फसलों के अवशेष जलाने के नुकसान

गत 23 अप्रैल तक गेहूं की पराली जलाने के 44 मामले सामने आए थे। यह निगरानी 1 अप्रैल से शुरू हो गई थी, जो 30 मई तक जारी रहेगी। पराली जलाने पर निकलने वाले धुएं से जहां जन हानि होती है, वहीं इससे पर्यावरण भी प्रदूषित होता है। इससे सांस लेने में मुश्किलस होती है, एलर्जी, गले में खराबी और आंखों में जलन होने लगती है। पराली जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन जैसी ज़हरीली गैसें पैदा होती हैं, जो मनुष्य की सेहत के लिए हानिकारक होती हैं। खेती विशेषत्रों के अनुसार पराली या नाड़ जलाने से भूमि के 80 प्रतिशत नाइट्रोजन और सल्फर तत्व, 40 प्रतिशत फास्फोरस और पोटाश तत्व नष्ट जाते हैं। फसलों के अवशेष जलाने से लाखों जीव-जंतु, जिनमें फसलों के मित्र कीड़े भी होते हैं, जल कर मर जाते हैं। इससे सड़कों, नहरों और खेतों के किनारे लगे पेड़ों के जल जाने से कई पक्षी और जानवर बेघर हो जाते हैं, जबकि सरकारें ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाने का ढिंढोरा पीटती रहती हैं। 
गत 20 अप्रैल को माछीवाड़ा के बेट इलाके के गांव सलाना बेट में गेहूं को लगी आग बुझाते समय ट्रैक्टर पर सवार नौजवान किसान मनदीप सिंह (42 वर्ष) की मौत हो गई थी। शॉर्ट सर्किट के कारण खेतों में नाड़ को आग लग गई, जो किसान मंदीप सिंह की गेहूं की फसल की ओर बढ़ रही थी। आग बुझाते समय धुएं की चपेट में आने के कारण वह घबरा गया और दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत हो गई थी। कृषि विशेषज्ञों की सिफारिशों और सरकार की फसल के अवशेष को न जलाने की अपील के बावजूद किसान इस बात को मानने को तैयार नहीं। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक अवशेष जलाने से ज़मीन की उपजाऊ शक्ति भी कम होती है। उल्लेखनीय है कि पंजाब में लगभग 34 लाख हैक्टेयर रकबे पर गेहूं की बिजाई की जाती है, जिससे लगभग 205 टन अवशेष निकलता है।
पंजाब जन सम्पर्क बोर्ड ने पंजाब में खेतों में फसलों के अवशेष को जलाने के रूझान पर अंकुश लगाने के लिए तैयारी की थी। जन सम्पर्क बोर्ड ने चार मामलों में 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया और एक मामले में सीआरपीसी की धारा 223 के तहत एफआईआर दर्ज की। तीन मामलों में रैड एंट्री जारी की गई है। रैड एंट्री का अभिप्राय है कि इसमें शामिल किसान अपनी ज़मीन बेच या गिरवी नहीं रख पाएंगे। निजी स्वार्थों के लिए लोगों की जान से खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए। जहां किसानों को अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है, वहीं केन्द्र और राज्य सरकारों को फसलों के अवशेष जलाने से रोकने के लिए व्यापक स्तर पर प्रबंध करने चाहिए।
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