उनकी नाराज़गी  नाराज़गी, हमारी नाराज़गी असफलता की औकात

अचानक महफिल में उनकी नाराज़गी की बात चलने लगी। पिछले कई दिन से उनकी बात नहीं हो रही थी, पूछ-पड़ताल भी नहीं हो रही थी। हमने सोचा शायद किसी ऊंची दर्जे की साधना में लीन हो गए हैं या यह भी हो सकता है कि वह फिर खट्टी डकारों के  मज़र् से गिरफ्तार हो गए हों, और अब कोई भी चूर्ण उन पर काम नहीं कर रहा। आदमी जब सेहतयाब न हो, तो लगता है, पूरी दुनिया ही उनके खिलाफ षडयन्त्र कर रही है। वह जो महामना है, लासानी है, समाज की मुकुटमणि है। आपकी इतनी जुर्रत कि आपने उनके सामने गिड़गिड़ाने की बजाय अलग राह पकड़ने का फैसला कर लिया। दुनिया के इस गोरख धंधे से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। अलग रास्ता अपना लिया तो क्या?
रोम में तो वैसे ही करना पड़ेगा, जैसे हर रोमन करता है। चोरों की बारात में साधुओं को दाखिला नहीं मिल सकता। काजल की कोठरी से जो भी निकलेगा काला होकर ही निकलेगा। कैसे समझ लिया कि आप सफेद शफ्फाक बन निकल जाएंगे। आपकी बज़्म बहुत बड़ी है जनाब। बड़े-बड़े प्रासाद उसके सामने सिर झुकाते हैं। आप इस बज़्म से परीशां हो कर नहीं निकले, तो ज़रूर आपने किसी अन्दरूनी स्तर पर उनके साथ समझौता कर लिया होगा। नहीं तो हुज़ूर यहां तो यही चलन है कि जो भी तेरी बज़्म से निकला परीशां निकला, लेकिन बात तो यूं निकली थी कि जहांपनाह हमसे नाराज़ हो गये, और हमें पता नहीं चला। हम तो यही सोचते रह गये कि जहांपनाह की कहीं तबीयत नासाज़ ही न हो गई हो, और हमारी इस आशंका को ज़ुर्रत मान लिया गया। हमारी तबीयत का क्यों पूछते हो, ‘तबीयत तेरी खराब हो नासपीटे। हमने तो जबसे चोर गलियों का रास्ता पकड़ा है, हमारी तो पांचों उंगलियां घी में हैं, और सिर भी कड़ाही में नहीं गया। ’
हमारा सिर क्यों कड़ाही में हो? इस गुस्ताख सोच के लिए हम तेरी और तेरी पुश्तों का सिर कड़ाही में कर देंगे।
जनाब बात हमारी आने वाली पीढ़ियों तक चली आई और हम अभी तक भी समझ नहीं पाये, कि वह हमसे नाराज़ क्यों हैं? हमारी औकात ही क्या जो हम किसी जहांपनाह से नाराज़ हो जायें? कदम-कदम पर जहांपनाह मिलते हैं, और हमसे नाराज़ होकर कभी हमारा चालान काट देते हैं, या कभी हमारा समाज से बाहर होने का फतवा जारी कर देते। हम ऐसी बातों पर नाराज़ नहीं हो सकते, क्योंकि हमारी इतनी औकात ही नहीं कि हम किसी बात पर नाराज़ हो जायें। नाराज़गियों की एय्याशी तो स्व-घोषित बड़े आदमी करते हैं, हम तो केवल उन्हें सहन करने की ज़रूरत महसूसते हैं, वह भी तब अगर हमारी उम्र उनकी नाराज़गी के सैलाब में बह कर अपनी औकात न खो दे?
अपना देश युवकों का देश है। अब बेकार अधेड़ों का देश बन रहा है। लोग नौकरियां दिलाने वाली खिड़कियों के बाहर कतार लगाने की बजाय रियायती रेवड़ियां बांटने वालों की खिड़की के बाहर कतार में लग गये, और किसी अनन्त काल के लिए अपनी काम करने और रोज़गार प्राप्त करने की इच्छा का शमन कर लिया। यहां भेड़ चाल ही जीने का ढंग है, और इस कतार से निकलने की कोशिश या किसी भी घुटने जमा कर बैठ गई विसंगति पर सवाल उठाना उनकी नाराज़गी का केन्द्र बन गया। हम बहुत लोग थे, लेकिन औकातहीन थे। वे चन्द लोग थे, और जितना ही और चन्द  होते, उतना ही अधिक प्रभावशाली हो जाते। उनका मुकाबला करने की हमारी बिसात ही क्या? हमें वही अपनी लोकभाषा पंजाबी का एक सूत्र वाक्या याद आ गया, ‘चोर ते लाठी दो जने, मैं ते चचा अकेले।’ तो फिर बताइए हमें, हमारे भाई-बहनों और नाती-पोतों को चोर की लाठी पीटती नहीं तो क्या करती? क्योंकि यहां चोरों की बन्धक-व्यवस्था की लाठियां बन गई हैं, और पूरे देश में मैं और चचा अकेले पड़ गए हैं। हम स्थिति को सह नहीं पाते, परन्तु हमें जो सही नहीं है, उस पर सवाल उठाने की इजाज़त नहीं है। सवाल उठाएंगे तो व्यवस्था और चोरों की जुण्डली हमसे नाराज़ हो जाएगी, और हमें तभी पता चलेगा, जब उनके सैलाब के सामने हमारी औकात खत्म हो जाएगी। इसे खत्म हो ही जाना चाहिए था, क्योंकि जो गलत था, उसके विरुद्ध हमने सवाल उठाने की जुर्रत क्यों की थी?हमने जुर्रत की थी कि पूछें पुलिस हमेशा चोरी-डकैती की वारदात होने के बाद ही क्यों पहुंचती है, और हमसे ही पूछती है कि ‘चोरी हो गई थी, तो हमने चोर को पकड़ कर उनके हवाले क्यों नहीं किया?’ खाली हाथ उनके समक्ष रिपोर्ट लिखवाने क्यों चले आये?’ तो जनाब चोर तो हमारे साथ पहले ही नाराज़ थे, यह थाने में रिपोर्ट लिखने के लिए तैनात मुंशी भी हमारे साथ नाराज़ हो गया, और पक्की डायरी नहीं कच्चे कागज़ों पर हमारी रिपोर्ट लिखने के बाद फिर नाराज़गी के साथ ऊंघने लगा। हम इनकी नाराज़गी और ऊंघते हुए लोगों के अर्न्त- संबंधों पर विचार कर सकते थे, लेकिन उससे पहले ही सड़कों पर नाचते और हंगामा करते हुए लोगों ने हमारी तंद्रा को भंग कर दिया। हमें पता चला पूरा देश उत्सव धर्मी हो गया है, और काल्पनिक आंकड़ों की सूचना पर अपनी आर्थिक ताकत के बढ़ जाने, और सफलता की एक और सीढ़ी चढ़ जाने की घोषणा की खुशी में नाच रहा है। बेशक उनका नाचने का बहुत अच्छा अभ्यास है, क्योंकि उन्हें लगभग रोज़ ऐसी घोषणाओं पर नाचना पड़ता है।

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# हमारी नाराज़गी असफलता की औकात