इस युद्ध के कुछ सबक ़गर याद रहें
ईरान युद्ध से मिले कुछ सबक मानव जाति और भारत के लिए विशेष हैं। पशुओं के पास इतिहास नहीं होता, मनुष्य के पास इतिहास होता है। इतिहास की कुछ बातें सदा के लिए याद रहनी चाहिए। विश्व युद्ध में हिरोशिमा नागासाकी पर बम हमले से हुई तबाही मानव जाति के लिए सबक नहीं थीं, लेकिन अपने महाबली होने का फितूर और दूसरे देशों की उम्दा चीज़ों को कब्ज़ाने की प्रवृत्ति हमें युद्ध में धकेल देती है और फिर भारी विनाश के बावजूद चाह कर भी शांति हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करती। अमरीका ने ईरान पर हमला तो कर दिया परन्तु उसे जल्दी और अपनी इच्छा के अनुसार समेट पाना उसके बस का रहा नहीं। बेशकीमती जानें गईं, बिल्ंिडगें और पुल उड़ाए गए। एक दूसरे को तबाह कर देने की शपथ उठाई गई, परन्तु किसी भी छोटे बड़े युद्ध का खात्मा टेबल पर ही होता है और इसके लिए भरपूर यत्न किए गए।
हम भारतवंशी ईरान युद्ध को कई कारणों से याद रख सकते हैं, लेकिन एक बड़ा फैक्टर जिसकी हरगिज़ अनदेखी नहीं की जा सकती वह है तेल संकट? तेल आपूर्ति से आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी रुकावट ने तेल की विश्व स्तर पर मांग को कम करने पर बल दिया है। इस युद्ध में ईरान के साथ होर्मुज़ को बंद करने/खोलने का हथियार लगा है। चार महीने पहले होर्मुज़ के प्रभावी रूप से बंद करने पर वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो गया। तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया। लिहाज़ा व्यापार का तिलमिला संकट सरकारों को उपभोक्ता के हित बचाने थे। कारोबार को डूबने से बचाने की कोशिश करनी थी। कुछ देशों ने कहा तेल की खपत के साथ जीवन की गतिविधियों को संभालना चाहा। ऊर्जा क्षेत्र की अपनी धाराओं पर पुनर्विचार के लिए विवश होना पड़ा क्योंकि वैश्विक स्तर पर तेल की मांग लगातार बढ़ती ही जाएगी।
युद्ध आरम्भ होने से पूर्व आई.ई.ए. (अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी) का तेल की मांग को लेकर एक अनुमान था कि तेल की डिमांड सन् 2024 से 2030 तक 2.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन बढ़ेगी और फिर दशक के अंत तक लगभग 105.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के स्तर पर जाकर ठहर जाएगी। मांग बढ़ने का कारण स्पष्ट है। आज मध्य वर्ग का हर परिवार अपनी गाड़ी चाहता है। गाड़ी स्टेटस सिंबल हो गया है। बैठकों, महफिलों में चर्चा होने लगी है कि किसके पास किस मॉडल की कौन-सी गाड़ी है। एल्विन टॉफ्लर ने बरसों पहले किताब लिखी थी। ‘फ्यूचर शॉक’ उत्पादन और बेहिसाब खपत पर टॉफ्लर की नज़र थी। अनुमान था कि मनुष्य अभावों से नहीं, बल्कि अति विकल्पों के फैलाव से घिर जाएगा। आपके पास उतने पैसे नहीं तो बैंक है न कज़र् देने को। कज़र् लें और गाड़ी लें। लेकिन इस युद्ध से पैदा हुए तेल संकट और इस कारण से महंगाई ने विवेक की तरफ जाने की नसीहत पैदा की है। सीमित आपूर्ति और अनिश्चितता का सामना करते हुए सरकारों और उद्योगों ने तेल पर निर्भरता कम करने के प्रयासों पर ज़ोर देना शुरू कर दिया है। चीन को देखें- युद्ध से पहले चीन लगभग 1-1 करोड़ बैरल तेल प्रतिदिन आयात कर रहा था। इसके बाद उसने अपने भंडारों का उपयोग करते हुए रिफाइनरी संचालन में परिवर्तन लाते हुए कुछ पेट्रोकैमिकल कच्चे माल के लिए कोयले का विकल्प अपनाया और आयात में भारी कमी की। कुछ विश्लेषकों ने यहां तक कहा कि चीन के आयात कम करने की क्षमता उन प्रमुख कारणों में रही, जिसकी वजह से तेल की कीमतें उतनी ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाई जितना अनुमान लगाया जा रहा था। एशिया और दुनिया के अनेक हिस्सों की सरकारों ने तेज़ी से कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जैसे चार दिन का कार्य सप्ताह, घर से काम करने की नीतियां, एयरकंडीशनर पर प्रतिबंध, ऐसे नीतिगत विकल्पों पर काम किया गया ताकि तेल खपत के ट्रैप को कम किया जा सके।

