बुंदेलखंड की जीवनरेखा है केन नदी

विशेषज्ञों के मुताबिक केन नदी उत्तर भारत की उन दुर्लभ नदियों में से है, जहां अभी भी सापेक्षतया प्राकृतिक नदी इकोसिस्टम काफी हद तक बचा हुआ है। यही कारण है कि इसे केवल जल संसाधन नहीं बल्कि इकोलॉजिकल एसेट माना जाता है। वास्तव में केन नदी मध्य प्रदेश के कटनी ज़िला स्थित अहिरगंवा क्षेत्र से निकलती है और 427 किलोमीटर का सफर तय करके उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िला स्थित चिल्ला कस्बा के पास यमुना नदी में मिल जाती है। इसका प्रवाह क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्यत: चार ज़िलों में फैला है- मध्य प्रदेश के कटनी, पन्ना, छतरपुर और उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में। केन नदी का कुल कैचमेंट एरिया लगभग 28,000 से 29,000 वर्ग किलोमीटर का है, जो कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। इसके कैचमेंट क्षेत्र की मुख्य विशेषता विंध्य पठार की चट्टानी संरचना, गहरी घाटियां, कम वर्षा वाला अर्द्धशुष्क क्षेत्र और मौसमी नालों के योगदान से बनता है। केन बेसिन में वर्षा का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर करता है। इस कारण केन नदी का प्रवाह अत्यधिक मौसमी है। इसमें औसत वार्षिक जल उपलब्धता 6000 से 6500 मिलियन क्यूबिक मीटर है। वर्षा ऋतु में केन में तेज बहाव होता है और गर्मियाें के समय कई क्षेत्रों में इसके जलस्तर में बेहद कमी देखी जाती है। फिर भी बुंदेलखंड की दूसरी नदियों की तुलना में केन अपेक्षाकृत बेहतर पेरिनियल फ्लो यानी सालभर बहाव वाली नदी है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाें में सोनार, बियरमा, कोपरा तथा उर्मिल हैं। 
केन नदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ऐसे उत्तर भारत की गिनी चुनी नदियों में से एक है, जो आज भी बहुत साफ है। शायद इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि क्षेत्र से होकर बहती है, जहां भारी औद्योगिक प्रदूषण नहीं है। इसके किनारे बड़े शहर भी नहीं है और नदी का बड़ा हिस्सा घने जंगलों से बीच से होकर गुजरता है, जिस कारण केन नदी न केवल साफ है बल्कि अध्ययन बताते हैं कि इसमें उच्च स्तर पर ऑक्सीजन मौजूद है। इस कारण इसमें भरपूर जलीय जीव पाये जाते हैं। केन नदी में घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुओं की बड़ी और महत्वपूर्ण आबादी है। केन घड़ियाल अभ्यारण्य इसी उद्देश्य से यहां स्थापित किया गया है। केन में कई देसी प्रजाति की मछलियां भी पायी जाती हैं जैसे- रोहू, कतरा, मृगल और कई क्षेत्रों में महसीर, जो स्थानीय लोगों की अजीविका और जल पारिस्थितिकी दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व की पूरी पारिस्थितिकी केन नदी पर ही काफी हद तक निर्भर है। यह नदी इस रिजर्व के बाघों, तेंदुओं, हिरणों, गिद्धों और अनेक पक्षियों को जल उपलब्ध कराती है। केन घाटी की चट्टानें लुप्तप्राय गिद्धों के लिए भी प्रसिद्ध है और इसकी सबसे अनोखी विशेषताओं में इसका चट्टानी भू-दृश्य शामिल है। रानेह फॉल्स क्षेत्र में नदी ने ज्वालामुखी व ग्रेनाइट चट्टानों को काटकर गहरी घाटियां बनायी हैं, इस कारण ये भारत के सबसे सुंदर रिवर केन्यन में गिना जाता है। 
हालांकि वक्त के साथ केन नदी कई तरह की पर्यावरणीय चुनौतियों से भी जूझ रही है। अवैध रेत खनन, जलवायु परिवर्तन, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, कम वर्षा तथा नदी जोड़ो परियोजना के प्रभाव के कारण इसे कई तरह की पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक परियोजना का प्रभाव इस नदी पर कई तरह से देखा और अनुमान लगाया जा रहा है। जहां इसके पक्षधर इसे सिंचाई, पेयजल, बुंदेलखंड के विकास के लिए ज़रूरी बताते हैं, वहीं इसके विरोधी पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए इसे बहुत बड़ा खतरा बताते हैं, क्योंकि इस जोड़ के बाद पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा क्षेत्र, डूब क्षेत्र में आ जायेगा। साथ ही विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना से केन की जलीय जैवविविधता तथा इसके प्राकृतिक बहाव में असर पड़ेगा। बहरहाल केन नदी की पहचान सिर्फ इसकी भौगोलिक उपस्थिति भर से नहीं है बल्कि यह बुंदेलखंड की सांस्कृतिक स्मृति, लोकजीवन और धार्मिक चेतना का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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