है, इसे भी सभी ओर से गम्भीरता के साथ देखा जा रहा है। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन ने लगातार अपनी विस्तारवादी नीतियों को जारी रखा है, जिससे इस क्षेत्र के दर्जनों ही देश लगातार आपत्ति जताते रहे हैं। चीन को इस नीति से रोक पाना बेहद कठिन प्रतीत होता है, परन्तु फिर भी इस दौरे से दोनों देशों में बने उत्साहपूर्ण माहौल के दृष्टिगत इससे अच्छे परिणामों की ही उम्मीद की जानी बनती है, क्योंकि आज जिस तरह पश्चिम एशिया के युद्ध के मामले पर पूरा विश्व दुविधा में फंसा दिखाई दे रहा है, उससे निकलने के लिए बड़े देशों की ओर से बड़े यत्नों और पूरे सहयोग की ज़रूरत होगी, उनके संयुक्त यत्न ही युद्ध के गहरे होते बादलों के छंटने में सहायक हो सकते हैं।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

