अपने को सभी लाट समझते हैं
आज के दौर में जिसका वजूद कायम है पुख्ता जमीर है वही अमीर है। अपने को लाट कहने वाले तो बहुत है लेकिन उनका रहन-सहन ठाट बाट जीरो है फिर भी वह अपने को समाज में वर्चस्व रखने वाले हीरो मानते हैं। लेकिन जहां सामाजिक खर्चा हो तो वहां अपने को चर्चा से दूर रखते हैं। ऐसे लोग आर्थिक रूप से मज़बूर होने का रोना रोने लगते हैं।
लेकिन कौन कहे हमारे पड़ोसी और मुंह बोले बड़े भैया जहमत लाल को। पेशे से तो वह वकील है लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो समाज का एक अहम हिस्सा है एक मजबूत कील है धूरी है मेंह है इसमें किसी को एक प्रतिशत भी नहीं संदेह है। वे सब पर एक समान स्नेह रखते हैं।
भैया जहमतलाल के पेशा से इतना पैसा तो आ ही जाता है जिससे दैनिक कार्यों व पारिवारिक खर्चों का अच्छी तरह से निर्वहन हो जाए। हालांकि उनके अनेकों ऐसे कारनामे हैं जिसे सुनकर कुछ लोग नाक धुनते हैं तो कुछ लोग उनको गाली गलौज से नवाज देते हैं जिससे उनके सहनशीलता का हौज भी फूल हो जाता है। फिर भी वह गुस्सा नहीं होते वह कूल ही रहते हैं। और जिसने इनको गाली गलौज से हौज को जो फूल किया है उसे धूल समझ उसी तरह से तटस्थ बनकर अपना वरदहस्त सब पर एक समान रखते हैं। न किसी के साथ गिला न शिकवा का रखते भाव। इसलिए इतना होने के बाद भी सबसे उतना ही लगाव रहता है। वह तो उनके दृष्टि में और महान हो जाता है। क्योंकि आलोचना उसी की होती है जिसमें कुछ अवगुण छिपा हो। वह इससे भिज्ञ होते हुए भी अनजान बनकर सुबह शाम लेफ्ट राइट करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। वह उनके खामियों को नज़रंदाज कर हमेशा से आवाभगत करते रहते हैं। और देर-सबेर सामूहिक भोजन का आयोजन कर सबका एक मंच पर स्वागत करते रहते हैं।
जहमतलाल भैया गांव के अगड़धत या यूं कहें धनी मनी व्यक्ति नहीं बिल्कुल साधारण गृहस्थ हैं। लेकिन गांव में उनका भी एक अहम स्थान था। गांव का कोई भी केस होता तो वगैर फीस का वही फेस करते हैं। इसलिए सारे गांव का लगाव हमेशा से अधिक रहता है। वह जितना गंभीर हैं हंसोड़ प्रवृत्ति के उतना ही बेजोड़ शख्स हैं।
गांव में उनका कुछ ऐसा करतूत है जो प्रस्तुत करते हुए मुझे हंसी आ जाती है। एक बार हमारे क्षेत्र के एम.एल.ए. साहब आए थे। शायद जीतकर जाने के बाद कुछ काम नहीं कर पाए थे। जब उनके उपर वाला ने काम का ब्योरा मांगा तो वह झमेले में फंस गए। जिस पर ऊपर से काफी डांट मिली थी और गांव जाकर जनता से मिलना और काम का ब्यौरा देना था।
नेता जी अपने चमचमाती चार चकिया वाहन को गांव के मुहाने पर खड़ा करके दौरा कर रहे थे और सभी उनके पिछलग्गू बने उनके आगे पीछे डोलते हुए साथ चल रहे थे।
तभी जहमतलाल एंड कंपनी ने उनके गाड़ी के दरवाजे के हैंडल में एक रस्सी से एक बोका बांध दिए। जिससे प्रतीत होता था कि यह नौटंकीबाज कुछ काम करने वाला नहीं है।
इसी तरह जहमतलाल भैया दोस्तों को लेकर अपने घर पर हमेशा पार्टी करते रहते थे। एक दिन हंसी व चुहलबाज़ी के स्वर में इतना कहा-‘भले ही गांव के सबसे धनी रहमतलाल अपने को जो समझे लेकिन हमारे दरवाजे पर दस पंद्रह कुकुर टंच से लंच कर या खा पीकर कर हमेशा हाथ धोते रहते हैं।’
बस इतना कहना था कि एक सम्मिलित ठहाका गुंजा- ‘आप भी न गजब करते हैं भैया। खिला-पिलाकर कचुमर निकालना कोई आपसे सीखे। धत्त! तेरी की।’
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