जीवन बचाना है तो बचानी होगी जैव विविधता
आज के लिए विशेष
धरती पर जीवन का सारा ताना-बाना जैव विविधता पर ही टिका हुआ है, लेकिन इंसानी गतिविधियों से धरती लगातार बदल रही है, इंसान के अलावा इस ग्रह पर वनस्पतियां और जीव-जंतु कम हो रहे हैं। इस वजह से इंसान के अस्तित्व पर दिन-प्रतिदिन खतरा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि जंगलों में गूंजती पक्षियाें की आवाज़ें, नदियों में तैरती मछलियां, खेतों में परागण करती मधुमक्खियां, औषधीय पौधे, समुद्री जीव और अनगिनत सूक्ष्म जीवाणु मिलकर ही धरती को संतुलित बनाते हैं। लेकिन इंसान के लालच के कारण आज धरती की यही जैव विविधता गम्भीर संकट में है। संयुक्त राष्ट्र और वैज्ञानिक संस्थाओं की लगातार आती चेतावनियां बताती हैं कि दुनिया तेज़ी से ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां हज़ारों प्रजातियां हमेशा के लिए समाप्त हो सकती हैं। इसी भयावहता को संबोधित करने के लिए यानी इंसानों का ज़मीर जगाने के लिए हर साल 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है।
याद रखिए, यह दिन कोई औपचारिक आयोजन नहीं है बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य को बचाने का संदेश है। इसलिए इस दिन को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि अगर वाकई धरती में जीवों की विविधता न बची, तो इंसान का अस्तित्व भी संभव नहीं रहेगा। धरती पर इंसानी सभ्यता तब तक कायम रहेगी, जब तक विविध किस्म की वनस्पतियां, अनगिनत किस्म के जीव-जंतु इस धरती पर मौजूद रहेंगे।
दुनिया की 80 फीसदी से ज्यादा ग्रामीण आबादी आज भी अपने प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक औषधियों पर ही निर्भर है और आज भी धरती का तीन चौथाई से ज्यादा कृषि उत्पादन प्राकृतिक ढंग से होने वाले परागण पर ही निर्भर है। इसी तरह समुद्री जैव विविधता न सिर्फ करोड़ों लोगों का सीधे भोजन है, बल्कि करोड़ों अन्य लोगों के लिए रोज़गार भी है। पृथ्वी पर इस तरह की अंतर्निर्भरता के बावजूद आधुनिक विकास मॉडल के कारण सदियों से बनी रहने वाली प्राकृतिक व्यवस्था अब डगमगाने लगी है। जहां तक भारत का सवाल है, तो हमारे लिए जैव विविधता का महत्व कहीं अधिक है? दुनिया का महज 2.4 प्रतिशत भू-भाग रखने वाले हम सदियों से दुनिया की लगभग 8 फीसदी जैव विविधता के मालिक रहे हैं। लेकिन हाल के दशकों में हमारे विकास मॉडल के कारण भविष्य में हमारे हिस्से जैव विविधता की इस थाती का बना रहना बहुत मुश्किल हो गया है।
पूरे भारत में हज़ारों प्रकार की वनस्पतियां और जीव-जंतु पाये जाते हैं। यही वजह है कि भारत दुनिया के 17 मेगा-बायोडायवर्स देशों में शामिल है, लेकिन तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीट के जंगलों का अंधाधुंध खड़ा होना, आंख मूंदकर वनों की कटाई तथा प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन, रासायनिक खेती और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग वे बड़े कारण हैं, जिनके चलते हर गुज़रते दिन हमारी जैव विविधता सम्पदा पर संकट के बादल घने होते जा रहे हैं। गौरैय्या जैसी कभी देश में हर जगह दिखने वाली चिड़िया अब शहरों में मुश्किल से दिखती है। भारतीय गिद्धों की संख्या में लगातार कमी होती जा रही है। मधुमक्खियों की संख्या भी लगातार घट रही है, जिससे कृषि उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है। इसी तरह समुद्री प्रदूषण के कारण कछुओं और डाल्फिनों की संख्या में भारी कमी हो गई है।
जंगल लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं, इस कारण हाथी और बाघ जैसे वन्यजीवों को लगातार सरकारी प्रयास के बावजूद बचाना मुश्किल होता जा रहा है। खासकर इसलिए भी क्योंकि जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास तथा भोजन व पानी की कमी के कारण वन्यजीवों के बीच आपस में संघर्ष बढ़ा है। शीघ्र विकास करने की होड़ ने ऐसी स्थितियां बना दी हैं कि विकास और प्रकृति एक दूसरे के विरुद्ध होकर आमने-सामने खड़े हो गये हैं। इंसान को प्रकृति के अनुरूप ही विकास योजनाएं बनानी होंगी। अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस जैसे आयोजनों के ज़रिये वैज्ञानिक बार-बार यह समझाने और जताने की कोशिश कर रहे हैं कि पृथ्वी पर जैव विविधता को बचाएं। यह दिवस पर पूरी दुनिया में पर्यावरणविद, वैज्ञानिक और हर वह शख्स जो धरती को बनाये रखने के लिए चिंतित है, लगातार हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति कोई बाहरी चीज़ नहीं है बल्कि यह हमारे जीवन की बुनियाद है। अगर हम इस बुनियाद को ही खत्म कर देंगे या खोखला कर देंगे तो भला पृथ्वी और प्रकृति कहां बचेगी? अगर अब भी हम सचेत नहीं हुए, तो हमारा कोई भविष्य नहीं बचेगा, क्योंकि जीवन तभी बचेगा, जब जैव विविधता बचेगी। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया में तकरीबन 10 लाख जीव प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



