दर्शनीय धरोहर है ग्वालियर का किला

युगों-युगों से मध्य भारत में अपने आन, बान और शान के लिए प्रख्यात ग्वालियर नगर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अत्यंत रोचक व गौरवशाली रही है। शौर्य, संगीत और संतों का यह नगर आज भी देश के उन नगरों में प्रथम गण्य है जहां विशाल राजप्रासाद आज भी विराजमान हैं। यह नगर गोपाचल पर्वत और उसके किनारे विस्तृत है जिसे गोपर्वत, गोपार्द्र अथवा गोपगिरि भी कहा जाता है। विवरण है कि प्राच्य काल में यहीं गालन ऋषि की तपोभूमि थी। ग्वालियर के उत्तर में ब्रज क्षेत्रव दक्षिण में विराजमान अहीर क्षेत्र के मध्य का यह संधि स्थली रहा जो धर्म, कला व व्यापार केन्द्र के रुप में स्थापित रहा।
ग्वालियर से जुड़े तथ्यों के अध्ययन अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि यह नगर मालवा के मालचंद द्वारा स्थापित किया गया पर सर्वमान्य तथ्य यह भी है कि कुंतलपुरी के कद्दवाहा सामंत सूरजसेन ने साधु जी महाराज के कहने पर जहां प्रथमेव विशाल किला बनवाकर इस क्षेत्र का विकास किया। बाद में आगे के समय तक इस राजा के 83 पीढ़ियों ने यहां की सत्ता को बनाए सजाए रखा। आगे के समय में गुप्त, प्रतिहार, राजपूत, कद्दवाहा, तोमर व मराठा (सिंधिया) राजाओं ने ग्वालियर नगर का न सिर्फ विस्तार किया वरन् नगर के श्रृंगार में काफी कुछ कार्य किए।
सम्पूर्ण भारत देश के नगरों से सड़क व रेलमार्ग से जुड़ा ग्वालियर में ऐसे तो परिभ्रमण के कितने ही स्थल हैं पर उन सबों के बीच यहां के विशाल किला का अपना मान है जिसे ग्वालियर किला अथवा ग्वालियर दुर्ग भी कहा जाता है। दक्षिण भारत का द्वार कहे जाने वाला ग्वालियर किला को भारतीय किलाओं में उच्चासन प्राप्त है जो निर्माण, वास्तु व मीनाकारी में बेजोड़े है। तभी तो कहा जाता है कि देश का सबसे सुंदर जो किला है वह ग्वालियर किला है। पूरे पर्वत पर बड़े-बड़े पाषाण खण्डों से निर्मित रक्षा प्राचीर से परिवृत यह किला तीन किलोमीटर से अधिक लम्बा व एक किलोमीटर से अधिक चौड़ा है। इस गढ़ किले में छ: प्रधान द्वार और इतनी ही संख्या में महल हैं। इन द्वारों के नाम बादलगढ़ द्वार, हथियापौर, ढोंढापौर, उरवाही द्वार, लधेड़ी द्वार व गणेश द्वार मिलता है। ऐसे आलमगिर गेट, हिन्दौल गेट व आरचेरी गेट का भी आस्तित्व कभी यहां कायम था।
आज की तारीख में पर्यटक व आम यात्री इस विशाल किले का दर्शन उरवाही द्वार से ही करते हैं जिसके आगे बढ़ते ही पर्वत खण्ड को काटकर जैन धर्म से जुड़े कितने ही कलाकृतियों का निर्माण देखा जा सकता है। यह सभी तोमर राजाओं की कलाप्रियता का विशिष्ट उदाहरण है। इनमें चौबीस तीर्थंकर, शासन देव-देव, चंवर धारिणी, यक्षगण, अप्सराएं, ऐरावत, छत्र, अभिषेक कलश व बाहुवली प्रमुख हैं। आगे बढ़ते ही ऊंचाई के बाद समतल भाग पर प्राचीन चतुर्भुज मंदिर का दर्शन किया जा सकता है जो 876 ई. का बना है। पाषाण खण्डों से निर्मित इस मंदिर की कलाकारिता देखने योग्य है जिसके पास में ही पुरातत्व संग्रहालय विराजमान है। इस संग्रहालय में किले से जुड़े कितने ही तथ्य व कलाकृति को देख मन रोमांचित हो जाता है। अब आगे किला दर्शनार्थ पुरातत्व विभाग से कुछ शुल्क निर्धारित है और यहीं पर टिकट काउण्टर बना है।
ग्वालियर के इस किले के वर्णन-विवरण के पूर्व इस क्षेत्र में विराजित तीन-तीन देवालयों का चर्चा आवश्यक जान पड़ता है जिनके नाम हैं तेली का मंदिर, सास-बहू मंदिर और मां अम्बे मंदिर। तेली का मंदिर 101 फीट ऊंचा है जो 9-10 वीं शताब्दी का है। 1881 ई. में अंग्रेजों के शासन काल में मेजर कीथ द्वारा इसे नवश्रृंगार प्रदान किया गया। पूरे देश में सास-बहू के नाम से चर्चित यहां का दूसरा प्रमुख देवालय कभी सहस्त्र बाहु मंदिर कहलाता था जहां गर्भगृह में कोई देवता नहीं, फिर भी मंदिर की आकर्षकता बरकरार है। जीवाजी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति व पुरातत्व संकाय के विद्वानाचार्य डॉ. आर.एन. शर्मा बताते हैं कि ‘यहां का प्रधान मंदिर विष्णु को समर्पित है और जिसे आज बहु मंदिर कहा जाता है वह कभी नाट्य मंडप रहा है।’ जहां के चबूतरे पर चढ़कर ग्वालियर शहर का दर्शन वर्णनातीत है।
ग्वालियर किले के महलों में सबसे शानदार है मानसिंह महल व गूजरी महल। गूजरी को ही खूबसूरत आंखों के कारण ‘मृगनयनी’ कहा गया है। इस महल का निर्माण मान सिंह तोमर ने अपनी प्रियतमा गुजरी के लिए करवाया था। गूजरी महल की आकर्षकता आज तक बरकरार है जो मूलत: तीन मंजिला है। ग्वालियर किले में सर्वाधिक महत्व का महल मान सिंह है जो मान सिंह तोमर का निज भवन है। यह भवन चार मंजिला है जिसके दो मंजिले भूमिगत हैं। आगे में बिक्रम महल, कर्ण महल व जहांगीर महल के साथ शाहजहां महल का दर्शन किया जा सकता है जो नाम के अनुरुप उन राजाओं की स्मृति में निर्मित है। आगे जौहर ताल व राणा की छतरी भी देखने योग्य है। इसके बाद लोग अस्सी खम्भा बावड़ी भी जरुर देखते हैं जिसका निर्माण ग्वालियर दुर्ग की पश्चिमी प्राचीर से लगकर किया गया है।
पूरे देश में ग्वालियर का किला जल भंडारण व जल संरक्षण का एक ऐसा उदाहरण है जिसके रुप-स्वरुप आज भी देखे जा सकते हैं। इस पूरे किला क्षेत्र में ताल तलैये भी बने हैं जिनमें सूरजकुंड, गोल वाबड़ी, खम्ब वावड़ी, जौहर ताल व अस्सी खम्भा बावड़ी का प्रमुख स्थान है। इसके साथ ही यहां गालन ऋषि का समाधि स्थल, बिक्रम मंदिर, गंगोलातल, 1897 ई. में स्थापित सिंधिया स्कूल और आगे दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा का दर्शन किया जा सकता है जो सिख गुरु हरगोबिन्द सिंह की स्मृति से जुड़ा है। आज भी दीपावली के दिन सिख समुदाय के लोग ‘बंदी छोड़ दिवस’ बड़े धूमधाम से मनाते हैं। यहां किले में बंद 52 राजाओं को गुरुजी ने अपनी जश:शक्ति से मुक्ति दिलायी थी।
ग्वालियर किले के ठीक बाहरी प्रक्षेत्र में मोहम्मद गौस का मकबरा और उसी परिसर में संगीत सम्राट तानसेन का मकबरा देखा जा सकता है। यहां और भी कई मजारात हैं जो कला व संगीत से जुड़े हस्तियों के हैं। पूरे नगर से ग्वालियर किले का कोई न कोई भाग अवश्य नज़र आता है जो यहां की सबसे बड़ी खासियत है। ऐसे नगर में रानी लक्ष्मीबाई का स्मृति स्थल, सूर्य मंदिर, जयविलास महल, नगरपालिका संग्रहालय, गोरखी महल, राजाओं की छत्री जिवाजी चौक व अच्तलेश्वर महादेव मंदिर दर्शन योग्य है। नगर के चातुर्दिक 100 कि.मी. के दायरे में आप दतिया, झांसी, शिवपुरी, भिण्ड, श्योपुर, पद्मावती, सिंहोनिया आदि घूम सकते हैं। जहां के किलाओं का भी अपना महत्व है। कुल मिलाकर ग्वालियर का किला एक ऐसी कृति है जिसके दर्शन की बातें वर्षों जीवंत बनी रहती है।
 (सुमन सागर)

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