भारतीय नागरिक की पहचान

विगत दिवस सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक संशोधन में भारतीय नागरिकता के सवाल पर की गईं टिप्पणियों ने एक बार फिर वर्षों से ज्वलंत इस मामले की ओर ध्यान आकर्षित किया है। भारतीय चुनाव आयोग ने भी अपनी ओर से शुरू की गई एक बड़ी कवायद ‘मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन’ को अब तक जारी रखा हुआ है। इस संबंध में समय-समय पर अनेक एतराज़ भी उठाए जाते रहे और इसकी व्यापक स्तर पर आलोचना भी होती रही है, जिसमें इस प्रक्रिया को बेहद जटिल बनाने की बात मुख्य रूप से उभरी है। इस अधीन कुछ राज्यों में हुए चुनाव के दौरान ही लाखों मतदाताओं के नाम काटे जाने से अधिक बवाल उठता रहा है। हम मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन के पक्ष में हैं, परन्तु इस जटिल प्रक्रिया को सरल बनाया जाना बेहद ज़रूरी है। बहुत-से तकनीकी नुक्तों को आधार बना कर किसी को मताधिकार से वंचित किया जाना या उसकी नागरिकता संबंधी सवाल उठाना स्थिति को और भी उलझाने वाली बात है। इस संबंध में आज हज़ारों ही मामले अलग-अलग अदालतों में दायर किए जा चुके हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि नागरिकता संवैधानिक रूप से एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। इस संबंध में किसी भी फैसले में निष्पक्षता और उचित प्रक्रिया के सिद्धांत का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। नागरिकता संबंधी विवाद इस कारण भी बने हैं कि दशकों से देश के साथ लगते बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल आदि देशों की सीमाओं से बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने कारणों के दृष्टिगत यहां आकर असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में बसते रहे हैं। ऐसे ़गैर-कानूनी तौर पर लोगों की पहचान करना ज़रूरी हो जाता है, परन्तु अभी तक भी मतदाता सूचियों के संशोधन और नागरिकता की पहचान करते हुए लागू की जा रही नीतियां अस्पष्ट दिखाई देती हैं, जिनके कारण आज ज्यादातर देशवासी दुविधा का शिकार हो रहे हैं। विदेशियों संबंधी कानून 1946 में बना था, जिसे बाद में वर्ष 1964 में नए निर्देशों के साथ लागू किया गया था, परन्तु चुनाव आयोग और सरकार द्वारा नागरिकता और मतदाताओं की पहचान के लिए स्पष्ट निर्देश न होने से यह मामला अभी तक उलझा हुआ है। इस संबंध में कुछ आम बने आधारों पर ही यदि किन्तु-परन्तु लगेगा तो यह मामला और भी उलझ जाएगा। अब आधार कार्ड को भी नागरिकता का आधार न मानना और मतदाता पहचान पत्र को भी नागरिकता का आधार न बनाना, लोगों के मन में अस्पष्टता पैदा करता है।
विगत दिवस विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि पासपोर्ट भी एक यात्रा करने वाला दस्तावेज़ ही है, और कुछ नहीं। चाहे देश में पासपोर्ट धारक लगभग 8 प्रतिशत ही होंगे परन्तु शेष करोड़ों व्यक्ति, जिनके पास जन्म प्रमाण-पत्र या कोई अन्य ज़रूरी प्रमाण-पत्र नहीं है, उनकी स्थिति अनिश्चितता वाली बनी दिखाई देती है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने चुनाव आयोग और सरकार के लिए सरल उपायों के सुझाव दिए हैं, जो किसी नागरिक की पहचान का आधार बनाए जा सकते हैं। इस प्रक्रिया पर पुन: गहन विचार-विमर्श करके इसे निर्धारित करने की प्रक्रिया का सरलीकरण करना बेहद ज़रूरी है। इसमें अपनाई पारदर्शिता लोगों के विश्वास में और भी वृद्धि  करेगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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