पाक-अधिकृत कश्मीर की गड़बड़
आज पाकिस्तान के कब्ज़े वाले पाक-अधिकृत कश्मीर में वर्षों से सुलगती आग लपटें बनती जा रही हैं। इस भाग में लगभग 45 लाख कश्मीरी बसे हुए हैं, जिनमें से ज्यादातर वर्षों से समस्याओं भरा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। चाहे वहां चुनाव होते हैं परन्तु इनमें ज्यादातर सभी बाहरी लोग ही चुने जाते, क्योंकि उनके लिए 12 सीटें आरक्षित रखी हुई हैं। पाकिस्तान के अन्य भागों की भांति यहां भी सेना का पूरा दबदबा है। भारत के विरुद्ध शुरू की लड़ाई में पाक-अधिकृत कश्मीर में आतंकवादियों के बनाए गए अनेक केन्द्रों द्वारा ही प्रशिक्षित आतंकी भेज कर भारत को रक्त-रंजित किया जाता है। यह सिलसिला दशकों से जारी है। दशकों से ही व्यापक स्तर पर यहां के लोगों का शोषण जारी है। समय-समय पर उनकी ओर से उठाई जाती मांगों को अनदेखा कर दिया जाता है।
पिछले वर्ष अक्तूबर, 2025 में लोगों द्वारा उठी ब़गावत के दृष्टिगत मुज़फ्फराबाद समझौता किया गया था, परन्तु बाद में उसे अनदेखा कर दिया गया। इसके विरोध में इसी 9 जून को लाखों ही लोगों ने ‘लॉंग मार्च’ निकाला, जिसे दबाने के लिए वहां की पुलिस और सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की, जिसमें दर्जनों ही लोग मारे गए, सैकड़ों ही रक्त-रंजित हुए और हज़ारों ही नज़रबंद किए गए हैं। अब वहां प्रशासन द्वारा प्रत्येक तरह का संचार बंद कर दिया गया है। असन्तुष्ट लोगों द्वारा संयुक्त आर्मी एक्शन कमेटी (जे.ई.ई.सी.) भी बनाई गई है, जो एक तरह से ब़गावत पर उतरी हुई है। इसी महीने 5 जून को सुरक्षा बलों ने रावलकोट में इस संगठन के नेता शाहज़ेब हबीब की गोलियां मारकर हत्या कर दी थी, जिसके उपरांत लोग अब गलियों, बाज़ारों में उतरे हुए हैं। संयुक्त एक्शन कमेटी द्वारा लम्बे समय से अपनी 38 मांगों को लेकर प्रत्येक तरह से संघर्ष किया जाता रहा है। इनमें से तीन मांगों के साथ ही वहां पैदा हुए हालात संबंधी पता चलता है। एक मांग यह है बिजली और आटा रियायती मूल्यों पर दिया जाए, दूसरी पाकिस्तानी नौकरशाहों और उनके बिचौलियों को दिए जाते लग्ज़री भत्ते बंद किए जाएं और तीसरी वहां की विधानसभा में जो नॉन-रैज़ीडैंट (बाहरी लोगों) के लिए 12 सीटें आरक्षित रखी हुई हैं, उन्हें खत्म किया जाए। दशकों से मानवाधिकारों से वंचित, आर्थिक तंगी से जूझ रहे और राजनीतिक अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे इन संगठनों पर बार-बार कड़ा सरकारी दबाव बनाया जाता रहा है। पाक-अधिकृत कश्मीर में हालात ऐसे दयनीय हैं, परन्तु पाकिस्तान भारत से कश्मीर को हासिल करने के लिए शुरू से ही यत्न करता आया है और इसी कारण कई बार भारत से युद्ध में उलझा रहा है।
पहला युद्ध 1947 में हुआ था जब कबायली पठानों ने पाकिस्तानी सेना की सहायता से कश्मीर को हथियाने के लिए हमला किया था। तत्कालीन महाराजा हरी सिंह इसे स्वतंत्र राज्य ही रखना चाहते थे, परन्तु पाकिस्तानी हमले के बाद उन्होंने भारत को सहायता के लिए गुहार लगाई थी। भारतीय सैनिकों ने न सिर्फ इस हमले को रोक दिया था, अपितु यह भी घोषणा की थी कि वह पाकिस्तान द्वारा कब्ज़े में लिए गए कश्मीर को भी आज़ाद करवाएंगे परन्तु उस समय के कई वरिष्ठ भारतीय नेताओं ने आखिरी वायसराय माऊंट बैटन के प्रभाव में कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र को 1 जनवरी, 1948 को सौंप दिया था। उस समय अमरीका भी इस साजिश में शामिल था। इस मामले पर ब्रिटेन और अमरीका पाकिस्तान की सहायता करते रहे जबकि सोवियत यूनियन ने उस समय भी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहा था। पाकिस्तान की हालत आज यह है कि चाहे उसके सैन्य प्रमुख मुनीर अमरीका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करवाने के लिए शांति दूत बने दिखाई देते हैं परन्तु उनके अपने देश में स्थान-स्थान पर ऐसी लपटें उठ रही हैं, जिनके शीघ्र थमने की उम्मीद नहीं है। बलोचिस्तान में भी लगातार हिंसा का दौर जारी है। खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी तालिबान ने उसकी नाक में दम किया हुआ है। सीमावर्ती मामले पर वह अ़फगानिस्तान के साथ एक तरह से युद्ध लड़ता दिखाई दे रहा है।
ज्यादातर स्थानों पर उसके अपने पोषित आतंकवादी संगठन उसके लिए ़खतरा बने दिखाई देते हैं, परन्तु इसके बावजूद वह भारत के साथ उलझा रहा है। नए समाचारों के अनुसार पाक-अधिकृत कश्मीर में सीमा के निकट उसने 70 आतंकी लांच पैड पुन: तैयार कर लिए हैं, जहां वह सैकड़ों ही आतंकवादियों को भारत के भीतर घुसपैठ करने के लिए तैयार करके बैठा है। गत वर्ष हुए पहलगाम के खूनी घटनाक्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि पाकिस्तान अपने इन नापाक इरादों से पीछे हटने वाला नहीं है, चाहे उसके अपने अंदर स्थान-स्थान पर हिंसा का दौर जारी है और वह अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर भिखारी बना दिखाई देता है। अपने देश के भीतर राजनीतिक रूप से बेहद उलझन वाले हालात बने होने के बावजूद वह भारत के प्रति अपने इरादों को बदलने के लिए तैयार प्रतीत नहीं होता, परन्तु अब पाक-अधिकृत कश्मीर में पैदा हुई अशांति शीघ्र नियंत्रण में आने वाली नहीं है। इसीलिए ही अब इसकी ओर विश्व भर की नज़रें केन्द्रित होनी शुरू हो गई हैं।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

