दल-बदल का बढ़ता रुझान लोकतंत्र के लिए हानिकारक
सांसदों का लगातार दल बदलना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता। मतदाता किसी नेता को नहीं बल्कि अक्सर पार्टी की विचारधारा और नेतृत्व को ध्यान में रखकर वोट देता है। इसलिए जनादेश का सम्मान करते हुए राजनीतिक दलों और जन-प्रतिनिधियों दोनों को अपने आचरण में अधिक जवाबदेही दिखानी होगी। यही लोकतांत्रिक मर्यादा की मांग है। भारतीय राजनीति में दल-बदल और राजनीतिक पुनर्संरेखण कोई नई बात नहीं है लेकिन जब किसी दल के सांसद बड़ी संख्या में पार्टी छोड़ने लगें तो यह केवल संगठनात्मक संकट नहीं बल्कि नेतृत्व और राजनीतिक दिशा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद उसके बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में सांसदों के विद्रोह और अब शिवसेना (उद्धव गुट) के कई सांसदों के संभावित पलायन की खबरों ने विपक्षी राजनीति में हलचल पैदा कर दी है।
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) पहले ही 2022 के विभाजन के बाद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अब ऑपरेशन टाइगर के तहत सात सांसदों के शिंदे गुट में जाने की अटकलें लग रही हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व इन खबरों का खंडन कर रहा है, लेकिन जिस प्रकार उद्धव ठाकरे को अपने सांसदों और विधायकों की बैठक बुलानी पड़ी, उससे संकट की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। दूसरी ओर टीएमसी में भी बड़ी टूट की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के अनुसार पार्टी के कई सांसदों ने अलग राजनीतिक रास्ता चुनने की कोशिश की है जिससे ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती मिली है। इन घटनाओं के राजनीतिक मायने दूरगामी हैं। पहला, यह विपक्षी दलों में नेतृत्व के प्रति बढ़ती असंतुष्टि को दर्शाता है। दूसरा, इससे सत्तापक्ष की राजनीतिक शक्ति और मजबूत हो सकती है क्योंकि विपक्ष का संख्याबल और मनोबल दोनों प्रभावित होते हैं। तीसरा, इससे मतदाताओं के बीच यह संदेश जाता है कि कई क्षेत्रीय दल वैचारिक प्रतिबद्धता की बजाय राजनीतिक अवसरवाद के दौर से गुजर रहे हैं।
लोकतंत्र में दल-बदल विरोधी कानून मौजूद है, लेकिन राजनीतिक दल अक्सर उसके कानूनी प्रावधानों के भीतर रहकर नए समीकरण बना लेते हैं। यही कारण है कि सांसदों और विधायकों के समूहगत स्थानांतरण का सिलसिला रुकता नहीं दिखता। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह केवल कुछ नेताओं की महत्वाकांक्षा का परिणाम है या फिर विपक्षी दलों के भीतर गहरे संगठनात्मक संकट का संकेत? यदि टीएमसी और शिवसेना जैसी पार्टियां अपने जन-प्रतिनिधियों को साथ रखने में कठिनाई महसूस कर रही हैं, तो उन्हें आत्ममंथन करना होगा। केवल भाजपा या एनडीए पर आरोप लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। दलों को अपने संगठन, नेतृत्व शैली और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद को मज़बूत करना होगा।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? यह सोचने वाला प्रश्न है। आज सत्ता की मलाई के लिए जिस दल से चुनाव लड़ा बरसो जिससे पहचान बनी, आज उसी दल के लिए बेवफा होना समझ से परे नहीं। अगर पार्टी से संतुष्ट नहीं हैं तो अपने पद से इस्तीफा देकर जिस दल में जाना चाहते हैं, उसकी ओर से चुनाव लडऩा चाहिए, लेकिन आज जैसा कि विपक्ष आरोप लगा रहा है कि सांसदों को सत्ता पक्ष अपनी तरफ इसलिए कर रहा है कि उसे मानसून सत्र में संसद बिल पास कराने हैं। चलो मान लिया कि सत्ता पक्ष ऐसा कर रहा है तो क्या दल की विश्वनीयता पर तो प्रश्न चिन्ह नहीं लगना चाहिए। खैर देखना होगा कि अभी कितनी पार्टियों के सांसदों का मन मलाई के उत्सुक है।
(युवराज फीचर्स)



