अधिक मुनाफे के लिए पर्यटकों की जान को जोखिम में न डाला जाए

जम्मू-कश्मीर के पर्यटन को गुलमर्ग के गोंडोला केबल कार हादसे ने पिछले दिनों एक झटका दे दिया। यह हादसा उस समय हुआ जब केबल कार पूरी क्षमता से दोगुनी अधिक भीड़ के साथ वर्षा के बीच जारी थी। इस दौरान तकनीकी खराबी के कारण केबल कार बीच में ही रुक गई। इस घटना ने सात घंटे तक पर्यटकों की जान को जोखिम में डाले रखा। 
पहले भी यहां पर हादसे हुए हैं और लोगों की जानें गई हैं, इसके बाद भी पर्यटकों को सुरक्षित यात्रा मिले इस पर संभवत: कम ही काम हुआ है। यदि ज़रा भी ध्यान दिया होता तो शायद पर्यटन से आमदनी के लिए पर्यटकों को खतरों का खिलाड़ी जैसा नहीं बनाया होता। इस बात पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है कि जम्मू-कश्मीर देश के अति संवेदनशील राज्यों में पहले तीन राज्यों में आता है और यहां पर सेना हमेशा सुरक्षा के लिए तत्पर रहती है। हादसे के समय सेना इसी कारण से तुरंत पहुंच गई, अन्यथा स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 
गोंडोला इस वक्त पूरे देश में पर्यटक सुविधा में प्राथमिकता में है। खासकर उन स्थानों पर जहां पर पर्यटकों की भीड़ रहती है। कश्मीर में गुलमर्ग में एक दिन में आठ हज़ार तक पर्यटक इसका लाभ लेते हैं, तो औली में लगभग पांच सौ, उदयपुर में पांच हज़ार, मसूरी में 1500 के आसपास, नैनीताल में 1300 से अधिक, शिमला के जाखू में प्रतिघंटा एक हज़ार, दार्जिलिंग में पांच सौ पर्यटक इनमें बैठकर हवा में उड़ने का आनंद महसूस करते हैं। इसके अतिरिक्त देश के दूसरे हिस्सों में भी अन्य केबल कार में पर्यटक आते-जाते हैं, लेकिन हादसे की सबसे अधिक शिकायतें गुलमर्ग से ही आती हैं। यहां पर अब तक तीन से चार बार इस तरह की शिकायतें सामने आयी हैं, लेकिन एक बात यह है कि सर्वाधिक रोमांच भी यहीं पर आता है। औली में तो सीज़न में ही इसका आनंद है, वहां पर कोरोना जैसी आपदाओं के समय बंद करने की बात ज़रूर सामने आयी है, पर इतनी बड़ी दुर्घटना अभी तक सामने नहीं आयी। 
उत्तराखंड में रोपवे की जितनी योजनाएं हैं, उतनी पूरे भारत में और कहीं नहीं हैं। केदारनाथ यात्रा को सुगम करने के लिए लगभग 13 किलीमीटर लंबी योजना चार हज़ार करोड़ की है। हेमकुंड साहिब में जो रोपवे बनेगा वह तीन हज़ार करोड़ की लागत का है। काठगोदाम से नैनीताल-कैंचीधाम के लिए रोपवे योजना है, देहरादून से मसूरी के लिए भी रोपवे बनाए जाने की योजना है। बर्नाला द्वारा बुग्याल तक रोपवे, कार्तिक स्वामी मंदिर तक भी रोपवे बनेगा। इसके अतिरिक्त नैनीताल-मसूरी, औली में रोपवे पहले ही से चल रहे हैं। सरकारी घोषणा के आधार पर करीब पचास से अधिक रोपवे की योजनाएं यहां हैं। माता पूर्णागिरी में बनने वाला रोपवे अब पूरी रफ्तार से बन रहा है। इसके दो तीन वर्षों में संचालन में आने की उम्मीद है। राजस्थान में जयपुर में रोपवे के लिए लंबे समय से लड़ाई है। यहां के गढ़ गणेश मंदिर के लिए इसकी मांग चल रही है और सामोद में जो बना हुआ है, वह विवादस्पद हो चुका है। कम चढ़ाई वाले खोले के हनुमान जी में तो रोपवे बना दिया गया है। इसी तरह से उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में भी रोपवे की योजनाएं हैं। बाबा केदारनाथ में जो रोपवे अर्थात केबल कार प्रोजेक्ट है, जब वह पूरा हो जाएगा तो देश का सबसे अधिक यात्रियों वाला बन जाएगा। बताया जाता है इसकी क्षमता प्रतिदिन 20 हज़ार तक हो सकती है। 
अब यहां पर इस बात पर ध्यान देना होगा कि सुविधाएं तो मिल रही हैं और इनसे पर्यटन आय भी बढ़ रही है, परन्तु क्या ये केबल कार योजनाएं वास्तव में हमारी ज़रूरत हैं? क्या ये पूरी तरह सुरक्षित सफर देने में सफल हैं? कश्मीर के गुलमर्ग में भले ही 24 मई को कोई घायल भी नहीं, हुआ पर जिस तरह से बारिश और खतरों के बीच आपरेशन चला वह यह बताने के लिए काफी है कि केबल कार योजनाओं के खतरों के देखते हुए ही अब अमली जामा पहनाया जाए?  केदारानाथ को देखिए। यहां पर जो केबल कार चलेगी वह न सिर्फ  जंगलों के उपर से निकलेगी, बल्कि उसके रास्ते में वह पहाड़ भी होंगे जो नदियों के पानी से कभी भी तर हो जाते हैं, वह जंगल होगा जहां पर जंगली वन्य जीवों का आना-जाना लगा रहता है। इससे अधिक बात यह कि यहां पर राहत हेतु एजेंसियां उतनी तेज़ी से मदद नहीं कर सकतीं, जितनी तेज़ी से दूसरे स्थानों पर। 
अगर यहां के केबल कार प्रोजेक्ट में सुरक्षा की चूक को दूसरे केबल कार हादसे की तरह नहीं देखा गया तो यह गुलमर्ग से सौ गुना भयावह हो सकता है और तब जब वर्ष 2013 जैसी आपदा इस क्षेत्र में आ चुकी है, बर्फ के पानी से बनी झीलें कभी भी केबल कार के आधार के लिए खतरनाक हो सकती हैं। दरअसल केबल कार योजना का मंतव्य यह होता है कि यह दुर्गम पहाड़ी वाले क्षेत्रों में सुगम यात्रा करा सके, सड़क मार्ग का बोझ कम करें, पर्यटकों को जल्दी पहुंचाने के साथ ही आनंददायक सफर उपलब्ध हो, परन्तु इसके साथ कितने खतरे होते हैं, यह उन हादसों से समझा जा सकता है जिनमें पेड़ टूटने से जान चली गई, ट्राली तार टूटने से हवा में लटक गई, केबल कार पिलर का आधार कमज़ोर हो गया, जैसे मामले सामने आए हैं। शायद इसीलिए कहा जाने लगा है कि केबल कार की सवारी अब पर्यटकों को खतरों का खिलाड़ी का एहसास करा रही हैं। 
देश में इस समय 250 से अधिक केबल कार योजनाएं हैं। इसमें कई शहरों में यातायात के लिए भी इन्हें लाए जाने की संभावना है और जहां पर यह शहरों में लाई जाएंगी वहां पर ट्रैफिक की गति इतनी तेज़ रहती है कि एक वाहन के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद गाड़ियों की लाइन लग जाती है। यहां पर समझना यह होगा कि केबल कार प्रोजेक्ट कहीं के लिए भी हो, परन्तु वह पूरी तरह सुरक्षित होना चाहिए। अब जब गुलमर्ग हादसे को देखते हुए समझदारी इसी में है कि ज़ीरो टालरेंस नीति का भी पालन यहां पर किया जाए।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 
 

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