कर्नाटक में बदलाव
आखिरकार दक्षिण राज्य कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया द्वारा तीन वर्ष की अवधि के बाद अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया गया। मई 2023 में हुए चुनाव में यहां कांग्रेस को जीत प्राप्त हुई थी। राज्य की 224 विधानसभा सीटों में से पार्टी को 135 सीटें मिली थीं। उस समय सिद्धारमैया और डी.के. शिव कुमार प्रदेश में पार्टी के वरिष्ठ नेता थे। शिव कुमार प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष थे। उनके बारे में यह प्रभाव बना था कि उन्होंने अपनी अच्छी योजना और कड़ी मेहनत से पार्टी को जीत दिलाई थी। दूसरी ओर सिद्धारमैया को परिपक्व नेता माना जाता है, जिनका पिछड़े वर्गों, अल्प-संख्यकों और दलितों में बड़ा प्रभाव है। उस समय बड़ी कशमकश के बाद हाईकमान ने सिद्धारमैया का मुख्यमंत्री और शिव कुमार का उप-मुख्यमंत्री के लिए चयन किया था।
चाहे लिखित तौर पर नहीं परन्तु यह माना जाता रहा है कि दोनों नेताओं में यह फैसला करवाया गया था कि उनकी उच्च कुर्सी की पारी अढ़ाई-अढ़ाई वर्ष की होगी। आधा समय व्यतीत हो जाने के बाद दोनों ही पक्षों में खींचतान बढ़ गई थी और इसके साथ ही उन दोनों के दिल्ली के चक्कर भी तेज़ हो गए थे। हाईकमान इस मामले पर दुविधा वाली स्थिति में फंसी हुई दिखाई देती थी और आपसी गुटबंदी की बढ़ती इस कशमकश ने कांग्रेसी नेताओं को चिंता में डाल दिया था। उस समय कर्नाटक में चुनाव के दौरान एक-दूसरे से बाज़ी मारने की दौड़ के कारण कांग्रेस ने भी मुफ्त सुविधाएं देने के वायदे किए थे, जिन पर क्रियान्वयन करते हुए आज यह राज्य भी बड़े आर्थिक बोझ में फंसा दिखाई दे रहा है। इसका मूलभूत ढांचा भी चरमरा रहा है, जिस कारण लोगों में बेचैनी भी बढ़ने लगी है। देश में कांग्रेस के पास कुछ चुनिंदा ही राजनीतिक किले शेष रह गए हैं। उनमें भी मज़बूत दीवारें गिरती हुई दिखाई दे रही हैं। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी पार्टी के भीतर गुटबाज़ी के लगातार बढ़ने से ये किले ध्वस्त हो गए थे। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट का छत्तीस का आंकड़ा बना रहा, जिसने सरकार की नींव हिला कर रख दी थी। यही स्थिति छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव के बीच देखा गया था, जो आखिरकार सरकार और पार्टी के लिए घाटे वाला सिद्ध हुआ। इससे पहले पंजाब में भी ऐसा ही कुछ ही घटित हुआ था और हरियाणा में भी पार्टी की आंतरिक गुटबंदी ने पार्टी की नाव को किनारे पर नहीं लगने दिया था। ऐसा ही नाटक कर्नाटक में खेला जाता रहा है। वहां वोकालिंगा और लंगायत दो मज़बूत समुदाय हैं, जो वहां की राजनीति पर भारी हैं।
ऐसी स्थिति में सरकार में सही तालमेल लाना बेहद कठिन था। अब तीन वर्ष बाद सिद्धारमैया से त्याग-पत्र लेने से शिव कुमार के मुख्यमंत्री बनने का मार्ग ज़रूर प्रशस्त हो गया है परन्तु जिस तरह का रवैया सिद्धारमैया ने अपनाया हुआ है, उससे सब अच्छी प्रतीत नहीं होता। आगामी समय में यदि कर्नाटक में पार्टी की आंतरिक कशमकश को नकेल न डाली गई तो यह मज़बूत किला भी ध्वस्त हो सकता है। कांग्रेस नेतृत्व को देश भर में स्थान-स्थान पर उठते आंतरिक टकराव संबंधी प्रभावी और स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत होगी, नहीं तो आगामी समय राजनीतिक मंच पर उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही सिद्ध होगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

