नौकरशाहों और विशिष्ट वर्ग को भी तेल बचाना चाहिए
हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्यपूर्व में लगातार युद्धक स्थितियां बनी रहने के कारण देशवासियों को आगाह किया था कि इससे देश की आर्थिक स्थिति पर भारी बोझ पड़ रहा है। अत: देशवासियों को तेल के इस्तेमाल पर संयम बरतना चाहिए। क्योंकि भारत अपनी कुल ज़रूरत का 70 फीसदी से ज्यादा तेल आयात करता है और जिस तरह से लगातार तनाव की स्थितियां बनी हुई हैं, उसके कारण पिछले दो महीनों में तेल की कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ गई हैं। इस कारण भारतीय तेल कंपनियों को हर दिन लगभग 2400 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है।
प्रधानमंत्री की आम लोगों से तेल बचाने के लिए की गई अपील, राष्ट्रीय हित में स्वागत योग्य है। लेकिन अभी दो दिन पहले तक यह सवाल बना हुआ था कि क्या वह खुद अपने कार काफिले में उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कमी करेंगे या कि उनके वरिष्ठ मंत्री ऐसा करेंगे। अब जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरी 13 मई 2026 को राजधानी दिल्ली में महज दो कारों के साथ एक महत्वपूर्ण मीटिंग के लिए जाते दिखे हैं, जिसमें एक में वह स्वयं थे और दूसरी में उनके एसपीजी के सुरक्षा गार्ड, तो यह सवाल उठता है कि अन्य मंत्री, प्रदेशों के मुख्यमंत्री और दिगर मंत्री, नौकरशाह तथा देश का अभिजात्य वर्ग प्रधानमंत्री के इस उदाहरण से कितनी सीख लेता है? मसलन देश में चुनावी रैलियों और रोड शो जैसे राजनीतिक प्रदर्शनों पर इस समय पूर्णत: प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत है। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा यह अध्ययन किया जाना चाहिए कि शीर्ष सरकारी पदाधिकारियों के कार काफिलों को उनकी सुरक्षा प्रभावित किये बिना कम किया जा सकता है या नहीं। एक कदम जो सरकार को और उठाना चाहिए वह यह कि केंद्र और राज्य तथा उनके विभिन्न उपक्त्रमों द्वारा सरकारी कार खरीद कार्यक्रम को अनिवार्य रूप से किफायती श्रेणी की कार्यों तक सीमित कर देना चाहिए। केवल राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और भारत आने वाले विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के लिए ही अपवाद के तौर पर लग्ज़री कारों के उपयोग की सुविधा होनी चाहिए। साल 2021 में तेलंगाना सरकार की 30-30 लाख रुपये की कीमत वाली 32 नई लग्ज़री कारें खरीदने के लिए जबरदस्त आलोचना हुई थी। इसी तरह सरकार को सेना के जवानों के लिए कैंटीन स्टोर डिपार्टमेंट्स से कुछ दिनों के लिए जीएसटी सब्सिडी देकर कारें नहीं बेंची जानी चाहिएं।
अब समय आ गया है कि एयरकंडीशनिंग सुविधा वाले उन्नत आटोरिक्शा बाज़ार में लाये जाएं, ताकि कम से कम मध्यमवर्ग ऐसे वातानुकूलित आटोरिक्शा का उपयोग पसंद करें। जब ऐसे वातानुकूलित आटोरिक्शा का निर्माण शुरु हो जायेगा, तो सरकारी विभागों, मंत्रालयों और उन उपक्रमों की कारों को भी बड़े पैमाने पर उनसे बदला जा सकता है। दिल्ली में पहले ही कारों की उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए कार पार्किंग शुल्क दोगुना किया जा चुका है। लेकिन इसके विपरीत छोटी कारों पर जीएसटी 28 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। निश्चित रूप से इसमें कार निर्माताओं की प्रभावशाली लॉबी का दखल रहा होगा। हालांकि मंहगी कारों पर जीएसटी बढ़ाकर 40 प्रतिशत किया जाना, एक सही निर्णय था।
अधिक से अधिक शहरों में मेट्रो नेटवर्क बिछाना प्राथमिकता में होना चाहिए। कार निर्माता तब मेट्रो कोच निर्माण की ओर भी जा सकते हैं, जिनके निर्यात आदेश प्राप्त करने के लिए भी प्रयास किये जाने चाहिए। वे अपनी उत्पादन क्षमता का उपयोग तीन पहिया वातानुकूलित आटोरिक्शा बनाने में भी कर सकते हैं। महंगी कारों पर रोड़ टैक्स, बीमा प्रीमियम और अन्य सभी शुल्क सस्ती कारों की तुलना में दोगुने होने चाहिए। किसी भी श्रेणी की कार डीज़ल इंजन में नहीं होनी चाहिए। पेट्रोल और डीज़ल की खरीद कीमत लगभग सामान होने के बावजूद डीज़ल को सार्वजनिक परिवहन और मालवाहक वाहनों के लिए सस्ता रखा जाता है। इसलिए कारों में सस्ते डीज़ल का उपयोग एक तरह से चालाकी है। यह नहीं होना चाहिए। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पर्यावरण प्रदूषण निवारण नियंत्रण समिति के अध्यक्ष ने दिल्ली में गैर-सीएनजी कारों पर पूर्ण प्रतिबंध का सुझाव दिया था। हालांकि ऑड-इवन प्रणाली मध्यमवर्ग के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। क्योंकि अमीर लोग इस व्यवस्था से बचने के लिए अलग-अलग ऑड और इवन नंबरों वाली कई कारें खरीद लेंगे।
केंद्र सरकार को बैटरी जैसी सामान्य एक्सेसरीज़ के मानकीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि विभिन्न कंपनियों की अलग-अलग कारों में समान पुरजों का उपयोग हो सके। इससे सीमित आकार और विनिर्देशों में बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण उपभोक्ता वस्तुओं की लागत काफी कम हो सकती है। जब तक ऐसे दिशा-निर्देश केंद्र सरकार की आटो नीति में उल्लेखित हैं, लेकिन वास्तविक सच्चाई यही है कि व्यवहारिक दुनिया में इनका पालन नहीं होता। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



