साहिबज़ादा अजीत सिंह नगर, खटकड़ कलां और राम दयाल

प्रस्तुत कृति की जड़ें मेरे स्वर्गीय कवि मित्र तारा सिंह कामिल के पैतृक गांव हूकड़ां में हैं। यह गांव होशियारपुर-फगवाड़ा मार्ग पर होशियारपुर के चब्बेवाल कस्बे के निकट है। तारा सिंह के जीवित रहते मैं इस गांव के उस पीपल के पेड़ के बारे में भी जानता हूं जिसके बारे में तारा सिंह ने दिल्ली से इस गांव में आने के बाद मुझे बताया था। उस समय 50 वर्ष के हो चुके हमारे कवि उस पीपल की पहली शाखा पर चढ़ कर नीचे कूद कर आए थे। यह बात उन्होंने नई दिल्ली में कनॉट प्लेस के कॉफी हाउस में हम सभी को चाव से बताई थी।
यह सबब की बात है कि मैं भी उनके गांव उनके निधन के बाद ही गया था। मुझे ले जाने वाले हूकड़ां में जन्मे राम दयाल थे, जिन्होंने अपने भाइयों के साथ मिल कर पंजाब के विद्यार्थियों के लिए एक जागृति उपदेश जारी कर रखा है, जिसे वह ‘अवेयरनैस मिशन’ कहते हैं। इस मिशन के तहत वह गांवों और कस्बों के उन स्कूलों के विद्यार्थियों को जागृति उपदेश देते हैं, जिन्हें मौजूदा पंजाब सरकार ने स्कूल ऑफ  एमिनेंस घोषित कर रखा है। मैं उनके ऐसे ही एक कार्यक्रम में विशेष मेहमान के रूप में 2011 में शामिल हो चुका हूं।
इस महीने की 15 तारीख को वह साहिबज़ादा अजीत सिंह नगर के कुछ चुनिंदा स्कूलों के 600 विद्यार्थियों को शहीद भगत सिंह के गांव खटकड़ कलां ले गए थे। इस बार मैं खुद नहीं जा सका, लेकिन मेरे कहने पर हूकड़ां भाइयों में सबसे छोटे भाई राम दयाल इस कार्यक्रम का विवरण मुझे मेरे घर आकर दे गए। उनका एक भाई मोहन लाल माड़ी अस्वस्थ्य होने की वजह से नहीं जा सका था और रामजीत अपने बच्चों के पास कनाडा गए हुए थे।
राम दयाल खुद मेहनती व्यक्ति हैं। पुलिस की नौकरी के दौरान इस काम के लिए समय निकालना इस बात की पुष्टि करता है। यह बात भी मुझे पहली बार पता चली कि उनको तथा उनके भाइयों को इस ओर ले जाने वाली उनकी मां थी जिसने अपने तीनों बेटों को अच्छी शिक्षा दिला कर ऐसी जागृति के लिए प्रेरित किया था। इस बार का कार्यक्रम अकेले राम दयाल ने आयोजित किया था।
इस बार राम दयाल ने एमिनेंस स्कूलों के 600 विद्यार्थियों को 14 बसों में ले जाने का प्रबंध स्वयं किया था। इस कार्य के लिए 9 मई की तारीख चुनने वाले भी वही थे। इस महीने की 15 तारीख को थापर परिवार के सुखदेव का जन्मदिन था, जिन्होंने क्रांतिकारी कार्यों में भगत सिंह और राजगुरु का साथ दिया था।
14 बसों का खर्च देने वाले हूकड़ां भाई थे और खटकड़ कलां पहुंचने पर जो नाश्ता दिया गया, वह चंडीगढ़ के सेक्टर 8 के गुरुद्वारा साहिब से था। हिस्सा लेने वाले विद्यार्थियों ने खटकड़ कलां का वह घर भी देखा, जहां पाकिस्तान के चक्क नम्बर 105 से विस्थापित होकर आए भगत सिंह के माता-पिता (किशन सिंह तथा विदियावती) को शरण मिली थी। इसमें आधा दर्जन कमरों के अलावा पीने का एक कुआं और एक पुराना चरखा भी है। पंजाब सरकार का बनाया संग्रहालय भी 600 बच्चों को दिखाया गया। वह संग्रहालय भी दिखाया गया जिसमें अन्य शूरवीरों को जगह दी गई है। 
भाग लेने वाले विद्यार्थियों ने संग्रहालय में रखे  भाषणों और प्रश्न-उत्तर प्रतिस्पर्धाओं के प्रति भी भारी उत्साह दिखाया। मैंने देखा कि जब राम दयाल मेरे घर आए तो उनके पास आधा दर्जन रजिस्टर थे, जिनमें 9 मई, 2026 के कार्यक्रम के लेखांकन के अलावा पहले कुछ सालों से संबंधित दस्तावेज़ भी थे। हूकड़ां भाइयों के आदेश पर उन्हें चंडीगढ़ से ले जाकर नाश्ते के साथ-साथ प्रति विद्यार्थी एक स्कूल बैग तथा पांच कापियां भी वितरित की गईं।
मैंने अंत में राम दयाल से यह भी पूछा कि अगर यह कार्यक्रम सुखदेव की याद को समर्पित था तो 15 मई की बजाय 9 मई को क्यों रखा गया। उनका जवाब भी दिलचस्प था। यह कि ऐसा करने से कार्यक्रम में राजनीति आ घुसती है। हमारा उद्देश्य यह नहीं। इसीलिए हमने 2011 का कार्यक्रम भी शहीद भगत सिंह के शहीदी दिवस 23 मार्च की बजाय 31 मार्च को करवाया था। राम दयाल की पेशकारी से मुझे प्रतीत हुआ जैसे मैं खुद उनके साथ था।
अंतिका
(तारा सिंह कामिल)
रात फेर तुसीं सुपने आए,
आ के बहि गये कोल।
रात फेर चन्न अरशों लत्था,
ज़िमी दी भर गिया झोल।
नैण मेरे चुम्मण परछावें,
सोल बुल्लीयां खोल।
बोट वांग चिचलावण तड़फन, 
पर न सकण तोल।

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