ऊर्जा संकट के बीच संरचनात्मक परिवर्तन
अमरीका-ईरान युद्ध में ईरान के हाथ सबसे बड़ा हथियार होर्मुज़ बन गया है। ईरान तेल गैस के जहाज़ों पर नियंत्रण रख रहा है। उसकी इच्छा पर निर्भर करता है कि वह किस देश का जहाज़ निकलने दे या रोक ले। वह मनमाना शुल्क भी वसूल करने का दावा कर रहा है। अमरीका की धमकियों का ज्यादा प्रभाव उस पर नज़र नहीं आ रहा। यह घटना कितने ही देशों के अर्थ-तंत्र को प्रभावित कर रही है। आज जिस दौर में आधुनिक व्यवस्था गतिमान है किसी भी देश के लिए तेल और गैस की उपलब्धता का संकट बड़ा संकट माना जा रहा है।
प्रगति का पहिया इस वजह से थम सकता है, जाम हो सकता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया की इकॉनमी का पुनर्मूल्यांकन ज़रूरी हो गया है, जिसके लिए बहुत से मुल्क तैयार नहीं हैं। दुनिया को फिर से नई आपूर्ति शृंखला का निर्माण करना होगा। होर्मुज़ की नाकाबंदी के ऐसे विकल्प खोजना अनिवार्य हो चुका है। वैश्विक ऊर्जा संकट का यह बड़ा बदलाव है।
अब संयुक्त अरब अमीरात द्वारा ओपेक (आर्गेनाइजेशन एक्सपोर्टिंग कंट्रोल) या ओपेक प्लस से बाहर निकलने का निर्णय एक परिवर्तनकारी निर्णय हो सकता है। यह बदलाव संस्थागत बदलाव तो है ही, वैश्विक तेल राजनीति और आर्थिक शक्ति संतुलन में बड़ा कदम साबित हो सकता है। इसके लिए समय भी काफी मुनासिब है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब ऊर्जा बाज़ार पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव, बदलते आर्थिक दौर और आपूर्ति बाधाओं के संकट के रू-ब-रू है। और तो और भारत के गैस अथवा तेल लेने गये जहाज़ पर भी गोलीबारी हुई है, जिसकी तीव्र प्रतिक्रिया ईरान को दी जा चुकी है। भारत ने कभी एक-पक्षीय राजनीति नहीं की। अमरीका, इज़रायल से संबंध खराब नहीं किये तो ईरान से भी रिश्ता बनाये रखा है।
ओपेक की स्थापना 1960 में इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य था तेल उत्पादक देशों के बीच समन्वय स्थापित करना और वैश्विक कीमतों को स्थिर रखना। धीरे-धीरे इस संगठन में 13 देश आ गए और संगठन को प्रभावशाली रूतबा मिला। संगठन में सऊदी अरब की भूमिका काफी प्रभावशाली रही है। ऐसे वातावरण में यू.ए.ई. का बाहर निकलना एकबारगी हैरान तो करता है, लेकिन संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी देता है। इससे साफ संकेत है कि ऊर्जा बाज़ार धीरे-धीरे कंट्रोल आधारित नियंत्रण से मुक्ति पाकर मुक्त बाज़ार की तरफ कदम बढ़ा रहा है। डॉलर आधारित तेल व्यापार को भी चैलेंज मिल सकता है। यू.ए.ई. उत्पादन स्वतंत्रता और क्षमता का पूर्ण इस्तेमाल करना चाहता है जिसे ओपेक प्लस ने सीमाओं में बांध रखा था। हो सकता है सऊदी अरब के साथ नीति संबंधी मतभेद या तनाव मुख्य कारण रहे हों।
होर्मुज़ में जारी तनाव से यह तो साफ हो गया कि ऊर्जा आपूर्ति केवल आर्थिक पक्ष का नहीं है, सामरिक पक्ष का भी है। यू.ए.ई. के इस कदम से वैश्विक सप्लाई चेन पर प्रभाव पड़ेगा। ओपेक की सामूहिक शक्ति कमज़ोर होगी। यू.ए.ई. अब उत्पादन बढ़ा सकता है जिससे बाज़ार प्रभावित होगा। कुछ समय के लिए कीमतें ऊंची रह सकती हैं, लेकिन लम्बे समय में कीमतें नीचे आने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
भारत के संदर्भ में मिश्रित प्रभाव देखा जा सकता है यदि उत्पादन बढ़ता है तो भारत को सस्ता तेल मिलेगा जिसका वित्तीय ढांचे पर सकारात्मक प्रभाव होगा। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और मार्ग बाधा ऊर्जा सुरक्षा में चुनौती भी पैदा कर सकती है, लेकिन यह रणनीतिक अवसर भी है। भारत-य.ए.ई. के बीच ऊर्जा सहयोग जैसा विकल्प अधिक व्यवहारिक हो सकता है।



