बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया

मनुष्य की उत्पत्ति से लेकर अनेक सदियों के उसके लम्बे स़फर के साथ-साथ विकास और विनाश की वार्ता चलती रही है, जो आज भी जारी है। प्रारम्भ से ही मनुष्य के गीत और लड़ाई-झगड़े साथ-साथ चलते रहे हैं। इस स़फर में धरती पर बहुत कुछ आश्चर्यजनक  निर्माण किया गया है तथा प्राकृति और अप्राकृतिक घटनाओं के कारण ज्यादातर का विनाश भी होता रहा है। समय-समय पर ज्यादातर बहुत सी सभ्यताओं ने जन्म लिया परन्तु उनमें आपसी लड़ाई-झगड़ों में ज्यादातर सभी सभ्यताओं को विनाश का मुंह भी देखना पड़ा। इसी कारण सैकड़ों वर्ष से अनुसंधानकर्ता पुरातन खण्डहरों से सदियों पहले धड़कते जीवन और निर्माण के चिन्ह ढूंढते रहे हैं।
आज मनुष्य के दिमाग ने अपनी धरती और समुद्र तक ही सीमित न रह कर ब्रह्मांड के रहस्य खोलने तक अपना कार्य क्षेत्र बढ़ा लिया है। इस अनुसंधान में उसकी उपलब्धियों को जादुई उपलब्धियां कहा जा सकता है। मनुष्य के पांव चांद पर पड़ चुके हैं और सितारों तक की तलाश जारी है और आकाश से ही अनेकानेक अनुसंधानों से मनुष्य ने धरती पर जीवन को और बेहतर बनाने के लिए अनेक ऐसे अनुसंधान कर लिए हैं जो धरती पर रहते मनुष्य के लिए बड़ी उपलब्धियां बनी दिखाई देती हैं, परन्तु बहुत दुख की बात यह भी है कि इतिहास में अनेकानेक अत्याचारियों ने धरती को नष्ट करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। लाखों, करोड़ों मनुष्य उनके अहंकार, जुल्म और हिंसक मानसिकता के शिकार हो गए। आज धरती पर बहुत कुछ बनाया जा चुका है, परन्तु इसके साथ-साथ ही यदि सिर्फ पिछली दो सदियों को ही देखा जाए तो लगातार घटित होते कहर से समूची धरती रक्त-रंजित हुई भी दिखाई देती है। इन दो सदियों में ही करोड़ों मनुष्य सहकते चले गए। आज की बात करें तो अनेक देशों में जिस तरह आपसी लड़ाइयां हो रही हैं, वे किसी कहर से कम नहीं प्रतीत होतीं। इस दौड़ में मुख्य रूप से वे देश शामिल हैं, जिन्होंने विकास के बड़े पड़ाव तय किए हैं और वे अपने लोगों को प्रत्येक तरह का अच्छा जीवन प्रदान करने में सफल रहे हैं, परन्तु ऐसे देश आज आपसी टकराव या अपना दबदबा बनाए रखने की विनाशकारी योजनाएं भी बना रहे हैं। पिछले वर्ष 2025 की वार्ता भी दिल दहला देने वाली है। स्टॉकहोम अन्तर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्था ने विगत दिवस विश्व में हथियारों की दौड़ संबंधी आंकड़े एकत्रित किए हैं, जो इस धरती पर मनुष्य के विनाश की गवाही देते हैं। 
हथियारों के उत्पादन की इस दौड़ में अमरीका सबसे आगे है, जिसने विगत वर्ष इस मद पर 954 बिलियन डॉलर (92,34,720 करोड़ रुपये) खर्च किए हैं। चीन ने भी लगभग साढ़े सात दशकों में बहुत विकास किया है परन्तु हथियारों के निर्माण क्षेत्र में भी वह विश्व भर में दूसरे स्थान पर रहा है। विगत वर्ष इसने रक्षा क्षेत्र पर 336 बिलियन डॉलर (32,52,480 करोड़ रुपये) खर्च किए हैं। रूस जो वर्ष 2022 से यूक्रेन के साथ विनाशकारी युद्ध में उलझा हुआ है, ने विगत वर्ष 190 बिलियन डॉलर (18,39,200 करोड़ रुपये) हथियारों पर खर्च किए हैं। चौथे स्थान पर जर्मनी आता है जो द्वितीय विश्व युद्ध में एक पक्ष का अग्रणी था, जहां हिटलर जैसे तानाशाह ने विश्व भर को चुनौती देकर भारी विनाश किया था। उसकी ओर से भी 114 बिलियन डॉलर (11,03,520 करोड़ रुपये) हथियारों पर खर्च किए गए हैं। भारत पांचवें स्थान पर है जिसने इस दौड़ में विगत वर्ष 92 बिलियन डॉलर (8,90,560 करोड़ रुपये) के लगभग हथियारों पर खर्च किए हैं। इसके बाद विश्व भर के देशों में हथियार प्राप्ति के रुझान हेतु लम्बी कतार लगी दिखाई देती है।
इसके साथ-साथ ही समय-समय पर कुछ ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी अस्तित्व में आई हैं, जिन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के देशों को एक मंच प्रदान किया और उन्हें आपस में जोड़ने के लिए और युद्ध को खत्म करने के लिए यत्न किए परन्तु आज वे सभी संस्थाएं मनुष्य की हवस और हिंसक रुचियों के सामने बेबस हुई दिखाई देती हैं। नि:संदेह आज निर्माण से कहीं अधिक विनाश के स्रोत बने दिखाई देते हैं, जो इस धरती पर कुछ समय में ही मानवता का विनाश करने में समर्थ हैं। ऐसे पड़ाव पर पहुंच कर अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर किसी ऐसी भावनात्मक और प्रभावशाली संस्था की ज़रूरत महसूस होती है, जो तप रही इस धरती को कुछ शीतलता पहुंचाने में समर्थ हो सके।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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